महाबलीपुरम में नए मुकाम की मुलाकात

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डॉ दिलीप अग्निहोत्री

महाबलीपुरम में भारत और चीन संबंधों का नया अध्याय लिखा गया। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग के बीच सौहार्दपूर्ण माहौल में वार्ता हुई। जिनपिंग के यहां आने से पहले चीन के विदेश मंत्रालय ने कश्मीर को द्विपक्षीय मसला बताया था। यहां जिनपिंग ने आतंकवाद पर चिंता व्यक्त की, आतंकवाद और कट्टरपंथ की चुनौतियों का मिलकर सामना करने का संकल्प लिया। निवेश के नए क्षेत्रों को पहचानने, उन पर संयुक्त रूप से प्रयास करने, व्यापार और आर्थिक मामलों पर चर्चा की। भविष्य में भी इस प्रकार की अनौपचारिक वार्ता जारी रखने पर सहमति बनी। कहा गया कि यह वार्ता भारत चीन सहयोग को एक नई दिशा देगी। पिछले दो हजार वर्षों से भारत-चीन दुनिया के आर्थिक शक्ति रहे हैं। इसे एक बार फिर चरितार्थ किया जाएगा।

यह सही है कि चीन पर आँख मूंद कर विश्वास नहीं किया जा सकता, लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि महाबलीपुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आंख मिला कर बात की। पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने यही ऐलान किया था। तब उनका कहना था कि भारत किसी देश के साथ न आँख झुकाकर बात करेगा, न आंख उठाकर बात करेगा, बल्कि आंख मिलाकर बात की जाएगी। नरेंद्र मोदी ने महाबलीपुरम में इसी नीति का परिचय दिया। नरेंद्र मोदी जानते है कि पाकिस्तान का रहनुमा चीन है।

इस मसले पर कोई गलतफहमी भी नहीं है। इसके बाद भी भारत और चीन द्विपक्षीय तनाव को कम करके सहयोग की दिशा में बढ़ सकते है। इसी के साथ आतंकवाद के मुद्दे पर चीन को अपनी जिम्मेदारी व जबाबदेही समझनी चाहिए। वह पाकिस्तान का हितैषी है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वह आतंकवाद का भी समर्थन करता रहे। चीन ने खुद अपने यहां के दो प्रान्तों में आतंकी ताकतों को कुचलने के कार्य किया है। यहां उसने नमाज,सजान और रोजे तक पर प्रतिबंध लगा दिए। इसका मतलब है कि चीन इस्लामिक आतंकवाद के खतरे को समझता है। लेकिन जैसे ही वह पाकिस्तान के आतंकियों का बचाव करता है, उसके दोहरे मापदंड सामने आ जाते है। इसका मतलब यह होता कि चीन अपने यहां आतंकी तत्वों को बेरहमी से कुचलता है, क्योंकि वह अपने यहां शांति व्यवस्था कायम रखना चाहता है, लेकिन दूसरी तरफ वह पाकिस्तान के आतंकियों का बचाव करता है, इसका मतलब यह कि वह अन्य देशों में हिंसा का समर्थन करता है।

नरेंद्र मोदी ने जिनपिंग के साथ आतंकवाद का मुद्दा विशेषरूप से उठाया। जिनपिंग ने भारत यात्रा के पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान से मुलाकात की थी। इसके भी अपने अपने ढंग से अर्थ निकाले गए। लेकिन इसे उनकी भारत यात्रा से जोड़कर देखने की आवश्यकता नहीं है। चीन की पाकिस्तान के साथ हमदर्दी जगजाहिर है। इसके अलावा पाकिस्तान और इमरान दोनों ही इस समय बेहाल है। इमरान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी फजीहत झेलनी पड़ रही है। संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश भी उसका समर्थन नहीं कर रहा है। इमरान को हवाई जहाज से बीच यात्रा में रोककर उतारा गया। इस माहौल में इमरान का भागकर चीन जाना स्वभाविक है। चीन का भी पाकिस्तान में बहुत कुछ दांव पर लगा है। उसने वहां अरबों रुपये का कर्ज जाल फैला रखा है। बंदरगाह, सड़क, सैन्य ठिकाने बना लिए है। उसे भी पाकिस्तान जैसे देश की जरूरत है। भारत उसे यह सब दे नहीं सकता। भारत बराबरी का व्यवहार करता है।

इसके बाबजूद भारत आने के ठीक पहले चीन ने पाकिस्तान की एक मांग नामंजूर कर दी। पाकिस्तान ने राफेल को काउंटर करने के लिए अपग्रेडेड रडार प्रणाली एयरक्राफ्ट मांगे थे। लेकिन चीन ने इसके लिए इनकार कर दिया। आतंकियों के पास चीनी ग्रेनेड व अन्य हथियार मिलने के प्रति भी चीन ने इमरान को फटकारा था। इसका मतलब यह भी था कि चीन के हथियार आतंकियों तक पहुंच रहे है। भारत यह बात पहले से कह रहा है। महाबलीपुरम पहुंचने से पहले चीन ने इस बात को स्वीकार किया है। इसके बाद इन दोनों दोस्तो की सच्चाई अपनी जगह है। पाकिस्तान में चीन इकनोमिक कॉरिडोर में छियालीस बिलियन डॉलर का निवेश कर चुका है। चीन के लिए यह भी प्राथमिकता है।

नरेंद्र मोदी और जिनपिंग ने वाणिज्य और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विचार विमर्श किया। यह स्थल तमिल सभ्यता संस्कृति का प्राचीन केंद्र रहा है। नरेंद्र मोदी ने स्वयं इसे सम्मान दिया। उनकी भेषभूषा इसके अनुकूल थी। यह भी एक प्रकार का सन्देश देने वाली थी। पहले दिन मोदी ने मामल्लपुरम में जिनपिंग को अर्जुन तपस्या स्थली और तट मंदिर के दर्शन कराए। जिनपिंग कम्युनिस्ट है, धर्म को नहीं मानते।लेकिन विश्व यह कार्य केवल मोदी ही कर सकते है। वह जिनपिंग को मंदिरों में दर्शन हेतु ले गए। इसके बाद दोनों नेपंच रथ स्थल पर नारियल पानी पिया। रात्रिभोज में दोनों नेताओं ने कई मुद्दों पर चर्चा की। यह मोदी का ही प्रभाव था जिसके कारण जिनपिंग ने आतंकवाद और कट्‌टरपंथ को मानवता विरोधी बताया।

उन्होंने आतंकवाद और कट्‌टरपंथ पर चिंता जताते हुए इस चुनौती से मिलकर लड़ने की जरूरत पर जोर दिया है। दोनों देशों ने हिन्द प्रशांत क्षेत्र, पुराना सीमा विवाद,कट्टरवाद, आतंकवाद, व्यापार संतुलन,आतंकी फंडिंग के मुद्दे पर चर्चा हुई। नरेंद्र मोदी पिछले साल अप्रैल में पहली अनौपचारिक बैठक के लिए चीन के वुहान गए थे। इसके अलावा बैंकाक में इकतीस अक्टूबर से चार नवंबर के बीच होने आसियान शिखर सम्मेलन में भी मोदी व जिनपिंग के बीच वार्ता होगी। इसके पहले चीन ने कश्मीर पर आपने बदले रुख का परिचय दिया। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गेंग शुआंग ने कहा कि कश्मीर द्विपक्षीय मसला है।भारत और पाकिस्तान ही इसका समाधान कर सकते है।जबकि पहले चीन संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव के अनुसार समाधान की पैरवी करता रहा है। चीन के रुख में यह सकारात्मक बदलाव हुआ है। इसे भारत की कूटनीतिक सफलता कहा जा सकता है।

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