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    Home»धर्म»Spirituality

    मरी माता मंदिर : भारी संकटों से बचाती हैं मरी माता

    ShagunBy ShagunMay 18, 2025Updated:May 21, 2025 Spirituality No Comments8 Mins Read
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    लखनऊ सुल्तानपुर राजमार्ग पर स्थित अर्जुनगंज में है घंटी वाला मरी माता का मंदिर

    उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ रेलवे स्टेशन से मात्र तेरह किलोमीटर की दूरी पर अर्जुनगंज, लखनऊ-सुल्तानपुर राष्ट्रीय राज मार्ग पर ‘घंटी वाला मंदिर’ जिसे पांच लाख ‘घंटी वाला मंदिर’ या ‘मरी माता के मंदिर’ के नाम से भी जाना जाता है ये मंदिर काफी दूर -दूर तक प्रसिद्ध है। इस मंदिर के लिए लखनऊ जनपद एवं आसपास के गॉंवों एवं कस्बों के लोगों में इसकी बहुत जबरदस्त आस्था है। लोगों का मानना है कि यहां मांगने वाली हर मुराद पूरी होती है। इस मंदिर की देखभाल एक महिला द्वारा की जा रही है, इससे पहले उनके पिता मंदिर की देखभाल किया करते थे। लोगों की मानें तो मंदिर करीब 150 वर्ष पुराना मंदिर है।

    इस मंदिर के पास से गुजरने वाली सुल्तान पुर सड़क पर एक पुल है बताते हैं एक बार लोगों से भरी हुई एक बस इस पुल के नीचे गिर गई, लेकिन किसी को कुछ भी नहीं हुआ। उस वक्त से आसपास के लोगों को ये विश्वास हो गया कि मरी माता ने उन्हें बचा लिया। इसलिए उन लोगों ने श्रद्धा वश यहां घंटी बांध दी तब से यहां घंटी बाँधने की परंपरा चल पड़ी। ठीक इसी तरह का एक और घटना घटित हुई जो इस प्रकार है कि एक आदमी का इसी पुल पर एक्सीडेंट हो गया, लेकिन उसको भी कुछ नहीं हुआ और उसने भी इस मंदिर पर घंटी बांध दी।

    इतिहासकारों का मानना है कि मरी माता के मंदिर अधिकतर नदी के किनारे पाये जाते हैं। मरी माता मुख्य रूप से रजक या धोबी समाज की देवी है। धोबी लोग नदी के किनारे, जहां पर धोबी घाट बनाते हैं और कपड़े धोते थे। वहां पर मरी माता के मंदिर बनाते थे। लखनऊ में सई नदी के किनारे और अर्जुनगंज में भी मरी माता के मंदिर हैं लेकिन सबसे पुराना मंदिर पहले पक्के पुल के पास गोमती के किनारे था। पक्का पुल बनाते समय अंग्रजों ने पुराने मंदिर को हटा दिया। पक्के पुल को लाल पुल लाल पुल और हार्डिंग ब्रिज भी कहते है। अब इस पुल के पास रस्तोगी घाट पर मरी माता का नया मंदिर बना दिया गया है। इसके पास ही लेटे हुये हनुमान जी का मंदिर है। जिसको अहिमर्दन हनुमान मंदिर भी कहा जाता है।

    इसाई समाज के लोग भी मरियम माता का मंदिर बना कर उनकी पूजा करते हैं। लोक भाषा में उनका नाम भी बिगाड़कर मरी माई हो गया है। गांव और कस्बों में कई क्षेत्रीय देवी देवता होते है जैसे बरम बाबा, बीर बाबा आदि। लोग विभिन्न अवसरों पर उनकी पूजा करते हैं। इनको भूत-प्रेत के ऊपर के उप देवता के रूप मे मान्यता प्राप्त है। लोक विश्वास है कि प्रसन्न होने पर ये देवता उनकी रक्षा और मदद करते हैं। मरी और परी जैसी देवियाँ इसी लोक विश्वास और परम्परा में आती है।

    इस घटना के कुछ वर्षों के बाद लोगों की एक और आस्था यहां से जुड़ गई लोगों में ये विश्वास है कि यहां जो भी मुराद मांगों वो पूरी हो जाती है। मंदिर की देख भाल करने वाली महिला का कहना है कि बहुत पहले की बात है, एक आदमी गूंगा था। उसने यहां आकर अपनी जुबान काट दी और माता के सामने चढ़ा दी। लेकिन बिना जुबान के भी वह व्यक्ति बोलने लगा और अनेक वर्षों तक जिंदा रहा।

    इस घटना के बाद से लोगों में ये विश्वास और पक्का हो गया कि मंदिर में निश्चित रूप से कोई चमत्कारिक शक्ति हैं और यहां जो भी आता है, वो घंटी बांधकर जरूर जाता है।

    इसी तरह की एक और घटना को याद कर बताते हुए यहां की देखभाल करने वाली वह महिला कहती हैं कि ये हाईवे है और दिन-रात यहां से बड़ी-बड़ी गाड़ियां आती-जाती रहती हैं। मंदिर बिलकुल फुटपाथ पर बना है। मेरी बच्ची छह वर्ष की हो गई है। मैं दिनभर यहीं रहती हूं। उसने जबसे अपने पैरों पर चलना शुरू किया है, कभी भी सड़क की ओर नहीं गई। ऐसा लगता है कि माता जी ने उसे अपनी सुरक्षा में रखा है।

    मंदिर के ही पास में रहने वाले राजकुमार कहते हैं, पिछले पैंतीस वर्षों से मैं यहां लगातार पूजा कर रहा हूं। एक बार मेरी पत्नी बहुत बीमार पड़ गई। वो चल-फिर नहीं पा रही थी। मैंने मन्नत मांगी कि अगर वो चलना शुरू कर दे, तो मैं यहां पर घंटा बांधूंगा।
    मन्नत मांगने के कुछ दिन बाद ही पत्नी स्वस्थ होने पर हमने यहां आकर घंटा बांधा।

    मंदिर के सामने बड़ी से बड़ी दुर्घटना हो जाने पर किसी की जान नही जाती है। मंदिर के पास ही दुकान लगाने वाले एक व्यक्ति वेदप्रकाश का कहना हैं कि मैं मुजफ्फरनगर का रहने वाला हूं, लेकिन लखनऊ आता-जाता रहता था। पिछले पैंतीस वर्षो से मंदिर में पूजा-अर्चना कर रहा हूँ।

    अभी विगत छह वर्षों से मैं यहीं पर आकर रहने लगा हूँ। पास ही में मेरी दुकान है। यह एक खास बात है, कि इस पुल पर किसी का भी अगर एक्सीडेंट हो भी गया तो कभी उसकी जान नहीं गई। हाइवे से गुजरने वाले बस-ट्रक के ड्राइवरों एवं अन्य भक्तों द्वारा यहां पर समय पर आज भी यहां घंटियां बांधी जाती हैं।

    मरी माता के मंदिर के दरबार में जो आया खाली नहीं लौटा:

    माता की एक भक्त नीतू सिंह ने बताया कि बात 2014 की है उन्होंने बताया कि मैंने एक दिन सपने में देखा कि मैं माता के दरबार में हाथ जोड़े खड़ी हूं और आशीर्वाद मांग रही हूं, तभी मैंने देखा नीले आकाश से बहुत सारे खूबसरत और गोरे- गोरे छोटे छोटे बच्चे पालथी मारकर उड़ते हुए नीचे मेरी ओर आ रहे हैं वह स्वप्न एकदम अद्भुत था जिसे मैं कभी भूल नहीं सकती। उसके कुछ समय बाद मुझे एक खूबसूरत पुत्र की प्राप्ति हुई यह मेरे जीवन का एक माता रानी के आशर्वाद का सबसे बड़ा चमत्कार था उन्होंने बताया कि मैं आज भी जब कभी उधर जाती हूं तो माता रानी के दर्शन जरूर करती हूं।

    मंदिर की पुजारिन ने बताया कि यह मंदिर करीब तीन सौ साल पुराना है। उसने एक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि बात बहुत पुरानी है अंगरेजो के ज़माने में उस समय सड़क का निर्माण हो रहा था उस दरम्यान यहां इस वीराने में सड़क बनने में बड़ी दिक्कत आ रही थी, उन दिनों वहां काम कर रहे मजदूरों में से किसी एक को सपने में ‘माता रानी’ ने दर्शन दिए जिससे उन्होंने कहा कि यदि यहां पर मेरा मंदिर बनवाओगे तो सड़क जल्दी बन जाएगी।

    उसने यह बात अपने अधीनस्थों को बतायी। उसके बाद यहां पर माता रानी का मंदिर स्थापित किया गया जिसके बाद सड़क निर्माण में कोई बाधा नहीं आयी।

    उन्होंने बताया कि इस मंदिर के प्रति लोगों कि आस्था बहुत है लोग दूर दूर से आते है और अपनी मुरादे पूरी पाते हैं। जिनकी मुरादें पूरी हो जाती हैं वह यहां घंटियां चढ़ाते हैं। पुजारिन ने बताया कि लोग यहां मुराद पूरी होने पर सोने की भी घंटियां चढ़ा जाते हैं।

    पुजारिन का यह भी कहना हैं कि जो भी यहां सच्चे दिल से मुराद मांगता है माता रानी उसकी मुराद पूरी जरूर करती हैं।

    एक तथ्य यह भी:

    राजधानी लखनऊ इतिहास में नवाबों का शहर रहा है यहां पर के भूलभुलैया और इमामबाड़ा से हम सभी लोग परिचित हैं लेकिन उसी क्षेत्र में भूलभुलैया से महज 100 मीटर की दूरी पर एक और मरी माता का मंदिर है जो कि कई वर्षों पुराना है।

    आखिरकर इस मंदिर का नाम मरी माता क्यों हैं?

    इस मंदिर के ट्रस्टी के पूर्वजों द्वारा श्री रामावतार जी को बताया गया था कि यह मंदिर करीब सन 1700 में बना था। इस मंदिर के आसपास के लोगों द्वारा बताया गया कि इस बात की पुष्टि तो आज तक किसी ने नहीं की इस मंदिर को ‘मरी माता का मंदिर’ क्यों कहते है, हां लेकिन ऐसी किंवदंती है कि माता पार्वती जब सती हुई तो उन्ही को मरी माता का स्वरुप माना गया है।

    मंदिर में मौजूद कुछ वरिष्ठजनो का कहना है कि इस मंदिर का पूजन सन1955 में शुरू हुआ था लोगों ने धीरे-धीरे आना शुरू किया तो मंदिर प्रसिद्ध हो गया।

    सरयू तट के किनारे भी है एक ‘मरी माता का मंदिर’

    राजधनी लखनऊ से महजब 130 किलोमीटर की दूरी पर स्थित उत्तर प्रदेश राज्य के बहराइच जिले में सरयू तट के किनारे पर स्थापित मरी माता की पिण्डी देवी भक्तों के आस्था का एक बहुत बड़ा केन्द्र है। प्रत्येक वर्ष चैत्र नवरात्र व शारदीय नवरात्र में यहां विशाल मेला लगता है। नवरात्र के अवसर पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु मरी माता का दर्शन करने आते हैं।

    न्यूज़ सोर्स : हेमंत / जी.के चक्रवर्ती

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