12वीं के छात्र प्रियांश सिन्हा की फिल्म का इंडिया हैबिटेट सेंटर में हुआ शानदार प्रीमियर; पैरालंपियन डॉ. दीपा मलिक और विशेषज्ञों ने सराहा
नई दिल्ली: शिव नादर स्कूल (नोएडा) के कक्षा 12 के छात्र प्रियांश सिन्हा द्वारा बनाई गई डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘द शेप ऑफ बिलॉन्गिंग’ का प्रीमियर नई दिल्ली स्थित इंडिया हैबिटेट सेंटर में हुआ। यह डॉक्यूमेंट्री केवल रैंप या लिफ्ट जैसी भौतिक सुविधाओं तक सीमित न रहकर, कॉग्निटिव (मानसिक) और सेंसेरी (संवेदी) एक्सेसिबिलिटी जैसे अनदेखे पहलुओं पर रोशनी डालती है।
क्या है फिल्म का मुख्य संदेश?
2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में लगभग 2.68 करोड़ (2.21%) दिव्यांगजन हैं। आमतौर पर सुलभता की चर्चा व्हीलचेयर रैंप या लिफ्ट तक सिमट कर रह जाती है।
लेकिन यह डॉक्यूमेंट्री सवाल उठाती है कि किसी स्थान को वास्तव में सुलभ और समावेशी बनाने का सही अर्थ क्या है? फिल्म ऑटिज्म, डिमेंशिया और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परिस्थितियों का सामना कर रहे लोगों के लिए सहज, सुरक्षित और गरिमापूर्ण माहौल बनाने की वकालत करती है।
दिग्गजों ने की युवा फिल्ममेकर की सराहना
फिल्म की स्क्रीनिंग के बाद आयोजित विशेष पैनल चर्चा में शिक्षा, खेल और आर्किटेक्चर जगत की प्रमुख हस्तियां शामिल हुईं:
डॉ. दीपा मलिक (पैरालंपिक पदक विजेता व पद्म श्री): “भारत में सुलभता की चर्चा लंबे समय से केवल इंफ्रास्ट्रक्चर पर केंद्रित रही है, लेकिन वास्तविक समावेश इससे कहीं आगे है। गरिमा और स्वतंत्रता भी डिज़ाइन के मूल सिद्धांत होने चाहिए।”
सुश्री मेरी बरुआ (फाउंडर डायरेक्टर, एक्शन फॉर ऑटिज्म): “यह डॉक्यूमेंट्री कॉग्निटिव और सेंसेरी एक्सेसिबिलिटी को जरूरी दृश्यता देती है—ऐसा आयाम जिसे मुख्यधारा में अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।”
प्रियांश सिन्हा (फिल्ममेकर): “सुलभता सिर्फ किसी स्थान में प्रवेश करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि व्यक्ति वहां सहजता और अपनेपन की भावना महसूस करे, यह बेहद जरूरी है।”
व्यापक दर्शकों तक पहुँचाने की योजना
इस प्रीमियर के साथ ही फिल्म के सार्वजनिक लॉन्च की शुरुआत हो चुकी है। आने वाले समय में कॉग्निटिव और सेंसेरी इन्क्लूजन के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए देश भर में विशेष स्क्रीनिंग और आउटरीच कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।







