कार्तिक मास की अमावस्या (दीपावली) का वह अद्भुत और वैज्ञानिक सत्य, जो इतिहास के पन्नों में छिपा रहा!
राहुल कुमार गुप्ता
भारतीय संस्कृति के पन्नों पर जब भी दीपावली का जिक्र होता है, तो सबसे पहले त्रेता युग की वह स्मृति जीवंत हो उठती है जब चौदह वर्ष का कठिन वनवास भोगकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे थे। दीपावली की शाम आते ही हर घर, हर आंगन और हर गली दीयों की रोशनी से जगमगा उठती है। जनमानस में यह एक अटूट और सर्वस्वीकृत मान्यता है कि लंकापति रावण का वध करके जब भगवान राम अयोध्या पधारे थे, तब उनके स्वागत में पूरी नगरी ने दीपोत्सव मनाया था। इस सुंदर कथा के साथ जुड़ी श्रद्धा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आस्था का महान संबल बनी हुई है। किंतु जब हम इतिहास, ज्योतिष, पंचांग, प्राचीन शास्त्रों और प्रकृति के वैज्ञानिक चक्र के चश्मे से इस पर्व को देखते हैं, तो एक बेहद चौंकाने वाला और अत्यंत वैज्ञानिक सत्य सामने आता है, दीपावली केवल श्रीराम के अयोध्या लौटने की घटना से कहीं अधिक प्राचीन, विशाल और ब्रह्मांडीय उत्सव है।
इस विषय की गहराई में उतरने पर सबसे पहला तथ्यात्मक विरोधाभास कालक्रम का मिलता है। वाल्मीकि रामायण के युद्ध काण्ड और अन्य प्रमुख ग्रंथों के अनुसार, रावण का वध अश्विन माह में नहीं बल्कि बसंत ऋतु यानी चैत्र या वैशाख मास के आसपास हुआ था। युद्ध समाप्ति के तुरंत बाद विभीषण का राज्याभिषेक हुआ, सीता जी की अग्नि-परीक्षा संपन्न हुई और पुष्पक विमान से श्रीराम ने अयोध्या के लिए प्रस्थान किया। मार्ग में किष्किंधा और महर्षि भारद्वाज के आश्रम में विश्राम करते हुए वे वैशाख शुक्ल पक्ष की पंचमी या षष्ठी को नंदीग्राम और अयोध्या पहुँचे थे, जहाँ उनका भव्य राज्याभिषेक उसी समय हुआ था। यानी ग्रंथों के मूल कालक्रम के अनुसार राम जी का आगमन और प्रथम स्वागत उत्सव वैशाख मास में हुआ था, न कि कार्तिक मास में। ऐसे में यह सवाल सहज ही मन में उठता है कि यदि राम जी वैशाख में लौटे थे, तो दीपावली का पर्व आज कार्तिक अमावस्या को क्यों और कैसे मनाया जाता है?
क्या अयोध्यावासियों ने अपनी असीम खुशी को महीनों तक दबाकर रखा था? इसका तार्किक उत्तर यह है कि अयोध्यावासियों ने अपनी खुशी कभी नहीं दबाई थी; उन्होंने वैशाख में राम के लौटते ही उत्सव मना लिया था। लेकिन कालांतर में लोक-संस्कृति, ऋतु-चक्र और सांस्कृतिक एकीकरण ने इस ऐतिहासिक घटना को एक और भी बड़े और प्राचीन प्रकाश पर्व के साथ जोड़ दिया, और इस पक्ष को मजबूत किया रामलीला ने। खरीफ की खेती के बाद विश्राम माह यानि आश्विन माह में रामलीला के मंचन का लोक संस्कृति में रच बस जाने के कारण दशहरा आश्विन माह की दशमी को मनाया जाने लगा।
वास्तविकता यह है कि ‘दीपावली’ या दीपोत्सव का पर्व राम के जन्म से युगों पहले से भारत में एक पूर्ण विकसित, समृद्ध और वैज्ञानिक रूप से स्थापित पर्व के रूप में मनाया जा रहा था। इसके मूल में कोई एक घटना नहीं, बल्कि प्रकृति, खगोल विज्ञान, कृषि और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का अद्भुत संतुलन था। पौराणिक साक्ष्यों के अनुसार, क्षीरसागर के समुद्र मंथन से धन, वैभव और समृद्धि की देवी महालक्ष्मी का प्राकट्य कार्तिक मास की अमावस्या के दिन ही हुआ था। सतयुग की इस घटना के समय देवताओं और ऋषियों ने अंधकार को पराजित करने और ऐश्वर्य के स्वागत के लिए जो दीप जलाए, वह किसी एक राजा की विजय का नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय वैभव का उत्सव था। इसके अलावा, ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भी कार्तिक अमावस्या का खगोलीय महत्व अनूठा है। इस समय सौर मंडल के दो सबसे बड़े प्राण-संचारक पिंड सूर्य (जो आत्मा और ऊर्जा का कारक है) और चंद्रमा (जो मन और शीतलता का कारक है) दोनों ही तुला राशि में सबसे क्षीण या संतुलित अवस्था में होते हैं। अमावस्या वर्ष की सबसे अंधकारमय रात्रि होती है। ऐसे में जब ब्रह्मांड में प्राकृतिक प्रकाश और ऊर्जा का स्तर सबसे न्यूनतम होता है, तब सरसों के तेल या घी के दीये जलाकर उस अंधकार को मिटाने और ब्रह्मांडीय ऊर्जा को संतुलित करने का वैज्ञानिक विधान हमारे ऋषियों ने रचा था। यह खगोलीय और वैज्ञानिक आवश्यकता मानव इतिहास और राजा-महारानी के जन्म से भी अनादि काल पुरानी है।
इसके साथ ही, यह पर्व प्राचीन भारत के कृषि और मौसम चक्र से भी गहराई से जुड़ा हुआ था। भारत एक कृषि-प्रधान देश रहा है, जहाँ शरद ऋतु का आगमन यानी अक्टूबर-नवंबर का महीना जीवन के उल्लास का प्रतीक होता है। इसी कार्तिक मास में खरीफ की मुख्य फसल यानी धान (चावल) कटकर किसान के घर आती है। नया अन्न घर आना और खेतों की समृद्धि का उत्सव मनाना प्राचीन समाज की सबसे बड़ी प्राथमिकता थी। अन्न रूपी लक्ष्मी के स्वागत और पूजन की यह परंपरा पूरी तरह कृषि-अर्थव्यवस्था पर आधारित थी। साथ ही, मानसून की विदाई और सर्दियों के आगमन के इस संधि-काल में मौसम में नमी और संक्रामक कीट-पतंगों की अधिकता हो जाती है। घरों की लिपा-पोती, साफ-सफाई और घर-घर में सरसों के तेल के दीपक जलाने से जो ऊष्मा और सल्फर का प्रसार होता था, वह प्राकृतिक रूप से हानिकारक कीटों को नष्ट कर वातावरण को पूरी तरह शुद्ध कर देता था। यह स्वच्छता और स्वास्थ्य का एक ऐसा वैज्ञानिक अनुष्ठान था जिसे समाज ने सहर्ष एक पर्व का रूप दे दिया था।
कार्तिक मास के इस पावन कालखंड की व्यापकता केवल यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी कई अन्य प्रमुख पौराणिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक कथाएँ भी इस पर्व के विस्तार और महत्व को और अधिक विराट बनाती हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्राग्ज्योतिषपुर के अत्याचारी असुर राजा नरकासुर ने देवों और महर्षियों को त्रस्त कर रखा था तथा 16,000 राजकन्याओं को बंधक बना लिया था। कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभामा की सहायता से इस दुष्ट असुर का वध किया और सभी को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई। इस विजय और मुक्ति की खुशी में प्रजा ने दीप प्रज्वलित किए, जिसे ‘नरक चतुर्दशी’ या ‘छोटी दिवाली’ के रूप में मनाया जाता है। इसी प्रकार, सतयुग में जब दैत्यराज बलि ने अपने तप और बल
से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था, तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर तीन पग में संपूर्ण सृष्टि को नाप लिया।
भगवान ने बलि की दानशीलता से प्रसन्न होकर उन्हें पाताल लोक का आधिपत्य दिया और यह वरदान दिया कि कार्तिक अमावस्या के दिन जो व्यक्ति दीपदान करेगा, उस पर महालक्ष्मी की विशेष कृपा बनी रहेगी। इस प्रसंग के कारण इसे ‘याक्षरात्रि’ भी कहा गया है। महाभारत कालीन प्रसंगों के अनुसार, जब पांडव 12 वर्ष के वनवास और 1 वर्ष के अज्ञातवास को सफलतापूर्वक पूरा करके हस्तिनापुर लौटे, तो नगरवासियों ने उनके स्वागत में घी के दीये जलाकर उत्सव मनाया था। जैन परंपरा में चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी को कार्तिक अमावस्या के ही दिन पावापुरी में मोक्ष (निर्वाण) प्राप्त हुआ था और इसी पवित्र रात्रि में उनके प्रमुख शिष्य गौतम गणधर को ‘केवल ज्ञान’ प्राप्त हुआ था, जिसे जैन समुदाय प्रकाश पर्व के रूप में मनाता है। सिख इतिहास में भी इस दिन का अत्यंत गौरवशाली स्थान है; वर्ष 1619 में इसी दिन सिखों के छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद सिंह जी ग्वालियर के किले से 52 हिंदू राजाओं को अपनी कैद से मुक्त कराकर अमृतसर लौटे थे, जिसकी खुशी में हरिमंदिर साहिब सहित पूरे सिख जगत में ‘बंदी छोड़ दिवस’ मनाया जाता है।
कार्तिक अमावस्या को प्राचीन काल से विभिन्न कारणों से लगातार दीपोत्सव की निरंतरता बनी रही, जिससे लोक संस्कृति में कार्तिक अमावस्या को दीपोत्सव का पर्व अपनी निरंतरता को बनाए रख सका।
जब त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने अयोध्या में ‘रामराज्य’ की स्थापना की, एक ऐसा शासन जहाँ भय, भूख, भेदभाव और अन्याय का नामोनिशान नहीं था, तो समाज ने चाहा कि उनके इस आदर्श और लोक-कल्याणकारी राज्य के आनंद को शाश्वत बना दिया जाए। भारत की लोक-संस्कृति की यह महान विशेषता रही है कि वह किसी नई महान घटना को मिटाती नहीं, बल्कि उसे पहले से चले आ रहे समाज के सबसे बड़े और सुंदर प्राकृतिक पर्व के साथ इस प्रकार पिरो देती है कि दोनों एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं। वैशाख मास की भीषण गर्मी की तुलना में कार्तिक मास की सुहावनी शरद ऋतु, खुला आसमान और दीपोत्सव का उल्लास इस मिलन के लिए सबसे अनुकूल था। यही कारण है कि राम के आगमन की ऐतिहासिक और भावनात्मक खुशी को समाज ने भारत के पहले से चले आ रहे इस महान प्राकृतिक, खगोलीय और कृषि-प्रधान दीपोत्सव में हमेशा के लिए समाहित कर दिया।
आज जब हम दीपावली मनाते हैं, तो यह पर्व किसी संकीर्ण दायरे में बंधा नहीं रहता। यह समुद्र मंथन से प्रकट हुई लक्ष्मी की आराधना है, नरकासुर वध और बंदी छोड़ की मुक्ति गाथा है, जैन परंपरा का निर्वाण उत्सव है, प्रकृति के ऋतु-चक्र और कृषि समृद्धि का उल्लास है, खगोलीय ऊर्जा का संतुलन है, और साथ ही रामराज्य के उस शाश्वत आदर्श का स्मरण है जो हर मनुष्य को धर्म, न्याय और भाईचारे के मार्ग पर चलना सिखाता है। तिथियों और कालों के इस सुंदर और वैज्ञानिक समन्वय को समझ लेने से इस पर्व का गौरव कम नहीं होता, बल्कि इसकी महानता और अधिक प्रखर होकर सामने आती है, जो हमें यह सिखाती है कि हमारी संस्कृति विज्ञान, प्रकृति, इतिहास और मानवीय संवेदनाओं का एक ऐसा अद्वितीय संगम है जो हर युग में प्रकाशमान और प्रासंगिक बना रहता है।







