साहित्य समाज का दर्पण होता है, समाज और साहित्य एक दूसरे के परस्पर अवलम्बी हैं: राज्यपाल
राज्यपाल ने इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुये कहा कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। साहित्य की मूल चेतना और भावना अथवा आधार मानव और समाज की उन्नति है। वास्तव में आत्मा और शरीर का जो संबंध है वही संबंध साहित्य और समाज का भी है। साहित्यकार जिस साहित्य की रचना करता है उसकी जड़ें समाज से ही विषय वस्तु प्राप्त करती हैं। आदिकाल, भक्तिकाल और आधुनिक काल में जिस साहित्य की सृजना हुई वह तत्कालीन समाज का दर्पण है। शब्द, भाषा एवं भाव का उपयोग लोगों को जोड़ने के लिये किया जाना चाहिये। साहित्य को देखने के अलग-अलग दृष्टिकोण हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि समाज और साहित्य एक दूसरे के परस्पर अवलम्बी हैं।श्री नाईक ने कहा कि सुखद संयोग है कि आज साहित्य महोत्सव का उद्घाटन ‘संविधान दिवस’ के अवसर पर किया जा रहा है। संविधान को अंगीकार किये हुये 68 वर्ष हो गये हैं। इतना बड़ा देश जिसमें 29 प्रदेश, 6 संघ शासित राज्य हैं, सबकी अपनी-अपनी भाषायें हैं परन्तु पूरा देश एक संविधान से बंधा है। संविधान के शिल्पी बाबा साहेब ने देश के सबसे बड़े साहित्य की रचना की थी।
उन्होंने इस बात पर चिंता भी व्यक्त की कि पूर्व में कई जगह संविधान शिल्पी बाबा साहेब का सही नाम नहीं लिखा जाता था जिसे उनके प्रयास से ठीक किया गया। आपातकाल को छोड़ दिया जाये तो देश का संचालन संविधान के अनुरूप सफलता से आज तक संचालित हो रहा है। संविधान के प्रति हम प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने कहा कि संविधान के शब्द और प्रस्तुतिकरण भी संुदर हैं तथा देश को चलाने के लिये संविधान सक्षम है।






