मुंबई के जुहू में जलसा के बाहर हर रविवार को प्रशंसकों से मिलने वाली वह पुरानी परंपरा आज एक नए रूप में दिखाई दी। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन पारदर्शी बुलेटप्रूफ शीशे के पीछे खड़े होकर हाथ हिला रहे थे। यह दृश्य सिर्फ एक सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा नहीं था। यह उस भय का प्रत्यक्ष प्रमाण था जो फिल्म इंडस्ट्री में पिछले कुछ हफ्तों से गहरा गया है।
दरअसल टाइगर श्रॉफ की कार पर गोलीबारी के बाद, और उससे पहले आमिर खान को निशाना बनाने की खबरों के बाद, पूरा बॉलीवुड एक तरह के खौफ में जी रहा है। लॉरेंस बिश्नोई गैंग का नाम बार-बार सामने आ रहा है। धमकियां, ईमेल में बम की चेतावनी, और फिर सुरक्षा बढ़ाए जाने के फैसले -ये सब मिलकर एक ऐसी तस्वीर पेश कर रहे हैं जिसमें कलाकार खुले में अपने प्रशंसकों से मिलने को भी जोखिम भरा मानने लगे हैं।
सवाल सीधा और गंभीर है। क्या छुटभैये गुंडे या जेल में बंद अपराधी इतने प्रभावी हो गए हैं कि देश के सबसे बड़े सितारों को बुलेटप्रूफ कांच के पीछे खड़ा होना पड़े? क्या कानून-व्यवस्था इतनी कमजोर पड़ गई है कि अपराधियों का आतंक आम नागरिकों से लेकर सुपरस्टार्स तक पहुंच गया है?
यह सिर्फ अमिताभ बच्चन या टाइगर श्रॉफ का मसला नहीं है। यह उस वातावरण का मसला है जिसमें कलाकार चुप रहने को मजबूर महसूस करते हैं। अगर बोलूं तो गोली मार दी जाएगी, अगर सरकार से सवाल पूछूं तो कोई और जवाब देगा ! -ऐसी मानसिकता अगर फैल गई तो लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दोनों प्रभावित होंगे। 84 वर्षीय अमिताभ बच्चन जैसे प्रतीक को भी अतिरिक्त सुरक्षा कवच की जरूरत पड़ना, देश की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।
महाराष्ट्र और केंद्र दोनों स्तरों पर सरकारें दावा करती हैं कि कानून-व्यवस्था मजबूत है। फिर भी मुंबई जैसे महानगर में अंडरवर्ल्ड के नए रूप सक्रिय दिख रहे हैं। पुराने दिनों में अंडरवर्ल्ड फिल्म इंडस्ट्री में घुसपैठ करता था। आज वह सोशल मीडिया, धमकियों और लक्षित हमलों के जरिए फिर सिर उठा रहा है। पुलिस जांच कर रही है, गिरफ्तारियां हो रही हैं, लेकिन भय का वातावरण बना रहना दर्शाता है कि सिर्फ प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं है। रोकथाम और प्रभावी नियंत्रण जरूरी है।
कलाकार समाज के दर्पण होते हैं। वे मनोरंजन देते हैं, विचार देते हैं, और कभी-कभी सवाल भी उठाते हैं। अगर वे खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करते तो आम नागरिक कैसे महसूस करेगा? अगर महानायक को भी शीशे के पीछे खड़ा होना पड़े तो सामान्य व्यक्ति की सुरक्षा का क्या होगा?
सरकार को इस स्थिति को गंभीरता से लेना चाहिए। अपराधियों के नेटवर्क को जड़ से उखाड़ना, खुफिया जानकारी को मजबूत करना, और कलाकारों सहित सभी नागरिकों को बिना भय के जीने का माहौल देना राज्य का दायित्व है। बुलेटप्रूफ कांच अस्थायी समाधान हो सकता है, लेकिन स्थायी समाधान मजबूत कानून-व्यवस्था ही है।
देश की छवि और उसके नागरिकों का विश्वास दोनों दांव पर हैं। अगर कलाकारों की सुरक्षा भी संकट में है तो यह सिर्फ बॉलीवुड की समस्या नहीं, पूरे समाज और शासन व्यवस्था के लिए चेतावनी है।







