वैसे तो लखनऊ महोत्सव का समापन कल नौ दिसंबर को हो गया था लेकिन सजी सजाई खूबसूरत दुकानें को समेटे-समेटे हुए आज दस तारीख हो गयी, वैसे आज खरीददारों की भीड़ भी कुछ ज्यादा दिखी, जो कल खूबसूरत स्टालों पर सामानों के रेट आसमान छू रहे थे आज ‘लखनऊ महोत्सव’ के आखिरी दिन मामूली गिरावट के साथ वह आसानी से मिल रहे थे। आज लोगों ने इस मौके पर जमकर खरीददारी भी की।
बता दें कि आयोजन समिति, जिसमें प्रमुख पदों पर प्रशासनिक अधिकारी होते हैं, हर साल एेसे फिल्मी कलाकारों को बुलाती है जो भीड़ जुटा सकें और जिनसे टिकटों की बिक्री हो सके। इस प्रकार महोत्सव परिसर भी किसी विशाल बाजार का रूप ले लेता है। ऐसे महोत्सवों का यही हाल होता है, बाजार सज जाते हैं और शामें फिल्मी कलाकारों के कार्यक्रमों से रंगीन की जाती हैं।

लेकिन सवाल यह है कि क्या एेसे महोत्सवों की कल्पना लोगों की भीड़ जुटाने या ज्यादा से ज्यादा टिकट बेंचकर मुनाफा कमाने के लिए की गई थी? क्या सरकार के सारे कामों, योजनाओं के पीछे लाभ कमाने की ही दृषि्ट है? क्या एेसे महोत्सवों का उद्देश्य बालीवुड की शामें सजाकर फिल्मी गानों पर ठुमके लगा लेना है? आखिर सरकार ने संस्कृति या पर्यटन विभाग और उनके अन्तर्गत संगीत नाटक अकादमी, ललित कला अकादमी, भारतेन्दु नाट्य अकादमी, कथक केंद्र जैसे अकादमियों, संस्थानों की स्थापना किन उद्देश्यों से की है? निश्चय ही इनका उद्देश्य कलाओं के संरक्षण और उनसे जुड़ी प्रतिभाओं के प्रोत्साहन का है। यह विडंबना है कि पिछले कई वर्षों से लखनऊ महोत्सव की शाम कभी शिवकुमार शर्मा के संतूर, राशिद खान या अश्विनी भिड़े के गायन, शाहिद परवेज या बुद्धादित्य मुखर्जी के सितार या जाकिर हुसैन के तबला से नहीं सजी । लखनऊ और कथक से जुड़े होने के कारण कभी बिरजू महाराज के कार्यक्रम हुए थे लेकिन अब वे भी बंद हैं।उन अधिकारी परिवारों को ये कलाएं शायद रास नहीं आतीं जिनका महोत्सव की दर्शक दीर्घा की अग्रिम कतारों पर कब्जा होता है!







