बरसती आग के नीचे क्यों बैठ गये राहुल और रवीश !

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नवेद शिकोह
मान लीजिए अल्कोहल हमारी जीविका है। इसी से पेट भरना है। कहीं ना कहीं इसे बेचना है। पैसा कमाना है और घर चलाना है। किसी की जिंदगी बचाने वाली दवाओं में इस्तेमाल के लिए हमारा अल्कोहल बिक जाये तो अच्छा है। नहीं तो मजबूरी में दारू बनाने वालों को ही अल्कोहल बेचना पड़ेगा।
पत्रकारिता में एक दौर इंफार्मेटिव खबरों/बाइट कलेक्शन का होता है। इसके बाद पत्रकार का नजरिया बिकता है। मीडिया की अलग-अलग दुकानों में अलग-अलग नजरियों की वैरायटी होती है। हमारा जैसा नजरिया मार्केट में चल रहा हो ये जरूरी नहीं। इसलिए हमें एक तस्वीर को दर्जनों नजरियों से देखने का हुनर आना चाहिए है। यानी कलम को बिकाऊ माल
 (वैराइटी वाला/कभी इनके पक्ष में उसके विरोध में तो कभी उसके पक्ष में और इसके विरोध में)
नहीं बना सके तो पुण्य प्रसून वाजपेयी या अभिसार शर्मा की तरह घर बैठकर फेसबुक लाइव शो ही करना होगा।
इसलिए ही मै अपने नजरिए की वैराइटी बढ़ाने की कोशिश कर रहा हूं।
एनडीटीवी के रवीश कुमार ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का इंटरव्यू बरसती आग जैसी सख्त धूप में बैठ कर क्यों लिया ! और राहुल गांधी ने धूम में इंटरव्यू क्यों दिया ! तब जब मई के महीने में दोपहर में 44 डिग्री तापमान में खुले आसमान के नीचे धूप आग की तरह तप रही थी।
आईये इसे पहले सकारात्मक नजरिए से देखते हैं –
रवीश कुमार देश के बहुत बड़े पत्रकार हैं। जमीन से जुड़ी सादगी पसंद पत्रकारिता उनकी पहचान है। गर्मी की धूप में रवीश कुमार ने राहुल गांधी का इंटरव्यू करके देश के पत्रकारों को एक बड़ा संदेश दे दिया।
जमीनी हकीकत जमीन पर ही मालुम पड़ती है। अस्ल पत्रकारिता वातानुकूलित स्टूडियो से नहीं चलती। धूप में .. पसीने में.. जमीन पर.. भीड़ में धक्का-मुक्की के संघर्ष में तपकर पत्रकारिता का सोना कुंदन बनता है। और यहीं से निकली खबर प्योर होती है।
ये देश किसानों-मजदूरों का देश है। सैनिकों का.. सिपाहियों का.. आम इंसानों.. मेहनतकश गरीबों का देश है। ये सब लोग जीरो डिग्री से लेकर पचास डिग्री तापमान का डट कर मुकाबला करते हैं। इंटरव्यू स्थल के इर्द गिर्द भी आम लोगों की भीड़ और सुरक्षा कर्मी भी धूप मे ही थे।
रवीश और राहुल ने उनके बीच धूप मे बैठ कर ये भी साबित किया कि बतौर नेता राहुल और बतौर पत्रकार रवीश उनके बीच के अस्ल प्रतिनिधि हैं।
आइये अब इसे नकारात्मक दृष्टि से देखें:
ड्रामा, प्योर ड्रामा। बल्कि अति नाटकीयता कहेंगे इसे। रवीश और राहुल दोनो की मिलिभगत वाला ख़ालिस ड्रामा।
राहुल गांधी बहुत बड़े कद के नेता हैं। रास्ते चलते इनका इंटरव्यू नहीं किया जा सकता। बड़े मीडिया संस्थान के बड़े पत्रकार को संघर्ष के बाद इंटरव्यू का समय मिलता है। जगह और समय भी तय होता है। चलिए रैली स्थल पर ही साक्षात्कार का समय मिला तो यहीं कोई ऐसा भी ठिकाना तय हो सकता था जहां छांव होती। राहुल गांधी जैसे कद्दावर नेता के साथ करीब सौ लोगों की टीम उनके इर्द-गिर्द साये की तरह होती है। रवीश कुमार जैसे दिग्गज पत्रकार के साथ भी करीब दस लोगों की प्रोडक्शन टीम होती ही होगी। मिनटों में धूप से बचने के लिए छाया का इंतजाम किया जा सकता था। लेकिन दरअसल योजनाबद्ध तरीके से गर्मी की तपती धूप को इंटरव्यू का हिस्सा बनाया जाना था। इसलिए ही रवीश ने छोटे से इंटरव्यू में दो बार धूप की मौजूदगी को दोहराया।
एक बार तो जब रवीश ने राहुल से कहा कि- धूप बहुत तेज है तो इस पर राहुल ने आसमान की तरफ देखा।
 ( राहुल विरोधी इस बात का सोशल मीडिया पर मज़ाक भी उड़ा हैं। लिख रहे हैं कि राहुल ने रवीश की बात की पुष्टि करने के लिए आसमान की तरफ देखा कि धूप है भी कि नहीं।)
जिस तरह गोदी मीडिया ने पिछले  दिनों अलग अलग चैनलों पर तयशुदा तरीके से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का किस्म-किस्म से इंटरव्यू किया। आम वाला इंटरव्यू.. व्रत वाला इंटरव्यू.. गंगा किनारे वाला इंटरव्यू.. बोट पर सजे सेट वाला इंटरव्यू, गुस्से वाला.. प्यार वाला.. हंसने वाला… तरह- तरह के आमों की तरह पीएम के भांति-भांति के इंटरव्यू किये गये।
बस इसी तरह कुछ अलग हट कर रवीश कुमार राहुल गांधी का भी इंटरव्यू करना चाहते थे।
नाटकीयता इसमें भी थी लेकिन कुछ अलग हट कर ये इंटरव्यू मोदी वाले साक्षात्कारों को आईना दिखाना की मंशा से तैयार किया गया था। पत्रकारिता और राजनीति के ये धुरंधर अपने को ज़मीनी साबित करना चाहते थे। सादगी को अपना हथियार बना कर मोदी और गोदी मीडिया को आईना दिखाना चाहते थे।

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