भाद्रपद शुक्ल एकादशी संवत् २०८३ तदनुसार मंगलवार, 22 सितम्बर 2026

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा –
हे वासुदेव! भाद्रपद शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि तथा इसका महत्त्व कृपा करके कहिए। तब भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि इस पुण्य, स्वर्ग और मोक्ष को देने वाली तथा सब पापों का नाश करने वाली, उत्तम परिवर्तिनी एकादशी का महात्म्य मैं तुमसे कहता हूँ तुम ध्यानपूर्वक सुनो।
यह एकादशी वामन एकादशी, जयंती एकादशी, पार्श्व एकादशी, पद्मा एकादशी भी कहलाती है। इसका यज्ञ करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। पापियों के पाप नाश करने के लिए इससे बढ़कर कोई उपाय नहीं। जो मनुष्य इस एकादशी के दिन मेरी (वामन रूप की) पूजा करता है, उससे तीनों लोक पूज्य होते हैं। अत: मोक्ष की इच्छा करने वाले मनुष्य इस व्रत को अवश्य करें। इस दिन भगवान करवट लेते हैं, इसलिए इसको परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं।

भगवान के वचन सुनकर युधिष्ठिर बोले कि भगवान ! मुझे अति संदेह हो रहा है कि आप किस प्रकार सोते और करवट लेते हैं तथा किस तरह राजा बलि को बाँधा और वामन रूप रखकर क्या-क्या लीलाएँ कीं तथा आपके शयन करने पर मनुष्य का क्या कर्तव्य है। सो आप मुझसे विस्तार से बताइए। श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन! अब आप सब पापों को नष्ट करने वाली कथा का श्रवण करें। त्रेतायुग में बलि नामक एक दैत्य था। वह मेरा परम भक्त था। विविध प्रकार के वेद सूक्तों से मेरा पूजन किया करता था और नित्य ही ब्राह्मणों का पूजन तथा यज्ञ के आयोजन करता था, लेकिन इंद्र से द्वेष के कारण उसने इंद्रलोक तथा सभी देवताओं को जीत लिया। इस कारण सभी देवता एकत्र होकर सोच-विचार कर भगवान के पास गए।देवताओं ने घबराकर भगवान विष्णु से मदद मांगी। तब भगवान विष्णु ने वामन (बौने) ब्राह्मण का रूप धारण किया और राजा बलि के पास पहुंचे।
तीन पग भूमि की मांग: वामन भगवान ने बलि से दान में केवल तीन पग (कदम) भूमि मांगी। बलि ने अपने गुरु के मना करने के बावजूद संकल्प ले लिया।
विराट रूप: संकल्प लेते ही भगवान वामन ने अपना विराट रूप धारण कर लिया। उन्होंने एक पग में पृथ्वी और दूसरे पग में अंतरिक्ष को नाप लिया। तीसरा पग रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तो बलि ने अपना सिर आगे कर दिया।
पाताल का राज और वरदान: बलि की इस उदारता और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उसे पाताल लोक का राजा बना दिया। भगवान ने यह भी वचन दिया कि वे चौमास (चार महीने की योगनिद्रा) के दौरान हर साल भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन पाताल में उसके द्वार पर रहेंगे।
परिवर्तिनी एकादशी का धार्मिक महत्त्व …मान्यता है कि चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में रहते हैं और इस एकादशी के दिन वे अपनी करवट बदलते हैं, इसलिए इसे ‘परिवर्तिनी’ या ‘पार्श्व एकादशी’ कहा जाता है।
वामन अवतार की पूजा: इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा की जाती है। परिवर्तिनी एकादशी पर भगवान श्री विष्णु को पीले रंग की मिठाई, पीला चंदन, रोली, अक्षत, पीले फूल, तुलसी की मंजरी, ऋतु फल और धूप-दीप आदि अर्पित करना चाहिये। इस दिन गीता का पाठ, श्रीविष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिये।
मोक्ष की प्राप्ति: धार्मिक विश्वास है कि इस व्रत के प्रभाव से साधक को मृत्यु के पश्चात बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।
जो विधिपूर्वक इस एकादशी का व्रत करते हैं, वे सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग में जाकर चंद्रमा के समान प्रकाशित होते हैं और यश पाते हैं। जो पापनाशक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उनको हजार अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
हरे कृष्णा







