शिवसेना के दोनों हाथों में लड्डू!

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नवेद शिकोह

महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के सिर पर कांटों भरा ताज नहीं है। शिवसेना सिर्फ खुद के बूते पर बहुमत से जीतकर भी इतने मज़े में सरकार नहीं चला पाती जितनी धौस से कांग्रेस-एनसीपी की बैसाखी से सरकार चलायेगी। मुख्यमंत्री की शपथ लेते ही जिस तरह से उद्धव ठाकरे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सम्मान में अपनी भावना व्यक्त की तब से लग रहा है कि अब एनसीपी-कांग्रेस को उद्धव बैकफुट पर ला सकती है। और दूसरी तरफ भाजपा शिवसेना से पुरानी दोस्ती को पुनर्जीवित करने के लिए तैयार रहेगी। शिवसेना की मंशा ये होगी कि यदि कांग्रेस-एनसीपी ने चाल चलकर भाजपा-शिवसेना के बीच यदि सदा के लिए दूरियां पैदा करने की साजिश रचे है तो शिवसेना अपने इन सहयोगी दलों की चाल के बदले चाल चल सकती है।

हो सकता है कि मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे कांग्रेस-एनसीपी की एक ना चलने दें। खूब नजरअंदाज करें। बैकफुट पर आयें। ऐसे में शिवसेना के ये सहयोगी दल सरकार गिराने की धमकी तक नहीं दे सकते। क्योंकि भाजपा शिवसेना को समर्थन देकर उसकी सरकार बचाने के सुनियोजित इरादों की थाल सजा कर बैठी होगी। गौरतलब ये है कि भाजपा और शिवसेना दोनों को आपसी दुश्मनी से नुकसान और दोस्ती से लाभ होगा। एनसीपी यदि अपनी राजनीति चालों के साथ शिवसेना और भाजपा के झगड़े में भाजी नही मारती तो शायद भाजपा-शिवसेना के बीच विवाद सुलझ भी जाता।

दरअसल कुर्सी के झगड़े में शिवसेना को भाजपा के आगे झुकना गवारा नहीं था। लेहाज़ा दशकों पुरानी दोस्ती तोड़कर शिवसेना अपनी विचारधारा से विपरीत कांग्रेस और एनसीपी के साथ सरकार बनाने में कामयाब हो गई।

महाराष्ट्र की सियासत के इस उलटफेर में शिवसेना पर उठने वाले तमाम सवालों का हर जवाब ये साबित कर रहा है कि शिवसेना इतना बड़ा फैसला और समझौता करने के बाद भी आत्मविश्वास मे है। हिन्दुत्व, महाराष्ट्र और मराठों पर आधारित राजनीति के लिए जाने जाने वाले इस दल के दोनों हाथों मे लड्डू हैं। क्योंकि शिवसेना के सामने खड़े हर गंभीर सवाल का माक़ूल जवाब है।

सवाल नंबर एक: धर्मनिरपेक्ष दलों और हिन्दुत्ववादियों का बेमेल मिलन स्थाई कैसे हो सकता है ?

हिन्दुत्वादी व्यक्ति या दल धर्मनिरपेक्ष क्यों नहीं होगा! जब देश का संविधान बताता है कि भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, तो ज़ाहिर सी बात है देश का हर नागरिक धर्मनिरपेक्ष ही हुआ। कम्युनिस्ट हों, हिन्दुवादी हों या मुस्लिम प्रेमी हर कोई राष्ट्र प्रेमी तो है ही। और हमारा राष्ट्र ही धर्मनिरपेक्ष है। हिन्दुत्व की रक्षा-सुरक्षा, मान-सम्मान को आगे बढ़ाने वाला हिन्दुत्वादी होता है। और हिन्दुत्वादी राष्ट्रवादी भी है। तो फिर राष्ट्र के संविधान की धर्मनिरपेक्षता से हिन्दुत्वादी क्यों परहेज करेगा !

सवाल नंबर दो: किसी के आगे कभी ना झुकने वाली शिवसेना कांग्रेस और एनसीपी के आगे झुक कर क्या अपनी छवि का नुकसान नहीं कर लेगी ?

हरगिज़ नहीं। सियासत में हर कोई चालें चल कर ही आगे बढ़ता है। शायद कांग्रेस और एनसीपी ने चाल चल कर शिवसेना और भाजपा के बीच समझौते की गुंजाइश को खत्म कर दिया था। इनका चाल चलना इसलिए भी जरूरी था कि यदि ये करते तो शायद महाराष्ट्र में एनसीपी या कांग्रेस के टूट जाने का डर था। चर्चाएं ये भी है कि शरद पवार और अहमद पटेल ने मिलकर अपने अपने दलों को टूटने से बचाने के और शिवसेना और भाजपा के बीच हमेशा-हमेशा से रिश्ता तोड़ने के लिए एनसीपी के टूटने का ड्रामा रचा। शरद पवार और अहमद पटेल जैसे दिग्गजों के निर्देशन में इस ड्रामे की मुख्य भूमिका अजित पवार ने निभाई।

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