15 जनवरी जन्मदिन विशेष: एक सामान्य परिवार से आई दलित महिला ने ऐसा मुकाम हासिल किया जैसा कि इस देश के इतिहास में कम ही महिलाओं ने किया है
जी के चक्रवर्ती
आज बसपा सुप्रीमो मायावती का 62वां जन्मदिन है और यह दलित समाज के लिए बड़े गर्व की बात है कि राजनीति में एक बड़े बदलाव में उनका प्रमुख योगदान रहा है और आगे भी रहेगा। दलित समाज को एक नयी दिशा देने और उनके आरक्षण की पक्षधर बसपा सुप्रीमो ने बड़े से बड़े राजनीतिज्ञयों को भी धूल चटा चुकी है। देश की एक महिला राजनीतिज्ञ बतौर बसपा सुप्रीमो मायावती उत्तर प्रदेश की 4 बार पूर्व मुख्यमन्त्री रह चुकी हैं। मायावती भारत की सबसे युवा दलित महिला मुख्यमंत्री होने का भी श्रेय उन्हें प्राप्त है। वे चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहने के अलावा, उन्होंने सत्ता हासिल करने के साथ-साथ उसमे आने वाली कठिनाइयों का सामना भी बखूबी किया है।

उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत एक स्कूल शिक्षिका के तौर पर शुरु की थी लेकिन माननीय कांशीराम की विचारधारा और कर्मठता से प्रभावित होकर उन्होंने राजनीति में आने का निर्णय लिया। उनका राजनैतिक इतिहास बहुत सफल रहा और वर्ष 2003 में उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव में पराजित होने के बावजूद उनकी वर्ष 2007 में पुनः सत्ता में वापसी की। वे अपने समर्थको में बहन जी के नाम से जनि जाती है बसपा सुप्रीमो मायावती 13 मई 2007 को चौथी बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमन्त्री बनीं एवं उन्होंने अगले पाँच वर्षों तक शासन सत्ता संभालने के बाद वर्ष 2012 का चुनाव अपनी प्रमुख प्रतिद्विन्द्वी समाजवादी पार्टी से चुनाव हार गयीं।
बसपा एक अकेली ऐसी पार्टी है जो दलितों, पिछड़ो, मुस्लिम और धार्मिक अल्पसंख्यको के मसीहा बाबा साहेब के बताए रास्ते पे चलकर आगे बढ़ रही है: मायावती
प्रारम्भिक जीवन में उनका नाम मायावती उर्फ़ (चंदावती देवी ) था और उनका जन्म 15 जनवरी सन 1956 को देश की राजधानी दिल्ली में हुआ था। उनकी माँ का नाम रामरती एवं पिता का नाम प्रभु दयाल था। प्रभु भारतीय दूरसंचार केंद्र में एक अफसर थे। उनके 6 पुत्रों के साथ एक पुत्री मायावती थीं उन्होंने कालिंदी कॉलेज, दिल्ली, से कला में स्नातक की उपाधि ली और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय से एल.एल.बी और बी. एड की परीक्षा भी उत्तीर्ण की। उनके पिता प्रभु दयाल जी उन्हें कलेक्टर बनाना चाहते थे जिसके लिए मायावती ने अपना संपूर्ण समय भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा के तैय्यारी में लगा दिया था। अपने पढ़ाई-लिखाई के दौरान उन्होंने शिक्षिका के रूप में भी कार्य किया। मायावती के जीवन में कांशी राम जी के प्रभावित रहने के कारण उनके पिता उनसे बिलकुल भी खुश नहीं थे लेकिन फिर भी मायावती ने अपने पिता भी बातों की अनसुनी करते हुए कांशीराम जी द्वारा शुरू किये गए कार्यों एवं परियोजनाओं से जुड़ती चली गयीं।
वर्ष 1984 में जब कांशी राम ने एक ‘बहुजन समाज पार्टी के नाम से राजनैतिक दल का गठन किया तो मायावती ने शिक्षिका की पद से अपनी नौकरी छोड़ कर पार्टी की पूर्णकालिक कार्यकर्त्ता बन गयीं। उसी वर्ष उन्होंने मुज्ज़फरनगर जिले की कैराना लोक सभा सीट से अपना पहला चुनावी राजनीति जीवन की शरुआत की। सन 1985 और 19 87 में भी उन्होने लोक सभा चुनाव में कड़ी मेहनत की थी इसी प्रकार संघर्ष करते हुए अंतंतः सन 1989 में ‘बहुजन समाज पार्टी’ ने 13 सीटो पर चुनाव जीत कर राजनितिक जीवन की सफलता की स्वाद चखे।

मैं खासकर कांग्रेस पार्टी से ये जानना चाहती हूं कि बाबा साहेब को भारत रत्न से सम्मानित क्यों नहीं किया था. इसके अलावा मंडल आयोग की शिफारिशों को लागू क्यों नहीं किया?- मायावती
‘बहुजन समाज पार्टी’ की पैठ दलितों एवं पिछड़े वर्ग के लोगो में बढती गयी और सन 1995 में मायावती उत्तर प्रदेश की गठबंधन सरकार में मुख्यमंत्री बनायी गयीं। वर्ष 2001 में पार्टी के संस्थापक कांशी राम ने मायावती को दल के अध्यक्ष के रूप में मनोनीत कर अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। वर्ष 2002-2003 के दौरान भारतीय जनता पार्टी की गठबंधन सरकार में मायावती फिर से मुख्यमंत्री चुनी गई। इस के पश्चात बीजेपी ने सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया और मायावती सरकार गिर गयी। इसके बाद मुलायम सिंह यादव को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया था।

सन 2007 के विधान सभा चुनाव के बाद मायावती फिर से सत्ता में लौटी और उनका राजनितिक अभ्युदय सचमुच अद्भुत रहा है। एक सामान्य परिवार से आई दलित महिला ने ऐसा मुकाम हासिल किया जैसा कि इस देश के इतिहास में कम ही महिलाओं ने किया है। मायावती विवादों की परवाह किए बिना, अपने समर्थको ने हर दफा उनका साथ दिया एवं अपनी वफादारी का परिचय दिया।
गेस्ट हाउस प्रकरण: उनके जीवन का काला दिन
2 जून 1995 को उत्तर प्रदेश की राजनीति में जो हुआ वह शायद ही कहीं हुआ होगा। मायावती उस वक्त को जिंदगी भर नहीं भूल सकतीं। 12 जून को प्रदेश की राजनीति का ‘काला दिन’ कहें तो शायद कुछ भी गलत नहीं होगा। उस दिन एक उन्मादी भीड़ सबक सिखाने के नाम पर दलित नेता की आबरू पर हमला करने पर उतारू हो गई थी। उस दिन को लेकर तमाम बातें होती रहती हैं लेकिन, यह आज भी एक कौतुहल का ही विषय है कि 2 जून 1995 को लखनऊ के राज्य अतिथि गृह में हुआ क्या था? मायावती के जीवन पर आधारित अजय बोस की किताब ‘बहनजी’ में गेस्टहाउस में उस दिन घटी घटना की जानकारी आपको तसल्ली से मिल सकती है।
दरअसल, 1993 में हुए चुनाव में एक अब शायद ही कभी होने वाला गठबंधन हुआ था, सपा और बसपा के बीच। चुनाव में इस गठबंधन की जीत हुई और मुलायम सिंह यादव प्रदेश के मुखिया बने। लेकिन, आपसी मनमुटाव के चलते 2 जून, 1995 को बसपा ने सरकार से किनारा कर लिया था एवं समर्थन वापसी की घोषणा कर दी। इस वजह से मुलायम सिंह की सरकार अल्पमत में आ गई।
राजनितिक सफर:

1956: दिल्ली में जन्म
1977: शिक्षिका के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत की
1984: शिक्षिका पद की नौकरी छोड़ कर बसपा पार्टी में प्रवेश किया।
1989: लोकसभा चुनाव में उनकी बसपा पार्टी ने कुल 13 सीटों पर जीत हासिल की थी।
1995: में पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के रूप में चुनी गायीं।
1997: दोबारा मुख्यमंत्री के रूप में चुनी गायीं।
2001: कांशी राम की उत्तराधिकारी घोषित की गयीं।
2002: एक बार पुनः उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनाई गयीं।
2007: चौथी बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त हुयीं।
राज्यपाल ने सुश्री मायावती को जन्म दिवस की दी बधाई
उत्तर प्रदेश के राज्यपाल श्री राम नाईक ने आज बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री मायावती को जन्म दिवस की बधाई दी। राज्यपाल ने सुश्री मायावती से फोन पर बात की तथा उनके स्वस्थ एवं दीर्घायु होने की कामना की।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)









