नवेद शिकोह
लखनऊ, 20 मई 2019: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता 2019 लोकसभा चुनाव के एक्जिट पोल को चुटकुला बता रहे हैं। एनडीए को बहुमत मिलने का अनुमान लगाने वाले तमाम एक्जिट पोल पर प्रतिक्रिया के लिए एबीपी न्यूज चैनल के पत्रकार ने राजीव शुक्ला से विशेष बातजीत की। जिसमे उन्होंने कहा कि एक्जिट पोल चुटकुला हे.. मजाक है.. धोखा है।दिलचस्प बात ये कि कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला खुद भी लोकसभा चुनाव जैसे गंभीर लोकतांत्रिक अनुष्ठान को चुटकुला बनाकर देश को धोखा दे रहे हैं। वो न्यूज 24 चैनल के मालिक हैं। उनके इस चैनल ने भी एक्जिट पोल दिखाये हैं। जिसमें एनडीए तीन सौ से ज्यादा सीटों से बंपर जीत हासिल कर रहा है।
इसी तरह विख्यात टीवी पत्रकार रवीश कुमार ने भी आज अपने लेख में तमाम एक्जिट पोल पर सवाल खड़े किए हैं। इस पर व्यंग्य किया है। सत्ता को खुश करने के लिए झूठ परोसने वाले टीवी चैनलों को ना देखने की अपील की है। लेकिन आश्चर्य की बात ये कि जिस एनडीटीवी के रवीश एक स्तम्भ है उस चैनल ने तमाम टीवी चैनलों के एक्जिट पोल को मिलाकर ‘ पोल ऑफ पोल्स ‘ तैयार किया। और इसे अपने दर्शकों के समक्ष परोसा।
किसी भी पार्टी के बेलगाम नेता जब आपत्तिजनक और विवादित बयान देते हैं तो पार्टी ये कह कर अपना बचाव कर लेती है कि ये उनका निजी बयान है। ऐसे में दो सवाल उठते हैं। पहला ये कि पार्टी किसी विचारधारा पर आधारित होती है। पार्टी में उस विचारधारा के लोग ही होते है जो उसकी विचारधारा को मानते हों। पार्टी से जुड़े व्यक्ति के वहीं विचार होंगे जो उसकी पार्टी के विचार हैं। तो फिर निजी बयान क्या होता है ! पार्टी नेता से मीडिया बयान लेती है उसका निजी बयान मीडिया क्यों दिखायेगी। निजी बयान तो ये होता है कि आज मैंने सुबह के नाश्ते मे आमलेट खाया। लंच में खिचड़ी खायी। शाम में बीवी मुझसे कुछ नाराज थी….
दूसरा सवाल ये कि जब पार्टी और उससे जुड़े व्यक्ति के विचार अलग हो जायें तो दोनों को एक दूसरे से जुड़े रहने का क्या मतलब है !
पत्रकारिता और राजनीति दोनों ही विचारधारा पर आधारित होती है। नया लड़का पत्रकारिता से जुड़ता है तो समाचार संकलन करता है। बाइट कलेक्शन का काम करता है। जब वरिष्ठ, बड़ा, परिपक्व और नामचीन पत्रकार हो जाता है तो उसकी खबरें, सर्वेक्षण, विश्लेषण, समीक्षा या सम्पादकीय एक नजरिए को भी बयां करता है। एक विचारधारा उसकी पत्रकारिता की आत्मा होती है।
नामचीन पत्रकार रवीश कुमार की पहचान उनकी विचारधारा और उनके मीडिया संस्थान एनडीटीवी से जुड़ी है। रवीश एनडीटीवी के छोटे-मोटे मुलाजिम नहीं हैं। उनकी विचारधारा से एनडीटीवी की पॉलिसी कुछ ना कुछ मेल खाती ही होगी।
वो लगातार लोगों से कह रहे हैं कि न्यूज चैनल्स देखना बंद कर दीजिए। ज्यादातर चैनल सरकार की चाटुकारिता और गुलामी में झूठ परोसते हैं। चैनल नफरत पैदा करते हैं। हिन्दू और मुसलमानों को लड़वाते हैं।
रवीश कुमार जी का आज एक लेख वायरल हो रहा है। जिसमें उन्होंने कल तमाम न्यूज चैनलों के एक्जिट पोल पर सवाल उठाए हैं। इस पर तंज किया है।
अब सवाल ये उठता है कि जब ये एक्जिट पोल जनता को दिग्भ्रमित करने वाले हैं तो एनडीटीवी ने तमाम एक्जिट पोल को मिलाकर ‘ पोल ऑफ पोल ‘ क्यों दिखाया ? रवीश एनडीटीवी के स्तम्भ इसलिए इस चैनल की पॉलिसी में इनकी कुछ तो चलती होगी ! नहीं चलती है तो अपनी विचारधारा और सिद्धांतों के खिलाफ काम करने वाले चैनल की नौकरी छोड़कर क्रांति की मशाल लेकर निकल जायें। एनडीटीवी दुनियाभर पर उंगलियां उठाता है। सत्ता की खामियों पर सवाल खड़ा करता है। अच्छी बात है,पत्रकारिता का यही कर्तव्य भी है। लेकिन बाबा रामदेव जिनपर सोशल मीडिया का आम जनमानस तमाम सवाल उठाता है उस योगगुरु पर एनडीटीवी कभी एक भी सवाल नहीं उठा सका। क्योंकि रामदेव क कंपनी पंतजलि एनडीटीवी की मुख्य प्रायोजक है। पहले कहा जाता था- मजबूरी का नाम महत्मागांधी।
पर अब आज की खर्चीली मीडिया का दूसरा नाम मजबूरी हो गया है। अंजना ओम कश्यप, रोहित सरदाना, अर्नब गोस्वामी, सुमित अवस्थी और अमीश देवगन जैसे तमाम एंकर/पत्रकार नौकरी की मजबूरी में बड़े समझौते कर रहे हैं तो रवीश कुमार को भी तो छोटे-छोटे समझौते करने ही पड़ते हैं।
नहीं तो रवीश जिन एक्जिट पोल पर सवाल उठा रहे है उन एक्जिट पोल को एनडीटीवी पर नहीं दिखाया जाता।
कहावत है – जब हम किसी पर उंगली उठाते हैं तो तीन उंगलियां हमारी तरह होती हैं।






