फैज़ से कमज़ोर नहीं है हिन्दुस्तानी दुष्यंत की क्रांति…

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सरकार विरोधी आंदोलनकारियों को क्यों एक पाकिस्तानी का सहारा लेना पड़ा !

नवेद शिकोह

भारत के मशहूर कवि दुष्यंत ने भारतीय जनमानस में जनविरोधी सत्ता के विरुद्ध जज्बा पैदा करने के लिए कविताएं-नज्में लिखीं थीं। जबकि पाक्रिस्तानी शायर फैज असमद फैज की नज्म सभी आम भारतीय नागरिकों की समझ से परे है। बल्कि उनकी नज्म कन्फयूज़ करने वाली है। गलतफहमी पैदा करके कानून व्यवस्था और साम्प्रदायिक सौहार्द को नुकसान पंहुचा सकती है। हांलाकि फैज की नज्म- हम देखेंगे.. जब सार्वजनिक स्थानों पर गायी जा रही थी और कुछ लोगों ने उसके बोल- काबे से बुत हटाये जायेंगे.. पर एतराज किया तब जावेद अख्तर, मुनव्वर राना जैसे तमाक्ष उर्दू विद्वानों ने बताया कि यहां बुतों का आशय धार्मिक मूर्तियों से नहीं बल्कि तानाशाह और जनविरोधी शासक से है।

आजकल सरकार विरोधी प्रदर्शनी में फैज़ अहमद फैज़ की ये नज़्म खूब गायी जा रही है। अब आप खुद इस पाकिस्तानी शायर की नज़्म पर ग़ौर कीजिए। साथ ही देश के मशहूर और जनप्रिय क्रांतिकारी कवि/शायर दुष्यंत कुमार की रचना भी पढ़िए। दोनों को पढ़ कर महसूस कीजिए कि जब आम भारतीयों के लिए आम भाषा में दुष्यंत कुमार जैसे तमाम भारतीय रचनाकारों की रचनाएं लोगों के लबों पर रहती हैं तो फिर इन दिनों क्रांति की अलख जलाने का प्रयास करने वाले प्रदर्शनकारी पाकिस्तानी शायर फैज अहमद फैज़ की आम लोगों को ना समझ मे आने वाली नज़्म क्यों पढ़ रहे हैं। आप खुद भारतीय दुष्यन्त और पाकिस्तान फैज़ की इन रचनाओं पर ग़ौर कीजिए –

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

– दुष्यन्त कुमार

“हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लोह-ए-अज़ल में लिखा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां
रुई की तरह उड़ जाएँगे
हम महकूमों के पाँव तले
ये धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएँगे
हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएँगे
सब ताज उछाले जाएँगे
सब तख़्त गिराए जाएँगे

बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
उट्ठेगा अन-अल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
और राज़ करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो”

– फैज़ अहमद फैज़

दुष्यंत कुमार जैसे भारत के दर्जनों क्रांतिकारी कवि-शायर ग़ुजरे हैं जिनकी रचाएं किसी भी क्रांति की अलख जलाने के लिए काफी हैं। दुष्यंत, नागार्जुन, धूमिल, रामधारी दिनकर, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, अदम गोंडवी, शमशेर बहादुर सिंह, अवतर सिंह, राजेश जोशी जैसे दर्जनों दर्जनों भारतीय रचनाकारों की रचनाएं जनविरोधी सरकारों पर सवाल उठाती हैं। हमेशा से ही भारतीय रचनाकारों की कालजयी रचनाएं आम जनता की आवाज बनती रही हैं। इन रचनाओं में कोई कन्फ्यूजन नहीं। बिल्कुल स्पष्ट। इन कालजयी भारतीय रचनाकारों की रचनाएं आम इंसान के समझ में आसानी से आ जाती हैं। आम बोलचाल की आम भाषा में सैकड़ों चर्चित रचनाएं किसी भी आंदोलन की हुंकार भरने में काफी है।

तो फिर इन दिनों सत्ता विरोधी आंदोलनकारियों ने दुष्यंत कुमार जैसे कवियों-शायरों की रचनाओं के बजाये पाकिस्तानी शायर फैज़ अहमद फैज की नज्म का सहारा क्यों लिया।

हम देखेंगे..
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे..

जबकि ये नज्म विवादों का कारण भी बनी। विवाद होना लाज़मी भी था। क्योंकि इसमें काबे से बुत फिकवाने जैसे शब्द आम ग़ैर उर्दू भाषी भारतीयों को कंफ्यूज कर रहे थे। दुनियाभर के मुसलमानों के तीर्थ काबे का इतिहास की इस बात से सभी एकमत हैं कि जिस स्थान पर काबा बना वहां पहले मूर्ति पूजा होती थी। मूर्तियों (बुतों ) को हटा कर उस स्थान पर काबा बना था। ये इतिहास अपनी जगह है और इसी के साथ भारत में अयोध्या में राम मंदिर- बाबरी मंदिर विवाद दशकों तक विवाद बना। आरोप लगे कि बाबर ने सैकड़ों वर्ष पहले राम जन्मभूमि पर बने मंदिर को टुड़वाकर बाबरी मस्जिद बना ली थी। ये आरोप साबित तो नहीं हो सके किंतु इतिहास के तमाम पहलुओं से पैदा शंकाओं ने बहुसंख्यक समाज की बड़ी आबादी के दिलो दिमाग मे ये शंका पैदा कर दी कि मूर्ति पूजा के खिलाफ इस्लाम में मूर्तियों (बुतों) को हटा कर अपना धार्मिक स्थल बनाया जाता है। भले ये बात गलत है , एक गलतफहमी बनी हुई हो। ऐसे ही फैज की नज्म में –

जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाये जायेंगे..

का आशय भले ही धार्मिक मूर्ति से क़तई नहीं है, लेकिन बुत यानी मूर्ति उठवाई जानी की बात करने वाली क्लिष्ठ उर्दू के शब्दों और अर्थों वाली नज्म गलतफहमी तो पैदा करेगी। बुत हटाने की बात करने वाली ये नज्म जब आम पब्लिक में पढ़ी जायेगी तो जाहिर सी बात है कि इसकी असली मीनिंग आम इंसान नहीं समझ सकेगा। और फिर लोगों को गलतफहमी होगी कि पाकिस्तानी शायर ने अपनी इस नज्म में मूर्ति हटवाने की बातकही है।

ऐसे में सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे विरोधियों पर आरोप लगाने वालों को बल मिलेगा। प्रदर्ननकारियों पर आरोप लगाने वाले ये भी कह रहे हैं कि चंद वामपंथियों और पाकिस्तान परस्त ही.एकजुट होकर विरोध प्रदर्शन कर रहे है। इस तरह के आरोपों को धता बताते हुए ही CAA, CAA , मंहगी शिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, और लगातार बढ़ रही आर्थिक बर्बादी के खिलाफ सड़कों पर उतरे देश के आंदोलनकारियों ने अब तिरंगा और राष्ट्रगीत, कौमी तरानों के साथ भी अपने आंदोलन को धार दी है।

किंतु बेहतर ये भी होगा कि आंदोलनकारी पाकिस्तानी शायर फैज की नज्म के बजाये दुष्यंत कुमार जैसे किसी भारतीय क्रांतिकारी कवि की रचनाओं के साथ क्रांति की मशाल जलायें।

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