छत्तीसगढ़ में बच्ची का शव ठेले पर ले जाने को मजबूर हुआ परिवार

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सवेंदनहीन लोग: अस्पताल ने उनसे आधे घंटे इंतज़ार करने को कहा क्योंकि दोनों वाहन शव पहुंचाने गए हुए थे, लेकिन वे नहीं माने. थोड़ी देर बाद ठेले के पीछे एंबुलेंस पहुंच भी गई, लेकिन मृतक के रिश्तेदारों ने शव को गाड़ी में रखने से इनकार कर दिया

नई दिल्ली 18 अगस्त: छत्तीसगढ़ के राजनंदगांव में एक परिवार को अपनी बच्ची का शव ठेले पर ले जाना पड़ा. आरोप है कि जिला अस्पताल ने शव ले जाने के लिए शव वाहन पहले तो देने से इंकार कर दिया, बाद में लेट-लतीफी करने लगे, जिससे नाराज़ परिजनों ने किराये पर ठेला लिया और उसमें ही शव ले गए।

छुरिया के बखरूटोला में 17 साल की खिलेश्वरी ने शनिवार को आत्महत्या कर ली. शनिवार रात उसका शव मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में ही रखा गया। रविवार को पोस्टमार्टम होना था। परिजनों का आरोप है कि पहले पोस्टमार्टम के लिए उनसे रिश्वत मांगी गई, इंकार करने पर काफी देर बाद पोस्टमॉर्टम हुआ. शव को घर ले जाने के लिए उनके अनुरोध के बावजूद गाड़ी का इंतज़ाम नहीं हुआ. ऐसे में दोपहर 3.15 बजे मृतक के रिश्तेदारों ने एक ठेला लिया और उसमें शव रखकर ले जाने लगे।

मामले में राजनांदगांव के कलेक्टर भीम सिंह ने कहा कि रिश्वत की कोई बात नहीं है. अस्पताल में दो शव वाहन हैं, दोपहर 2.45 पर पोस्टमॉर्टम खत्म हुआ. अस्पताल ने उनसे आधे घंटे इंतज़ार करने को कहा क्योंकि दोनों वाहन शव पहुंचाने गए हुए थे, लेकिन वे नहीं माने. थोड़ी देर बाद ठेले के पीछे एंबुलेंस पहुंच भी गई, लेकिन मृतक के रिश्तेदारों ने शव को गाड़ी में रखने से इनकार कर दिया. इस मामले को लेकर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने अस्पताल में हंगामा भी किया. कलेक्टर के आश्वासन के बाद ही उन्होंने आंदोलन खत्म किया।

इससे पहले उत्तर प्रदेश के कौशांबी ज़िले में भी एक मामा अपनी छह महीने की मासूम भांजी का शव साइकिल पर ले जाने को मजबूर हुआ था. मृतक बच्ची के मामा का कहना है कि अस्पताल से लाख मिन्नत करने के बावजूद शव वाहन मुहैया नहीं कराया गया, जिसके बाद अपनी भांजी का शव घर तक ले जाने के लिए उसे साइकिल का सहारा लेना पड़ा. मामला कौशांबी जिले के सिराथू तहसील के मलाकसद्दी गांव का था। यहां रहने वाले एक शख्स की 6 महीने की बेटी को सुबह अचानक उल्टी-दस्त होने लगा था. उसे जिला अस्पताल लाया गया. इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई. अनंत कुमार ने बताया कि जब वह एम्बुलेंस के ड्राइवर के पास गया तो उसने 800 रुपए मांगे. पैसे न होने की बात कहने पर उसने शव ले जाने से मना कर दिया. डॉक्टरों से बात की तो उन लोगों ने शव वाहन का नंबर दिया। उस नम्बर पर फोन करने पर ड्राइवर ने कहा कि गाड़ी में तेल नहीं है. इसी बीच बच्ची का मामा आ गया और अपने बहनोई को रोते बिलखते देखा तो उसने शव को कंधे पर उठाया और साइकिल से 10 किलोमीटर दूर गांव को चल दिया।

पिछले साल ओडिशा के कालाहांडी के सरकारी अस्पताल से शव वाहन नहीं मिलने पर दाना माझी को पत्नी की लाश कंधे पर लेकर 10 किलोमीटर जाना पड़ा था. इस दौरान उसकी 12 साल की बेटी भी रोती-बिलखती साथ चल रही थी.इटावा में भी एक शख्स को अपने 15 साल के बेटे का शव सरकारी अस्पताल से कंधे पर लादकर घर ले जाना पड़ा था।

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