पाकिस्तान के पोस्टर ब्याय

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डॉ दिलीप अग्निहोत्री
पाकिस्तान में इस समय भारत के खिलाफ भावनाएं भड़काई जा रही है। वह भारतीय सीमा पर अपनी सेनाओं को पहुंचा रहा है। लेकिन बिडम्बना देखिए भारत के अनेक कांग्रेसी नेताओं का यहाँ जय जयकार हो रहा है। राहुल गांधी, पी चिदम्बरम, गुलाम नवी आजाद, दिग्विजय सिंह को यहां पोस्टरब्याय के रूप में पेश किया जा रहा है। जम्मू कश्मीर पर भारतीय संसद के निर्णय की विश्व समुदाय का समर्थन मिला है। इसका विरोध करने वाला एक तो पाकिस्तान है, दूसरा भारत में कुछ राजनीतिक दल। इसमें कांग्रेस पाकिस्तान जैसी भाषा बोलने में सबसे आगे है। इस समय तो ऐसा लग ही नहीं रहा है कि कांग्रेस भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी है। नरेंद्र मोदी सरकार का विरोध करते करते यह पार्टी पाकिस्तान की सरहद में दाखिल हो गयी है। इसके और पाकिस्तान के बयानों में फर्क करना मुश्किल हो गया है। स्थिति यह है कि भारत पर हमला बोलने के लिए पाकिस्तान राहुल गांधी के बयानों को आधार बना रहा है।
बेहतर यह है कि पाकिस्तान कश्मीर मसले पर अलग थलग हो गया है। भारत की कांग्रेस पार्टी, पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस के अलावा उसे किसी का समर्थन नहीं मिल रहा है। जम्मू कश्मीर में पिछले पांच दिनों से शांति है। लोगों ने शांति के साथ बकरीद मनाई।
लेकिन राहुल गांधी दुनिया को बता रहे है कि यहां हिंसा हो रही है। वह भारत के प्रधानमंत्री से कह रहे है कि वह दुनिया को सच्चाई बताए। पाकिस्तान के लिए भारत के बड़े विपक्षी नेता का यह बयान बहुत था, उसने इसे दुनिया को अपने सन्देश की तरह प्रसारित किया। पाकिस्तानी पत्रकार हामिद मीर ने राहुल के बयान वाले वीडियो को शेयर किया। यह वायरल हुआ। इसके आधार पर भारत पर आरोप लगाए जा रहे है, और पाकिस्तान में राहुल का गुणगान हो रहा है।
इसमें पाकिस्तान के सांसद भी शामिल है। सांसद मुराद सईद ने भी राहुल गांधी राहुल के बयान को आधार बनाया। उसने कहा कि राहुल का बयान देखिए। भारत के लोग जब विरोध कर रहे हैं, फिर भी दुनिया चुप क्यों है।
मतलब पाकिस्तान चाहता है कि राहुल के बयान को आधार बनाकर दुनिया भारत के खिलाफ कार्यवाई करे।
कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की जोड़ी ने जम्मू कश्मीर को फलीस्तीन में तब्दील कर दिया है। अय्यर का यह बयान भी भारत के खिलाफ कार्यवाई के लिए विश्व समुदाय को उकसाने वाला है। ये वही अय्यर है जो पिछले कार्यकाल में पाकिस्तान में यह कहने गए थे कि आप ही लोग नरेंद्र मोदी को हटाईये। इनके इस जयचंदी कथन का असर देखिए, नरेंद्र मोदी पहले से ज्यादा बहुमत द्वारा सत्ता में वापस आ गए।
दूसरी बात यह की अय्यर को फलस्तीन की जानकारी ही नहीं है। वहां से हजारों वर्ष पहले यहूदियों को उनके मूल स्थान से बेदखल किया गया था। उन्नीस सौ अड़तालीस में यहूदी अपनी मातृभूमि में वापस लौटे थे। जबकि कश्मीर आदिकाल से भारत भूमि में रहा है। अय्यर यहीं तक नहीं रुकते। वह फरमाते है कि मोदी व शाह ने यह चीज अपने गुरु इस्राइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू से ली है। यह या तो मूर्खतापूर्ण या शरारती बयान है। भारत ने अपने संविधान के अस्थाई अनुच्छेद को ही हटाया है। इसका इस्राइली प्रधानमंत्री से कोई मतलब ही नहीं है।
पाकिस्तान का इसके एक हिस्से में अवैध कब्जा है। विवाद का विषय केवल यही है। जम्मू कश्मीर पर राष्ट्रीय व स्थानीय हितों के अनुसार निर्णय लेने का अधिकार केवल भारत को है। इसके पहले पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम ने कहा था कि कश्मीर अगर हिंदू बहुल होता तो वहां से अनुच्छेद तीन सौ सत्तर न हटाता। यह बयान भी पाकिस्तान को खुश करने और भारत की छवि बिगाड़ने वाला है। चिदम्बरम दुनिया को यह बताना चाहते है कि भारत में मुसलमान के साथ भेदभाव होता है। यह शर्मनाक है कि पूर्व गृहमंत्री को कश्मीर की स्थिति की भी जानकारी नहीं है। उनके बयान में जम्मू और लद्दाख की कोई अहमियत नहीं है। वह केवल कश्मीर घाटी के पांच जिलों तक सीमित होकर सोचते है। जम्मू की आबादी ज्यादा है। लेकिन विधानसभा में घाटी को ज्यादा संख्या दी गई। लद्दाख की तो बहुत उपेक्षा हुई। अब इस अन्याय में सुधार होगा।
जिस समय तीन सौ सत्तर को हटाने का प्रस्ताव राज्यसभा में पेश किया गया तभी से कांग्रेस बेहाल है। उसने इस अनुच्छेद को धर्मनिरपेक्षता की स्थायी कसौटी मान लिया था। जो इसे हटाने की मांग करता उसे साप्रदायिक घोषित कर दिया जाता था। कांग्रेस का यह अस्त्र निरर्थक हो गया था। राज्यसभा में  गुलाम नवी आजाद तो बिल्कुल धमकी के अंदाज में बोल रहे थे। आरोप लगाया है कि उसने नियमों का उल्लंघन करते हुए रातों रात एक राज्य को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया है। बल्लभ भाई पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, डॉ आंबेडकर, राम मनोहर लोहिया  ने इसका विरोध किया था। इस अनुच्छेद ने कश्मीर को भारत से दूर करने का कार्य किया है। वहां भ्रष्टाचार बेकाबू था, क्योंकि केंद्र की एजेंसियां वहां जांच नहीं कर सकती है। पिछड़ों, दलितों, गरीब सवर्णों को आरक्षण का लाभ नहीं मिला। मनीष तिवारी का यह कहना गलत है कि उस विलय में कुछ वादे किए गए थे। इसलिए उन्नीस सौ बावन  में भारत के संविधान में  अनुच्छेद तीन सौ सत्तर  को शामिल किया गया।
तीन सौ सत्तर की भांति दोहरी नागरिकता, दोहरा संविधान आदि की देता था। यह राष्ट्रीय भावना के प्रतिकूल था।आजादी के साथ ही पांच सौ बाँसठ रियासतें मिलाई गई। वैसे ही विलय पत्र पर कश्मीर के तत्कालीन शासक ने हस्ताक्षर किए थे। कोई शर्त नहीं थी। बाद में लगाई गई शर्तें गलत थी। अनुच्छेद तीन सौ तिहत्तर तीन का प्रयोग करके राष्ट्रपति को इसे  सीज करने का अधिकार है। उन्होंने इसका प्रयोग किया। कांग्रेस इस प्रावधान का उपयोग उन्नीस सौ बावन और उन्नीस सौ पचपन में कर चुकी है। महाराजा के लिए पहले सदर ए रियासत फिर उन्नीस सौ पैसठ में इसे गवर्नर नाम दिया गया। जम्मू कश्मीर में विधानसभा नहीं चल रही है। संसद में जम्मू-कश्मीर के सारे अधिकार निहित हैं।
अनुच्छेद तीन सौ सत्तर सी में के अनुसार संसद कश्मीर पर कानून बनाने में सक्षम है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद सरकार संकल्प लेकर आई हैं। यह संविधान के अनुरूप है। राहुल गांधी और उनके साथी इसे असंवैधानिक बता रहे है। लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन का बयान ज्यादा शर्मनाक है। उनके अनुसार इसकी निगरानी संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा उन्नीस सौ अड़तालीस से की जा रही है। क्या यह आंतरिक मामला है। अधीर रंजन के बयान का यही मतलब है कि वह कश्मीर को भारत का आंतरिक हिस्सा नहीं मानते। अधीर रंजन ने आगे कहा कि सरकार ने सभी नियमों का उल्लंघन किया। यही पाकिस्तान ने कहा। जब कांग्रेस में ऐसे बयानों की होड़ लगी हो, तो दिग्विजय सिंह कैसे चुप रहते। वह लोकसभा तो नहीं पहुंच सके। बाहर से ही पकिस्तान को खुश करने वाले बयान दाग रहे थे।
कांग्रेस के इन बयान वीरों को यह समझना चाहिए कि अनुच्छेद तीन सौ सत्तर अस्थाई था। जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि यह घिस घिस कर समाप्त हो जाएगा। मोदी सरकार ने इसे समाप्त कर दिया। इन नेताओं को डॉ अंबेडकर के एक पत्र का संज्ञान लेना चाहिए। उन्होंने शेख अब्दुल्ला लिखा था कि आप चाहते हैं कि भारत जम्मू-कश्मीर की सीमा की सुरक्षा करे, यहां सड़कों का निर्माण करे, अनाज की सप्लाई करे,लेकिन भारत सरकार को कश्मीर में सीमित अधिकार ही मिलने चाहिए। ऐसे प्रस्ताव को भारत के साथ विश्वासघात होगा जिसे भारत का कानून मंत्री होने के नाते मैं कतई स्वीकार नहीं कर सकता। सरदार पटेल ने भी इसका विरोध किया। अंबेडकर ने अनुच्छेद तीन सौ सत्तर की बहस में  हिस्सा नहीं लिया था। इस अनुच्छेद से संबंधित सभी सवालों के जवाब कृष्ण स्वामी आयंगर ने ही दिये थे।
यह विचित्र है कि कांग्रेस के नेता पाकिस्तान को खुश करने वाले बयान दाग रहे है, लेकिन कोई यह नहीं बता रहा है कि इस अनुच्छेद से जमू कश्मीर के आमजन को क्या हासिल हुआ। तीन परिवारों और अलगाववादी की लूट बन्द होने की संभावना बनी है। ऐसा लगता है कि यह कांग्रेस को पसंद नहीं आया।

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