सत्ता शब्दों के माध्यम से ही चलती है: मृदुला गर्ग

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लखनऊ विश्वविद्यालय में भाषा महोत्सव के दूसरे दिन देश के कोने-कोने से आये भाषाविद्दों ने दिये व्याख्यान

लखनऊ विश्वविद्यालय में उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान के सहयोग से चल रहे भाषा महोत्सव के दूसरे दिन एक साथ चार सभागारों में व्याख्यान हुए। उमा हरिकृष्ण अवस्थी सभागार ‘हमारे समय के शब्द’ विषयक सत्र की अध्यक्षता कर रहीं दिल्ली से आईं मृदुला गर्ग ने कहा कि, लेखक के सामने चुनौती यह है कि बोलचाल की भाषा को सीमा न बनने दें। लेखक किरदार बनाता है और उसके बाद उससे अपनी बातों को कहलाता है।

उन्होंने कहा कि सत्ता शब्दों के माध्यम से ही चलती है। मातृभाषा पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि अगर हम अपनी मातृभाषा भूल गए तो हमारा मस्तिष्क जकड़ जाएगा और हम गणित भी नहीं सीख पायेंगे। उन्होंने विज्ञापन पर कटाक्ष करते हुए कहा कि उसमें एक ही बात को बार-बार दोहरा कर हमारे अवचेतन मस्तिष्क में बसा दिया जाता है, जो ठीक नहीं है। साहित्य को पढ़ने पर ही भाषा समृद्ध होगी। साहित्य की समझ न होने से अर्थ का अनर्थ तक हो जाता है।

भाषा और विधि जुड़वा बहनें, लेकिन हाईकोर्ट में हिन्दी की व्यवस्था नहीं: डाक्टर रामअवतार

उमा हरिकृष्ण अवस्थी सभागार में आयोजित ‘हिन्दी में विधि लेखन’ के विषय में बोलते हुए डाक्टर रामअवतार सिंह ने कहा,‘हिन्दी भाषा में विधि लेखन स्वतंत्रता के बाद शुरू हुआ। विधि राष्ट्रीय लोक चेतना से पैदा होती है और भाषा की लोकचेतना के कमजोर होने पर दोनों कमजोर पड़ जाती है। ‘भाषा और विधि में जुड़वा बहन का संबंध बताते हुए कहा कि ‘सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में हिन्दी की व्यवस्था नहीं है।

आज के समय में कैसे जिया जाय, यह एक बड़ा प्रश्न: प्रो.गिरीश्वर मिश्र

प्रोफेसर गिरीश्वर मिश्र ने कहा कि पश्चिम में ज्ञान की अवधारणा नियंत्रण पर आधारित है। विचार ही मनुष्य को पशु जगत से अलग करता है। महरौली का स्तंभ, बताता है कि भारतीय ज्ञान केवल परमार्थिक नहीं है।‘ आज के समय में विकास और सोच पर प्रश्चचिह्न लगाते हुए डा. मिश्र ने कहा कि, आज के समय में कैसे जिया जाए, यह एक बड़ा प्रश्न है।

जींस वाली मम्मी आंचल कहां से लाएंगी: डाक्टर बलदेव

वहीं एपीसेन सभागार में हिन्दी सेवी संस्थाएं सत्र की अध्यक्षता करते हुए डाक्टर बलदेव भाई शर्मा ने कहा कि भाषा के विविध रूप अवश्य है पर उनकी आत्मिक चेतना एक ही है। भारतीय भाषाओं की आत्मिक चेतना को जगाने में संस्थाओं का विशेष योगदान है। भारतीय भाषाओं में जो भाव है वह अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में कहां? मां का आंचल सिर्फ एक कहावत रह जायेगी। जींस वाली मम्मी आंचल कहां से लाएगी। मां और मम्मी दोनों शब्दों का भावबोध अलग-अलग हैं। अंग्रेजी को साथ सामाजिक पारिवारिक भावबोध विकृत हो रहा है। मातृभाषा के बिना संस्कृति का संरक्षण सम्भव नहीं है।

आज दक्षिण भारत में हिन्दी का विरोध: डाक्टर उदय

डाक्टर उदय प्रताप सिंह ने कहा कि कानपुर में लिखा गीत झण्डा ऊॅचा रहे हमारा गीत स्वतंत्रता आंदोलन में चेन्नई तक गाया जा रहा था, जबकि आज दक्षिणी भारत में हिन्दी का विरोध हो रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि हम लोग दक्षिण की भाषा और साहित्य को पढ़ना बन्द कर दिए हैं।‘

भारत एक कमंडल, यहां सभी भाषाएं विद्यमान: प्रोफेसर निर्मला मौर्य

तमिलनाडु हिन्दी साहित्य अकादमी की अध्यक्ष प्रोफेसर निर्मला मौर्य ने कहा कि जिस प्रकार से कमण्डल के जल में सभी प्रकार का जल होता। उसी प्रकार भारत एक कमण्डल है, जिसमें सभी भारतीय भाषायें विद्यमान हैं। दक्षिण में तुलनात्मक शोध पर ज्यादा कार्य हो रहा है। सत्र संचालन प्रीति सिंह ने किया।

अन्य भाषाओं की तुलना में हिन्दी में नये शब्दों का जन्म कम हो रहा- प्रो. भूमिक देव

वहीं मालवीय सभागार में आयोजित- ‘‘हिन्दी में विज्ञान लेखन” की सत्र की अध्यक्षता प्रोफेसर भूमिक देव ने की। अध्यक्ष ने कहा कि विज्ञान का सूर्य हिन्दी की वर्णमाला पर चमकता है। उन्होंने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि अन्य भाषाओं की तुलना में हिन्दी में नए शब्दों का जन्म कम हो रहा है, जबकि हम अपनी मातृभाषा में अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति सबसे सरल तरीके से कर सकता है।

विषयों की सीमाएं तोड़ने की कोशिश करनी होगी-प्रो. निमिष

प्रो. निमिष कपूर ने कहा कि हमें विषयों की सीमाएँ तोड़ने की कोशिश करनी होगी। हमें शोध या तकनीकी भाषा की बजाय सहज भाषा में लोगों तक पहुँचाना होगा। प्रो. किशोर पवार ने हिन्दी में अच्छा विज्ञान लेखन कैसे हो व हम किन विषयों का चुनाव करे इस बारे में अपनी बात रखी।

आकस्मिक असुविधाओं से जो आचार्य बचाए वहीं छात्र है- शैलेन्द्र नाथ

वहीं एपीसेन सभागार के दूसरे सत्र में ‘भारतीय संस्कृति में पारस्परिक सद्भाव विषय पर अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए प्रोफेसर शैलेन्द्र नाथ कपूर ने कहा कि ‘‘क्रियाएं जो मनुष्य में सरलता का संचार करे वही संस्कृति है। आकस्मिक असुविधाओं से जो आचार्य को बचाए वही छात्र है। सत्यप्रकाश पाल ने अरूणांचल प्रदेश की जनजातियों की संस्कृति पर प्रकाश डाला। प्रोफेसर योगेन्द्र प्रताप सिंह ने बताया कि राष्ट्रीय संस्कृति की अवधारणा देश की सांस्कृतिक एकता भिन्न रूप में भाषा के द्वारा ही व्यक्त होती है। भक्ति साहित्य में भारतीय साहित्य के सूत्र विद्यमान हैं।

संस्कृति जातियों से नहीं, बल्कि जातियां संस्कृति से बनती है- डा. इन्दुशेखर तत्पुरुष

डाक्टर इन्दुशेखर तत्पुरूष जे कहा कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राजनीतिक राष्ट्रवाद दोनों अलग-अलग अवधारणाएं हैं। दिनकर ने संस्कृति के चार अध्याय पुस्तक में भारत की संस्कृति को सामसिक संस्कृति बताया। संस्कृति जातियों से नहीं बल्कि जातियां संस्कृति से बनती हैं। मालवीय सभागार में “समेकित भारतीय साहित्य” सत्र की अध्यक्षता करते हुए महाष्ट्र से पधारे दामोदर खड़से ने हिन्दी मराठी साहित्य का संबंध इतिहास और वर्तमान के आलोक में दर्शाया। उन्होंने बताया कि हिन्दी मारठी संबंधों की शुरुआत शिवाजी के समय से हुई, जिसे भूषण ने और पुष्ट कर दिया।

ये भी रहे मौजूद

कार्यक्रम में प्रोफेसर राजनारायण शुक्ल, प्रोफेसर योगेन्द्र प्रताप सिंह, प्रो. पवन अग्रवाल, प्रो. रमेश चन्द्र त्रिपाठी, संस्थान निदेशक सुशील कुमार मौर्य, प्रो. प्रेम शंकर तिवारी, प्रो. केडी सिंह, प्रो. परशुराम पाल, प्रो. श्रुति , प्रो. अलका पाण्डेय, प्रोफेसर दुर्गेश आदि उपस्थित रहे।

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