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    Home»ब्लॉग

    हिन्दू समाज के स्थायी जागरण की आवश्यकता

    ShagunBy ShagunDecember 30, 2024 ब्लॉग No Comments6 Mins Read
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    डा. निशा शर्मा

    हिन्दू समाज की अपनी एक दैवीय विशेषता है जिस कारण सृष्टि के प्रारंभ से ही उसने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है। जब संसार के अन्य भागों में बोलने योग्य भाषा तक का आविष्कार नहीं हुआ था तब भारत में ऋग्वेद जैसा ज्ञान भण्डार अवतीर्ण हो चुका था। धर्म, आध्यात्म,विज्ञान,स्वास्थ्य, युद्ध, संगीत, भूगोल, खगोल आदि का ज्ञान इस महान हिन्दू जाति ने तब आविष्कृत कर दिया था जब पृथ्वी पर साधनों का पूर्ण अभाव था। जरा सोचिये स्रष्टि के आदिकाल में तब वह मस्तिष्क कितना सक्षम रहा होगा। अपने इन दैवीय गुणों के कारण ही हिन्दू समाज ने समस्त भूमंडल पर एकछत्र राज्य किया और चक्रवर्ती सम्राट कहलाये। इन भारतीय सम्राटों ने शासन सदैव ही परमार्थ की भावना के साथ किया जो ज्ञान का भण्डार उनके पास था उनका वितरण करने के लिए यहाँ के लोग सुदूर देशों को जाते थे तब वहां की जनता उनको देवदूत के रूप में पूजती थी और सम्पूर्ण संसार में उनका सम्मान होता था। यही आर्य साम्राज्य था जहाँ लोकसेवा ही शासन का आधार होता था।

    राम ने जब रावण का संहार किया तो उसकी सोने की लंका से लोहे की एक कील तक वे अयोध्या नहीं लाये और साथ ही विभीषण को सोने की लंका जस की तस सौप दी। ऐसा लोकहित से प्रेरित था अपना आर्य साम्राज्य। हमारी ये भारतभूमि , स्वर्णभूमि कहलाती थी उसका गौरव सर्वोपरि था और उस गौरव का मूल कारण था आर्यों के जातीय गुण। अपने इन गुणों की विशेषताओं के कारण ही उन्होंने सम्पन्नता प्राप्त की थी। जगतगुरु और चक्रवर्ती शासक के रूप में संसार का आत्मिक और भौतिक नेतृत्व करने का गौरव प्राप्त किया था। वसुदैव कुटुम्बकम की अवधारणा और सद्चरित्र जीवन जैसी प्रमुख विशेषताओं के कारण हिन्दू धर्म विश्व के अन्य सभी धर्मों के साथ श्रेष्ठता रखता है।

    भारत ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व के विचारक इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि हिन्दू जीवन पद्धति ही जीवन की श्रेष्ठता को प्राप्त करने का सरल और सुगम मार्ग है। फेसबुक संस्थापक मार्क जुकरवर्ग ( अमेरिका ) जो आज तकनीक के क्षेत्र में प्रेरणादायी हैं , भारत को ही ज्ञान का मंदिर मानते हैं। हमारी हिन्दू संस्कृति की यशोगाथा के अनेक उदाहरण हमारे समक्ष हैं , हमारे इतिहास का हर एक पन्ना अनुपम रत्नों से जगमगा रहा है। हमारी प्राचीन गौरव गरिमा आज एक चुनौती के रूप में हमारे सामने खड़ी है परतु खेद का विषय है कि हमने आज इस गरिमा को गवा दिया है और अपने गौरव को पुन: प्राप्त करने के लिए संघर्षरत हैं। अपने प्राचीन गौरव को खोकर पिछले एक हज़ार वर्षो में मुट्ठी भर विदेशियों और विधर्मियों द्वारा हमें पीड़ित होना पड़ा. मुग़ल काल में बड़ी संख्या में मंदिरों को ध्वस्त किया गया। काशी, मथुरा, अयोध्या आदि स्थान इसके प्रमाण हैं। परन्तु इन सभी का कारन आक्रमणकारियों की बलवान सेना नहीं बल्कि हिन्दू समाज की भीतरी दुर्बलता थी। हमारी कमजोरियां ही उन्हें मजबूत बनाती चली गयीं और हम गुलामी की जंजीरों में फसते चले गए।

    इतिहास साक्षी है जिस जाति ,देश ने अपने गौरवशाली इतिहास से प्रेरणा लेकर उसका अनुसरण नहीं किया वे इस संसार से सदा के लिए विलुप्त हो गए या यूं कहिये उन्होंने अपनी पहचान खो दी परन्तु कुछ ऐसे उदाहरण भी हमारे सामने है जिस समाज अथवा जाति ने अपनी उपस्थिति की निरंतरता बनाए रखी और विश्व में उसका आज भी एक अलग स्थान है। इंग्लॅण्ड, जर्मनी और इजराइल जैसे देशो के उदाहरण हमारे सामने हैं जहाँ के जनमानस में सामर्थ्य का जागरण उनके पालन पोषण के साथ ही किया जाता है । वह नाटको, सिनेमा,शिक्षा आदि सभी माध्यमो से एक ही प्रकार का संस्कार बालको में डाला जाता है और वह है आवश्यकता पड़ने पर अपने देश,राष्ट्र के लिए तैयार रहना।

    देशभक्ति के इस उत्कृष्ट संस्कार के कारण ही इन देशो ने अपनी आंतरिक शक्ति को आज तक बनाये रखा है परन्तु वर्तमान में जब हम अपने हिन्दू समाज की चर्चा करते हैं इस स्थायी जागरण रुपी संस्कार से हम खुद को कोसों दूर खड़ा पाते हैं और इस कारण हम दो मत नहीं हो सकते कि हमने अपने प्राचीन गौरव को अपनी निर्बलताओं के कारण ही खोया है और लम्बे समय से उस खोये गौरव को प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं। आज भले ही हमारे देश में शासन सत्ता हिन्दू हित का विचार करने वाली है परन्तु इस परिवर्तन से यह अंदाजा नहीं लगा लेना चाहिए कि हमने उचित जातीय बल प्राप्त कर लिया है। अभी इसमें भारी कमी है । आज बाग्ला देश के हिन्दू समाज की स्थति किसी से छिपी नहीं है और बांग्ला देश ही क्यों अपने देश में पश्चिम बंगाल, केरल सहित अन्य कई राज्य है जहाँ का हिन्दू समाज प्रताड़ित है। यहाँ भी इन परिस्थितियों का कारण विधर्मियो की सम्पन्नता नहीं बल्कि हमारे अपने समाज की भीतरी दुर्बलता है। कमी है हिन्दू समाज के स्वभाविक जन जागरण की और जब तक ये जागरण प्रत्येक हिन्दू के अंदर स्थायी रूप से नहीं होगा, परिस्थितियां बदलने वाली नहीं।

    यदि हमें अपने खोये गौरव को प्राप्त करने के साथ हिन्दू समाज का महिमा मंडन यथावत रखना है साथ ही अपने प्राणों की रक्षा भी करनी है तो सम्पूर्ण हिन्दू समाज को एक साथ खड़े होकर आगे आना होगा। हिन्दू समाज को ये समझना होगा कि अब चेतना के युग का आरम्भ हो चुका है , इस संस्कृति-बेला में हमें एक समाज बनकर एक सन्देश विधार्मियो को देना ही होगा। महर्षि मनु के प्रसिद्ध श्लोक “धर्मकोशस्य गुप्तेय्” अर्थात धर्म रुपी खजाने की रक्षा के लिए ही हिन्दू का जन्म हुआ है। इस विचार को प्रत्येक हिन्दू को अपने व्यवहार में लाना होगा। स्वामी विवेकानंद जी ने अपने वक्तव्य में कहा है ये आवश्यक नहीं कि हिन्दू समाज के सभी लोग हिन्दू धर्म में विशवास करें ही लेकिन यदि हम हिन्दू समाज के जातीय जीवन को स्वस्थ रखना चाहते हैं तो हमें धर्म की रक्षा के लिए सचेष्ट होना ही पड़ेगा ( स्वामी विवेकनद: हे! भारत उठो,जागो ) तभी अपूर्व महिमा से मंडित भावी भारत का निर्माण होगा।

    अपने समाज की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हमारी याददाश्त बहुत कमज़ोर होती है और इसी कारण अपने ऊपर हुए हमलो और संघर्षों को हम भुला देते हैं | इसी कारण हिन्दू समाज को पुन:पुन: जगाने के प्रयास किया जाता है , उनको विभिन्न प्रकार के धार्मिक आयोजनों के माध्यम से, धार्मिक यात्रा , अनुष्ठान , गोष्ठिया आदि कई प्रकार से हिन्दू समाज के जागरूक लोग ही अपनों को जगाने का प्रयास करते है , ख़ुशी इस बात की है हिन्दू जागता तो है परन्तु खेद का विषय है कि वह जागरण स्थायी नहीं रह पाता | जिस दिन सुप्त हिन्दू चेतना का स्थायी पुनर्जागरण हो जाएगा हिन्दू समाज पूर्व की भाति चकवर्ती सम्राट बन सम्पूर्ण विश्व का मार्गदर्शन कर भारत को विश्व गुरु की उपाधि दिलवायेगा।

    – लेखिका विभाग कार्यवाहिका, राष्ट्र सेविका समिति, हरिगढ़ विभाग ( ब्रज प्रान्त से हैं )

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