यह बेहद मार्मिक है जब एक अंत नजदीक होता है… कैंसर की अंतिम स्टेज से जूझ रहा एक पिता अपने छोटे बेटे मंत्र को पास बुलाता है। आँखों में असीम प्यार और दिल में अनकही पीड़ा लिए वह उसे समझाता है कि माँ की हर बात मानना, बदमाशी न करना, छोटी बहनों की रक्षा करना और परिवार का ख्याल रखना। जब बच्चा रोने लगता है तो पिता मुस्कुराकर कहता है, “रोना नहीं है… तुम बहुत अच्छे और समझदार हो।” वह बेटे से वादा लेता है कि उसके जाने के बाद भी हिम्मत नहीं हारेगा।
यह दृश्य देखकर दिल भर आता है। लेकिन यह सिर्फ एक वीडियो नहीं है। यह उन अनगिनत पिताओं, माताओं, बेटों और बेटियों की कहानी है जो हमारे अस्पतालों की भीड़ भरी गलियारों, टूटी हुई चारपाइयों और खाली दवा अलमारियों में हर दिन चुपचाप खत्म हो रहे हैं।
कितने पिता हैं जो इलाज के अभाव में अंतिम साँस लेते हुए अपने बच्चों को यही सीख दे जाते हैं? कितनी माताएँ हैं जो महँगे इंजेक्शन और बेड की कमी के कारण अपनी आँखें बंद कर लेती हैं, जबकि उनका परिवार बाहर खड़ा रो रहा होता है? अस्पताल के वार्ड में दर्द की चीखें, रिश्तेदारों की बेबसी और डॉक्टरों की थकान और ये रोज की तस्वीरें हैं, लेकिन किसी की खबर नहीं बनतीं।
हमारे देश में स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविकता यही है कि गरीब मरीज या तो घर पर तड़पकर मरता है या अस्पताल पहुँचकर भी इलाज न मिलने के कारण दम तोड़ देता है। ऑक्सीजन की कमी, बेड की अनुपलब्धता, दवाओं का अभाव, महँगे टेस्ट और लंबी प्रतीक्षा है ये शब्द अब समाचार नहीं, बल्कि आम लोगों की नियति बन चुके हैं। कैंसर, किडनी फेलियर, दिल की बीमारी जैसी बीमारियाँ गरीब परिवारों के लिए मौत का पर्याय बन जाती हैं, क्योंकि समय पर और पर्याप्त इलाज मिलना दुर्लभ हो गया है।
वह पिता अपने बेटे को जिम्मेदारी सौंप रहा था क्योंकि वह जानता था कि अब समय नहीं बचा। लेकिन क्या हमने कभी सोचा कि अगर समय पर सही इलाज मिल जाता, तो शायद वह पिता और कुछ साल अपने बच्चों के साथ बिता पाता? शायद वह मंत्र को खुद बड़ा होते देख पाता?
ऐसे किस्से न जाने कितने अस्पतालों में भरे पड़े हैं। कोई वीडियो नहीं बनता, कोई वायरल नहीं होता, कोई आँसू नहीं बहता। सिर्फ एक और शव बाहर निकलता है, और जीवन की भागदौड़ फिर से शुरू हो जाती है।
यह संपादकीय उन अनदेखी मौतों के लिए है, जो सिस्टम की उपेक्षा, संसाधनों की कमी और हमारी सामूहिक उदासीनता के कारण हो रही हैं। स्वास्थ्य हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, न कि कुछ चुनिंदा लोगों की सुविधा। जब तक हम अस्पतालों को सिर्फ इमारतें न समझकर जीवन बचाने के मंदिर नहीं बनाएंगे, तब तक ऐसे पिता अपने बच्चों को छोड़कर जाते रहेंगे और हम सिर्फ भावुक होकर वीडियो शेयर करते रहेंगे।
https://x.com/1K_Nazar/status/2083212456537809171/video/1
समय आ गया है कि हम इन खामोश आवाजों को सुनें। नहीं तो एक दिन हमारा अपना कोई प्रियजन भी उसी भीड़ में खो जाएगा, जहाँ किसी को किसी की खबर नहीं।







