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    भारत में कामकाज की स्थिति 2026: भारत का युवा कार्यबल बढ़ रहा है और पहले से ज़्यादा शिक्षा हासिल कर रहा है

    ShagunBy ShagunMarch 17, 2026 NewsVoir No Comments7 Mins Read
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    यह रिपोर्ट उच्च शिक्षा तक बढ़ रही पहुँच और शिक्षा से रोज़गार की ओर बढ़ने की प्रक्रिया में युवाओं के सामने आने वाली चुनौतियों को पेश करती है

    नई दिल्ली, दिल्ली, भारत
    ‘भारत में कामकाज की स्थिति 2026’ रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने अपने युवाओं (15 से 29 उम्र) के लिए उच्च शिक्षा तक पहुँच बढ़ाने में काफ़ी सफलता हासिल की है। इसके साथ ही, कृषि से उद्योग व सेवा क्षेत्रों में काम करने के लिए श्रमिकों के स्थानांतर को सुनिश्चित करने और लिंग व जाति की वजह से होने वाले भेदभावों को कम करने में काफ़ी प्रगति की है। इसके बावजूद, कई चुनौतियाँ अब भी बनी हुई हैं। शिक्षित और आकांक्षी युवाओं की बढ़ती संख्या को किस तरह से बाज़ार में शामिल किया जा सकता है, इसी से तय होगा कि भारत की मेहनत करने लायक बढ़ती हुई बड़ी जनसांख्यिकीय की ताकत को आर्थिक विकास का माध्यम बनाया जा सकता है या नहीं।

    बाएं से दाएं: अमित बसोले, रोज़ा अब्राहम, और तमोघना हलदर – अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय से

    अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालयों की प्रेसिडेंट, इंदु प्रसाद ने कहा है, “आज पहले से ज़्यादा युवा शिक्षित, जागरूक और कुछ करने के इच्छुक हैं। ये असल हासिल है, जिस पर हमें गर्व होना चाहिए।”

    इस रिपोर्ट में पिछले चालीस वर्षों के आधिकारिक आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है। इन आंकड़ों का इस्तेमाल करते हुए रिपोर्ट में शिक्षा और रोज़गार में युवाओं की भागीदारी में हुए बदलावों, हम अपने जनसंख्या के बढ़ने का कितना अच्छी तरह से इस्तेमाल कर पाए हैं आदि को समझने का प्रयास किया गया है। इसके साथ ही इस रिपोर्ट से समझा जा सकता है कि हमने अपने लोगों को कार्यबल यानी वर्कफ़ोर्स में शामिल करने की प्रक्रिया में किन चुनौतियों का सामना किया है और इससे कौन-से अवसर सामने आते हैं।   

    इस रिपोर्ट की मुख्य लेखिका और अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय में अर्थशास्त्र की असोसिएट प्रोफ़ेसर रोज़ा अब्राहम ने कहा है, “यह रिपोर्ट किसी युवा के शिक्षा से लेकर रोज़गार की तलाश से होते हुए, रोज़गार पाने तक के सफ़र को दिखाती है। रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि पिछले चालीस वर्षों में यह बदलाव किस तरह होता आ रहा है। हमें उम्मीद है कि यह रिपोर्ट इस बदलाव से जुड़ी चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझने में मदद करने वाले कुछ बुनियादी पहलुओं को समाने रखेगी। साथ ही यह रिपोर्ट सभी को साथ मिलाकर एक ही नीति बनाने को भी आसान बनाने में कारगर साबित होगी।”

    मुख्य बिंदु

    • जनसांख्यिकीय फायदों का वक्त पूरा होने वाला है: भारत में काम या श्रम करने की उम्र वाली आबादी का अनुपात 2030 के बाद धीरे-धीरे कम होना शुरु हो जाएगा। इन हालातों में काम कर सकने वाली जनसंख्या से होने वाले फ़ायदों को आर्थिक विकास में बदलने के लिए तेज़ और ज़रूरत के मुताबिक रोज़गार देना बेहद ज़रूरी होगा।
    • शिक्षा का बढ़ता स्तर: पिछले चालीस वर्षों में युवाओं की शैक्षणिक उपलब्धियों में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है। ख़ासतौर पर महिलाओं ने इस दौरान काफ़ी कुछ हासिल किया है। भारत में उच्च शिक्षा में नामांकन दर (28%) उन देशों के बराबर है, जिनकी प्रति व्यक्ति आय भारत के बराबरी के स्तर की है।  
    • पुरुषों के उच्च शिक्षा में नामांकन में गिरावट: युवाओं में पुरुषों का शिक्षा में नामांकन वर्ष 2017 में 38% था, जो 2024 के आख़िर तक घटकर 34% रह गया। युवाओं ने बड़े पैमाने पर पढ़ाई छोड़ दी, इसकी वजह घर की आमदनी में आर्थिक सहयोग करने की आवश्यकता को बताया गया।
    • उच्च शिक्षा संस्थानों में बढ़ोतरी: 2010 में युवाओं की प्रति लाख आबादी पर 29 कॉलेज मौजूद थे, जो 2021 में बढ़कर 45 हो गए। इस बढ़ोतरी में मुख्य रूप से निजी संस्थानों की भूमिका रही है। हालाँकि, कई क्षेत्रों के बीच असमानताएँ अब भी काफ़ी बड़ी हैं।
    • शिक्षकों की कमी: विद्यार्थियों की बढ़ती संख्या के मुताबिक शिक्षकों की संख्या नहीं बढ़ पाई है। All India Council for Technical Education के मानकों के अनुसार एक शिक्षक पर 15–20 विद्यार्थियों का अनुपात होना चाहिए। लेकिन, निजी कॉलेजों में यह औसतन 28 और सरकारी कॉलेजों में 47 तक पहुँच जाता है। इसलिए शिक्षकों की नियुक्ति करना और रिक्त पदों को जल्द-से-जल्द भरना ज़रूरी है, ताकि संसाधनों की कमी की वजह से सीखने के परिणामों पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
    • व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थानों का तेज़ी से विस्तार: 2010 के बाद औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थाओं (आईटीआई) की संख्या में लगभग 300% की बढ़ोतरी हुई। इसकी सबसे प्रमुख वजह निजी संस्थाओं की तेज़ी से बढ़ोतरी रही है। हालाँकि, संस्थानों की गुणवत्ता में भी गिरावट देखी गई हैं, ख़ासतौर पर निजी आईटीआई संस्थानों की गुणवत्ता में गिरावट देखी जा सकती है।  
    • उच्च शिक्षा में लोकतांत्रीकरण बढ़ा है, लेकिन आर्थिक दिक्कतें अब भी मौजूद हैं: 2007 में उच्च शिक्षा में नामांकित विद्यार्थियों में बेहद गरीब परिवारों से आने वाले विद्यार्थियों का हिस्सा 8 प्रतिशत था, जो 2017 तक बढ़कर 15 प्रतिशत हो गया। हालाँकि, आर्थिक संसाधनों की कमी अब भी कई युवाओं के लिए उच्च शिक्षा पाने में एक अड़चन बनी हुई है।
    • पेशेवर शिक्षा हासिल करने में आर्थिक दिक्कतें: दूसरे आम परिवारों के मुकाबले, कुछ ज़्यादा अमीर परिवारों के विद्यार्थी के इंजीनियरिंग और मेडिकल जैसे पेशेवर पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेने की संभावना ज़्यादा है। इसकी वजह साफ़ है, इन डिग्रियों को पाने की कीमत अक्सर गरीब परिवारों के सालाना प्रति व्यक्ति खर्च से भी ज़्यादा होती है।
    • शिक्षा से रोज़गार तक का मुश्किल सफ़र: 15 से 29 साल के युवा स्नातकों में बेरोज़गारी का स्तर अब भी ऊँचा बना हुआ है। 15 से 25 वर्ष के युवाओं में यह लगभग 40% और 25 से 29 वर्ष के युवाओं में लगभग 20% है। इसके अलावा, स्नातक होने के एक साल के भीतर कुछ ही युवाओं को ही टिकाऊ रोज़गार मिल पाता है।
    • स्नातकों के लिए बेहतर वेतन: रोज़गार की शुरुआत में स्नातक युवाओं की आमदनी आमतौर पर स्नातकों की पढ़ाई न किए हुए के मुकाबले में लगभग दोगुनी होती है। समय के साथ उनके करियर में यह आमदनी का फ़र्क और भी बढ़ता जाता है।
    • पुरुष स्नातकों की आमदनी में ठहराव: 2011 के बाद से युवा पुरुष स्नातकों के शुरुआती वेतन की बढ़ोतरी धीमी पड़ गई है, जबकि स्नातकों की आमदनी में लैंगिक अंतर कुछ हद तक कम हुआ है।
    • कृषि से अन्य क्षेत्रों की ओर रुझान: बड़ी उम्र के श्रमिकों की तुलना में युवा कामगार कृषि क्षेत्र को अधिक तेज़ी से छोड़कर विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों की ओर बढ़ रहे हैं। युवा महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से आईटी, ऑटोमोबाइल विनिर्माण और व्यावसायिक सेवाओं जैसे क्षेत्रों में बढ़ रही है।
    • जाति और लिंग आधारित पेशागत विभाजन में कमी: नई पीढ़ी के युवाओं का पारंपरिक रूप से उनकी जाति या लिंग से जुड़े पेशों में सिमटना पहले की तुलना में काफ़ी कम हुआ है।
    • श्रम बाज़ार की मांग की वजह से माइग्रेशन: युवाओं का माइग्रेशन उनके इलाके में मौजूद असमानताओं को संतुलित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जैसे कम विकसित राज्य और अपेक्षाकृत युवा आबादी वाले राज्य श्रम के प्रमुख स्रोत बने रहते हैं, जबकि अपेक्षाकृत समृद्ध और ज़्यादा उम्र वाली आबादी वाले राज्य बढ़ती हुई मात्रा में माइग्रेटेड युवाओं के श्रम पर निर्भर होते जा रहे हैं।

    मीडिया संबंधी जानकारी के लिए संपर्क करें:

    रोज़ा अब्राहम

    ई-मेल: rosa.abraham@apu.edu.in

    मोबाइल: +91-9901957009

    सोनी शेट्टी

    ई-मेल: sony.shetty@azimpremjifoundation.org

    मोबाइल: +919820900036

    सुमित जैन

    ई-मेल: sumit.jain@k2communications.in

    मोबाइल: +91 9886021715
     

    अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय के बारे में

    अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, बेंगलूरु की स्थापना कर्नाटक सरकार के ‘अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी एक्ट 2010’ द्वारा की गई है। अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, भोपाल की स्थापना ‘मध्य प्रदेश निजी विश्‍वविद्यालय (स्थापना एवं संचालन) द्वितीय संशोधन अधिनियम, 2022’ तहत की गई है। अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, राँची की स्थापना झारखण्ड सरकार द्वारा अधिनियमित ‘अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय अधिनियम, 2022’ के तहत की जा रही है।

    अज़ीम प्रेमजी फ़ाउण्डेशन इन तीनों विश्वविद्यालयों की प्रायोजक संस्था है। फ़ाउण्डेशन सामाजिक हित और न्यायपूर्ण, समानता, मानवता और सस्टेनेबल समाज बनाने के मकसद से विश्वविद्यालयों की स्थापना कर रहा है।

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