2017 में योगी सरकार ने शुरू की थी दीपोत्सव की परंपरा, इस बार छह दिनों तक होंगे कार्यक्रम; आयोजन की निरंतरता और विश्वस्तरीय पहचान बनाए रखने की भी उठी चर्चा
अयोध्या। रामनगरी अयोध्या में दीपोत्सव अब केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान का बड़ा हिस्सा बन चुका है। वर्ष 2017 में योगी आदित्यनाथ सरकार ने मुख्यमंत्री बनने के बाद इसकी शुरुआत की थी। तब से हर साल दीपोत्सव का आयोजन नई भव्यता और आकर्षण के साथ आगे बढ़ा है। इस बार दसवें दीपोत्सव को लेकर भी तैयारियां और उम्मीदें चर्चा में हैं।
राम मंदिर निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा के बाद अयोध्या के दीपोत्सव का महत्व और बढ़ गया है। सरयू तट पर लाखों दीप जलाने की परंपरा ने इसे देश-दुनिया के आकर्षण का केंद्र बनाया है। इन आयोजनों के माध्यम से धार्मिक आस्था के साथ पर्यटन, स्थानीय रोजगार और सांस्कृतिक विरासत को भी बढ़ावा मिला है। उपलब्ध इनपुट के अनुसार, इस बार दीपोत्सव छह दिनों तक मनाए जाने की योजना है।
हालांकि, आयोजन की भव्यता के साथ उसकी निरंतरता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। क्या आने वाले वर्षों में भी दीपोत्सव इसी स्तर पर आयोजित होता रहेगा? क्या भविष्य की सरकारें भी इसे उतनी ही प्राथमिकता देंगी? अयोध्या की सांस्कृतिक पहचान को स्थायी रूप देने के लिए जरूरी है कि दीपोत्सव किसी एक सरकार या राजनीतिक कार्यकाल तक सीमित न रहे, बल्कि इसे प्रदेश की साझा सांस्कृतिक परंपरा के रूप में आगे बढ़ाया जाए।
दीपोत्सव की असली सफलता केवल दीपों की संख्या या नए रिकॉर्ड बनाने में नहीं, बल्कि अयोध्या की आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को दुनिया तक पहुंचाने में है। इसके लिए आयोजन की भव्यता के साथ उसकी गुणवत्ता और निरंतरता बनाए रखना भी जरूरी होगा।







