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जी के चक्रवर्ती

गांव से लेकर शहरों तक में आधुनिकता की बयार ने समस्त लोगों को झकझोरने कर चुस्त दुरुस्त करने जैसा काम किया है इसी कवायद मेँ लगी हुई मौजूद सरकार अपने इस अभियान में कहाँ तक सफल हुई या हो रही है यह मुद्दा तो वही जाने लेकिन यहाँ यहाँ एक बात अवश्य उल्लेखनीय है कि वर्त्तमान समय मे हमारे देश में मोबैलेजशन का दौर शुरू हुए तो बहुत दिन हो चुके हैं लेकिन अब नेपथ्य में जाने वाले वर्ष 2017 ने दुनिया में खासतौर पर हमारे देश में संचार क्रांति के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए, स्मार्टफोन को हम सभी लोगों के रोज मर्रे की एक अत्याधुनिक आवश्यक वास्तु बना दिया है। जब से हम लोगों के जीवन में स्मार्टफोन ने कदम रखा है उस समय से हम सभी लोगों के पास वक्त की बहुत कमी हो गई है, वैसे तो हम सभी लोग वर्त्तमान समय में पहले की अपेक्षा कहीं अधिक व्यस्त रहने लगे हैं अब वक्त की कमी हम सभी लोगों को पहले से कहीं अधिक खटकने लगी थी वहीं पर रिश्तेदारी या नातेदारी निभाने से लेकर यहाँ तक कि किसी से मिलने-जुलने में भी वक्त की कमी का अहसास होने लगा है।
हम सबके वक्त में वर्त्तमान समय के स्मार्टफोन ने जबरदस्त सेंध लगाई है। मौजूदा समय में हम लोगों ने अपने खरीदारी से लेकर सभी तरह की सूचनाओं के आदान-प्रदान करने से लेकर जीवन की विभिन्न जरूरतों के अनेको महत्त्व पूर्ण कार्यों को इंटरनेट के माध्यम से अपने स्मार्ट फ़ोन पर ही निपटाने में सक्षम हो गए है साथ ही साथ अब सोशल साइट जैसे फेसबुक, वाट्सएप्प पर हमारे चौपाले सज कर लगने लगी है। मुखतयः स्त्री वर्ग के महिलाओं में सास-बहू तक के झगडों से लेकर कोई खास खबर पाने के लिए वर्त्तमान समय में कान नहीं लगाने पड़ते हैं, साथ ही साथ व्यक्तियों , महिलाओं से लेकर युवको अब बच्चों तको के बहुत सारी पढ़ाई लिखाई की बातों से झगडे तक भी इन्ही साइडों पर निपटा लिए जाते है इन सब के आलावा प्रतेयक आयु वर्गों के लोगों के लेख ,कविताओं , पठन-पठान सामग्रियों के अलावा शादी वैवाहिक रिश्तों जैसे अनेक महत्त्व पूर्ण सामग्रियों का आदान प्रदान सहजता से होने से वर्षों लगने वाले कामो को अब कुछ दिनों में निपटा लिए जाते है।
आरोप-प्रत्यारोप शिकवा शिकायतों के आलावा इन सोशल साइटों पर मारपीट से लेकर गाली गलौज तक भी हो जाया करती हैं। फेसबुक जैसे साइटों पर दुनिया पढ़ती है और वाट्सएप्प पर ऑडियो-वीडियो देख सुनकर फॉरवर्डिंग का दौर चलता है। अब यहां तक कि एक्चुअल लड़ाई झगडे में किसी के सिर फूट जाने पर भी लोग पहले डॉक्टर के पास न जाकर खून टपकते हुए दर्द से कराहते हुए इंसान का पहले फोटो सेशन शुरु हो जाता है और फिर मनमुताविक कहानी गढ़ कर के साथ फेसबुक- वाट्सएप्प और ट्विटर जैसे साइटों पर अपलोड हो जाता है ऐसे सभी कार्यों को निपटाने के बाद उस इंसान को अस्पताल ले जाने पर उसका इलाज शुरू हो पाता है। ऐसे फोटो अलग अलग ग्रुपों से होकर पर्सनल आइडी तक फॉरवर्ड हो जाते हैं और कुछ ही क्षणों में यह खबर हजारों लोगों तक पहुँच जाती है।
इस डिजिटल दुनिया का चमत्कार हमें उस समय देखने को मिलता जब ऐसे ख़बरों या झगड़े का निपटारा होकर शांति स्थापित हो जाने के बाद भी आडियों- वीडियों के फॉरवड़िंग का दौर रुकने का नाम ही नहीं लेता है। अभी हाल ही में हमारे पडोसी का एक बच्चा खो गया था जिसकी सूचना किसी ने अपने वाट्सएप्प पर फोटो संग यह सूचना अभी व्हाट्सअप ग्रुप में दाल दी,- यदि बच्चा किसी को मिले या दिखाई दे तो कृपया उसे इस पते पर पहुंचाएं या फलां -फलां नंबर पर फोन कर इसकी सूचना दें। एक बार बच्चा मिलने जाने के बाद भी सूचनाओं का दौर रुकने का नाम नहीं लेता और यह खबर लगातार फॉरवर्ड होती रहती है और यह उस मुकाम तक पहुँच जाती है कि वह बेचारा बच्चा जहां पर भी चला जाता है उसे वहां से फिर से पकड़ कर उसे उसके घर पहुंचा दिया जाता। लोग अपने फेसबुक पेज एवं वाट्सएप्प लोग अपने खाना-पीने घूमने-फिरने से लेकर कहानी किस्से भी इसी के माध्यम से शेयर करते रहते है।
आज वर्त्तमान समय में इस तरह की साइटे केवल सामाजिक या पारिवारिक सूचनाओं तक ही सिमित नहीं होती आदान प्रदान तक ही सीमित न रह कर वल्कि यह डिजिटल चौपाल नहीं रह कर एक असली मूल चौपाल की तरह राजनीतिक मुद्दों पर बहस का अड्डा बन जाता है। यह अलग विषय है कि विभिन्न पार्टीयों के भक्तों द्वारा अपनी-अपनी पार्टियों के गुण-गान ही नहीं गाते, बल्कि विपक्षी पार्तियों को नीचा दिखाने का हरसंभव प्रयास करते हैं। कई लोग तो यहाँ तक गली गलौज कर के इतना उधम मचा डालतें हैं कि बेचारे जुकरबर्ग को खुद ही बीच-बचाव करने आना पड़ता है फिर भी न मानने पर उनकी आइडी तक बंद करनी पड़ती है या उस पर कुछ समय के लिए रोक लगा दी जाती है।
दरअसल वर्त्तमान समय में मुस्कुराना क्या होता है, लगभग प्रत्येक व्यक्ति भूल चुका है, उसे सामने देखने केलिए अपने गर्दन को उठाना पड़ता है और यदि गर्दन उठी तो जानो मोबाइल में से कुछ अनहोनी या ग़ुम हो जाने का डर लगा रहता है, चहुँओर मनुष्ययों की झुकी गर्दन के साथ अंगुलियां मोबाइल पर काम करती नजर आती हैं। ऐसा लगता है मानो कि गांधीजी के चौथे बंदर इस धरती पर अवतरीत हो चुका है। बुरा मत देखो -सुनो वाले वह तीन बंदर थे और अब चौथा बंदर अच्छा बुरा न तो कुछ देखता है और न ही सुनने के अलावा न बोलता है …बोलता हैं तो केवल उसकी अंगुलियां। वर्त्तमान समय में हमारे मानव सभ्यता विकास की उस सिमा तक पहुँच गया है कि जहाँ से शायद किसी को अपने अतीत में झाँकने का समय एवं मौका ही न मिले व्यक्ति धीरे धीरे केवल अपने तक ही सिमट कर रह जाये।