जस्टिस (रिटायर्ड) डॉ. बलबीर सिंह चौहान ने की गरीबों के पक्ष में गंभीर बहस की पहल
- लाखों में है वकीलों की फीस
- जूनियर वकील जमानत के लिए ले लेते हैं 5 से 10 हजार रुपये फीस
- सीनियर ऐडवोकेट एक पेशी के 1 लाख से 15 लाख करते हैं चार्ज
- कोई वकील अगर एक पेशी का 2 हजार रुपये भी चार्ज करता है तो रोजाना 300-400 रुपये कमाने वाला आदमी कैसे वहन करेगा
- नैशनल लीगल सर्विस अथॉरिटी गरीबों के लिए फ्री देती है वकील
नई दिल्ली 24 सितम्बर। लॉ कमिशन के चेयरमैन ने देश के मौजूदा जुडिशल सिस्टम पर सवाल खड़े कर नई बहस छेड़ दी है। जस्टिस (रिटायर्ड) डॉ. बलबीर सिंह चौहान का मानना है कि न्यायिक प्रणाली बेहद जटिल और खर्चीली है, जिससे यह गरीबों की पहुंच से बाहर हो गई है।
तिहाड़ जेल में कैदियों के अधिकारों पर आयोजित एक सेमिनार में जस्टिस चौहान ने कहा कि जमानत की शर्तें इतनी जटिल हैं कि वकील खड़ा करने तक गरीब उस मामले में तय सजा जेल में ही काट लेता है, जबकि अमीर आदमी गिरफ्तारी से पहले ही जमानत के लिए कोर्ट पहुंच सकता है। अमीरों और गरीबों के बीच इस भेदभाव के लिए उन्होंने बड़े वकीलों को जिम्मेदार ठहराया।
उन्होंने कहा कि बड़े वकील किसी भी गंभीर अपराध का बचाव कर सकते हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का रिटायर्ड जज होने के बावजूद मैं अपने किसी केस में इन महंगे वकीलों को खड़ा नहीं कर सकता। उन्होंने स्थानीय अदालतों में अंग्रेजी के बजाय क्षेत्रीय भाषाओं के इस्तेमाल की वकालत की। उन्होंने कहा कि हम एक विदेशी भाषा बोलते हैं ताकि हमारा मुवक्किल यह नहीं समझ सके कि दलीलें तर्कसंगत हैं या नहीं। जस्टिस बीएस चौहान, चेयरमैन, लॉ कमिशन ने कहा कि न्यायिक भेदभाव के लिए बड़े वकील भी जिम्मेदार हैं, क्योंकि ये काफी महंगे हैं। वे टैक्सी की तरह घंटे और रोज के हिसाब से फीस लेते हैं।

जस्टिस ढींगड़ा बताते हैं कि जब वह सेशन जज थे, तब उनके सामने एक महिला को पेश किया गया। आरोप था कि उसने रेप में मदद की है। रेप का आरोपित अपनी मां (सह आरोपित) के पास लड़की को लेकर गांव गया था और फिर फरार हो गया। पुलिस ने मां पर भी सहयोग करने का केस बना दिया था। वह छह महीने से जेल में थी क्योंकि उसके पास कोई वकील नहीं था।
जब मामला चार्ज के लिए आया तो उन्होंने केस देखा और महिला को उसी दिन आरोपमुक्त कर रिहा करने का ऑर्डर दिया। उन्होंने कहा कि कमोबेश यही स्थिति दूसरे गरीबों की है, जो वकील न कर पाने की वजह से जेल से बाहर ही नहीं आ पाते। हाई कोर्ट के रिटायर जस्टिस एस. एन. ढींगड़ा और सीनियर एडवोकेट रमेश गुप्ता भी मानते हैं कि गरीबों के लिए वकील करना मुश्किल होता है।







