
देवेश पाण्डेय ‘देश’
लखनऊ के ठाकुरगंज क्षेत्र के तहसीनगंज मोहल्ले में एक अत्यन्त प्राचीन मन्दिर है, इस मन्दिर को लोग पूर्वी देवी मन्दिर अथवा बाघम्म्री सिद्घपीठ के नाम से जानते हैं, चूंकि यहां अत्यन्त प्राचीन काल से भगवान भोलेनाथ का शिवलिंग भी विराजमान है, इसलिए कुछ लोग इसे महाकालेश्वर मन्दिर के नाम से भी पुकारते हैं। यह मन्दिर कब बना, कितनी पुरानी इसकी स्वंयभू विराजित प्रतिमा है, इसकी कोई तथ्यात्मक अथवा सटीक जानकारी किसी के भी पास उपलब्ध नहीं है। लेकिन इसकी पुरानी दीवारों में लगी लखौड़ी ईंटों के आधार पर मन्दिर समिति के संरक्षक एवं संस्थापक प्रमोद कुमार शुक्ल और समिति के अध्यक्ष नरेश कुमार शुक्ल बताते हैं कि मन्दिर लगभग छ: वर्ष प्राचीन है। गोमती नदी के समय के साथ-साथ अपना स्थान निरन्तर छोड़ते रहने और यहां की मिटटी की प्रकृति एवं गुणों को देखकर यह अनुमान लगाया जाता है कि मन्दिर के ठीक पीछे की और कभी इस स्थान पर गोमती नदी बहती थी। समय बदलता गया और अपनी प्रकृति के अनुसार गोमती भी खिसकती हुई इस स्थान से काफी दूर चली गयी। आदि शक्ति पीठ माँ पूर्वी देवी मंदिर का इतिहास काफी प्राचीन माना जाता है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह स्थल आदि काल से शक्ति उपासना का केंद्र रहा है। हालांकि, मंदिर के निर्माण की सटीक तिथि और संस्थापक के बारे में अधिक प्रामाणिक ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन लोक कथाओं और जनश्रुतियों के अनुसार, यह मंदिर सदियों पुराना है। एक मान्यता के अनुसार, इस मंदिर की स्थापना किसी चमत्कारी घटना के फलस्वरूप हुई थी। यह मन्दिर देवी दुर्गा के एक रूप माँ पूर्वी देवी को समर्पित है और श्रद्धालुओं के बीच अत्यधिक आस्था का केन्द्र है। मन्दिर का धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यन्त गहरा है और यह शक्ति-उपासना के महत्वपूर्ण स्थलों में से एक माना जाता है।
कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि आज से लगभग छ: सौ साल पहले गोमती नदी के किनारे इस स्थान पर घना जंगल हुआ करता था। इस जंगल में यह मन्दिर कभी छोटी सी मठिया के रूप में हुआ करता था। ऐसा भी कहा जाता है कि उस समय एक साधक नित्य प्रति इस मठिया में अराधना और मठिया की देख-भाल किया करता था। कहा जाता है कि एक समय उस साधक ने माँ दुर्गा की कठोर तपस्या की थी, जिसके बाद देवी ने उन्हें दर्शन दिये थे और इस स्थान को शक्ति पीठ के रूप में प्रतिष्ठित किया। इसके बाद, धीरे-धीरे इस स्थान को एक पवित्र स्थल के रूप में ख्याति मिलने लगी और श्रद्धालु यहाँ दर्शन एवं पूजा के लिए आने लगे। एक अन्य कथा के अनुसार, यह स्थल शक्ति साधकों और तांत्रिकों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा है। आदि शक्ति पीठ माँ पूर्वी देवी की उपासना करने से भक्तों को अलौकिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है, ऐसा विश्वास किया जाता है।
इस मंदिर का नाम ‘पूर्वी देवी’ इसलिए पड़ा क्योंकि यह मंदिर क्षेत्र के पूर्व दिशा में स्थित है और पूर्व दिशा को आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यन्त शक्तिशाली माना जाता है। कुछ लोगों का मन्दिर के नाम को लेकर ऐसा भी कहना है कि पूर्वी देवी नाम से आशय उस समय से पूर्व से है। प्रमोद कुमार शुक्ल बताते हैं कि माँ पूर्वी देवी का मन्दिर अनेक स्थानों पर विद्यमान है, लेकिन हर स्थान पर मन्दिर की दिशा पूरब की ही ओर होती है। माँ पूर्वी देवी के मन्दिरों की एक और विशेषता यह होती है कि पूर्वी देवी के प्रत्येक मन्दिर में नीम का वृक्ष अवश्य मिलता है। इस मन्दिर में भी एक नीम का पेड़ है और उसी के नीचे प्रारम्भ से ही माँ पूर्वी देवी की प्रतिमा प्रतिष्ठïपित है। माँ पूवी देवी और नीम के वृक्ष में क्या सम्बन्ध है और इसके पाश्र्व में क्या संयोग है, इसे लेकर वह अनभिज्ञता जताते हैं।
कहते हैं कि एक बार फिर समय ने करवट बदली और जंगल के वृक्षों को काटकर मानव पेट की क्षुदा शान्त करने के लिए किसानों ने इस स्थान पर खेत बना लिये और यहां पर खेती-बाड़ी करने लगे। इस प्रकार माँ पूर्वी देवी की यह मठिया भी किसी किसान के खेत के अगल-बगल में आ गयी। किसानों ने यहां पर अपने खेत तो बनाये लेकिन किसी ने भी इस मठिया को किसी भी प्रकार की कोई क्षति नहीं पहुंचायी। कहा जाता है कि मठिया के आस-पास का हर किसान सुबह जब आता था तो सबसे पहले मठिया के सामने दो मिनट बैठकर अराधना करता, इसके बाद ही वे अपने कृषि कार्यों को निपटाते थे।
इसी प्रकार संध्याकाल में भी लगभग हर किसान ठीक उसी प्रकार मठिया के सामने बैठकर माँ के सामने शीश झुकाता इसके बाद ही वह अपने घर जाता था। मन्दिर समिति के प्रमुख संयोजक प्रमोद शुक्ल बताते हैं कि सन् 1990 में वह शिक्षा विभाग में कार्यरत थे, उस समय वह किसी के साथ यहां आये थे। इसके बाद माँ पूर्वी देवी की कुछ ऐसी कृपा उनके ऊपर हुई कि वह अक्सर यहां आने लगे, इसके बाद यह सिलसिला प्रतिदिन में बदल गया। चूंकि वह उस समय मन्दिर के पास में ही रहते थे तो यह क्रम लगभग टूटता भी नहीं था। संरक्षक प्रमोद कुमार शुक्ल के अनुसार मन्दिर के एक भाग में वो पुरानी लखौड़ी की दीवार आज भी विद्यमान है, सिर्फ उसके ऊपर नया प्लास्टर और रंग-रोगन कर दिया गया है।
मन्दिर समिति के अध्यक्ष नरेश कुमार शुक्ल जब मन्दिर चारों ओर एलडीए कॉलोनी बना रहा था तब सीधी सडक़ निकालने के उद्देश्य से मन्दिर को तोडऩे का कई बार प्रयास किया गया, लेकिन हर बार असफलता विभागीय कर्मचारियों के हाथ लगी। प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि एक कर्मचारी ने अपने हाथ हथौड़ा लेकर प्राचीन प्रतिमा पर कुठाराघत किया था। वह प्रतिमा क्षतिग्रस्त अवश्य हो गयी थी लेकिन वह कर्मचारी भी उसके बाद से ही मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गया था। उसके घरवालों ने उसका बहुत इलाज करवाया, लेकिन वह तनिक भी ठीक नहीं हुआ। वह कर्मचारी मन्दिर के समीप ही नाली में बेसुध पड़ा रहता था। अन्तत: एक दिन उसकी मन्दिर के पास ही नाली में गिरकर मौत हो गयी।
प्रमोद कुमार शुक्ल के अनुसार मन्दिर का जब जीर्णोंद्घार किया गया तो उस खण्डित प्रतिमा को तो गोमती में ससम्मान विसर्जित कर दिया गया। उसके स्थान पर सन् 1992 में जयपुर से लाकर एक माँ की एक नयी प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठिïत कर दी गयी। इसके अतिरिक्त मन्दिर के भवन को भी थोड़ा वृहद रूप दिया गया। मन्दिर समिति के महामंत्री विपिन कुमार कुशवाहा बताते हैं कि पूर्वी देवी मन्दिर बाघम्बरी सिद्घपीठ के मुख्य गर्भगृह में सिर्फ माँ की ही प्रतिमा है। मुख्य गर्भगृह के ठीक बगल में हनुमान जी की प्रतिमा विराजमान है। हनुमान जी की प्रतिमा से सटी हुआ राम दरबार भी है। रामदरबार के ठीक सामने की ओर शिवलिंग विराजमान है। यह शिवलिंग भी नया ही प्राण-प्रतिष्ठिïत है। मन्दिर की दीप यज्ञशाला के व्यवस्थापक विनीत शर्मा बताते हैं कि माता की नयी प्रतिमा की स्थापना के बाद से ही मन्दिर के भीतर अनेक कार्यक्रम प्रारम्भ कर दिये गये।
माँ पूर्वी देवी एवं महाकालेश्वर मन्दिर की स्थापना के सम्बन्ध में ऐसा कहा जाता है कि यह स्थान हजारों वर्ष प्राचीन है। यहां पर अत्यन्त प्राचीन नीम के वृक्ष के नीचे माँ पूर्वी देवी की प्रधान पीठ भगवान महाकालेश्वर सहित विराजमान है। श्री शर्मा बताते हैं कि माँ पूर्वी देवी एवं भगवान शिव के शिवलिंग की प्रतिमाओं का क्षरण होने के कारण 1992 में नयी प्रतिमाओं की स्थापना की गयी थी। माँ पूर्वी देवी महागौरी के रूप में गौर वर्ण में विराजमान हैं तथा भगवान शिव के शिवलिंग श्याम वर्ण का है।
माँ की प्रतिमा के ठीक बगल में पवनसुत हनुमान की भव्य एवं अत्यन्त प्राचीन प्रतिमा विराजमान हैं। इनके सटे हुए मन्दिर में राम दरबार प्राण-प्रतिष्ठिïत है। इसके अतिरिक्त रामदरबार के ठीक सामने की ओर भगवान शिव लिंग रूप में विराजमान हैं। मंदिर में ही लक्ष्मी नारायण एवं राधा कृष्ण भी स्थापित है। लगभग छ: सौ वर्ष प्राचीन माँ पूर्वी देवी मन्दिर को लेकर लोक आस्था प्रचलित है कि यहां प्राण-प्रतिष्ठिïत महाकालेश्वर के शिवलिंग के ठीक नीचे सदैव से एक नागों का जोड़ा निवास करता है। हालांकि यहां ‘नागोंं का जोड़ा निकलने’ जैसी किसी भी आश्चर्यजनक घटना या चमत्कार का कोई आधिकारिक या प्रामाणिक रिकॉर्ड दर्ज नहीं है। इस प्राचीन मन्दिर में रात्रि के तीसरे पहर के समय नागों की एक जोड़ी का स्वयंभू शिवलिंग के पास आना और पूजा करना बताया जाता है। कुछ लोगों का कहना है कि नागों के शिवलिंग के निकट आकर बैठने के वे प्रत्यक्ष साक्षी हैं।
पूर्वी देवी मन्दिर बाघम्बरी सिद्घपीठ में माता की नयी प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा होने के बाद विभिन्न कार्यक्रमों का शुभारम्भ कर दिया गया था। ये सारे कार्यक्रम यथापूर्व ज्यों के त्यों आज भी आहूत किये जाते हैं। प्रमोद कुमार शुक्ल बताते हैं कि हर वर्ष महाशिवरात्रि के दिन जम्मू के कटरा में स्थित माँ वैष्णों देवी से लायी गयी ज्योति से पंचमुखी दियों को आलोकित किया जाता है। ध्यान देने की बात यह है कि बारह ज्योर्तिलिंगों के नाम पर पूरे बारह दिये जलाये जाने की यहां प्रथा है। इससे भी अधिक ध्यान देने की बात यह है कि मनुष्य का सम्पूर्ण शरीर पंच तत्वों से बना हुआ है, इसलिए यहां पंचमुखी दियों को प्रज्वलित करने की परम्परा प्रारम्भ हुई। इस परम्परा का आशय यह है कि जिस प्रकार हम मृत्यु के बाद अपने शरीर को भगवान शिव के बनाये हुए पंच तत्चों में विलीन करते हैं, उसी प्रकार हम अपने जीवनकाल में अपनेआप को भगवान शिव को समर्पित करते हैं।
श्री शुक्ल बताते हैं कि प्रत्येक वर्ष शिवरात्रि के दिन मन्दिर प्रात:काल पांच बजे से से लेकर रात्रिभर खुला रहता है। इसके अतिरिक्त माता के भवन का पुष्पों से श्रृंगार किया जाता है। संध्याकाल में छ: बजे से रात्रि साढ़े आठ बजे तक भजन संध्या का आयोजन होता है। इसके बाद रात्रि नौ बजे से सुन्दरकाण्ड का पाठ, रात्रि दस बजे रुद्राष्टïायी हवन तथा रात्रि बार बजे से प्रात: पांच बजे तक लगभग 21 यजमानों द्वारा रुद्राभिषेक किया जाता है। शिवरात्रि के दिन ही मन्दिर परिसर में लगे नीम के पेड़ पर कलावा बांधने का कार्यक्रम किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से किसी भी व्यक्ति की मनोकामना पूर्ण होती है और कुंआरी कन्याओं के विवाह हो जाते हैं। अगले दिन पूर्वान्ह ग्यारह बजे से शान्तिकुंज, हरिद्वार के आचार्यों द्वारा पांच कुण्डीय हवन श्रीगायत्री महायज्ञ किया जाता है।
विचारणीय विषय यह है कि लगभग 5100 दीप ज्योतियों के द्वारा दीपयज्ञशाला के पंचमुखी महादेव का दीपदान किया जाता है। इसी दिन देशभर के 1100 मन्दिरों में भेजे गये पंचमुखी दीपकों एवं बत्तियों के संध्याकाल में प्रज्जवलन के साथ ही यह दीपदान का कार्यक्रम सम्पन्न होता है। इसके अतिरिक्त हर वर्ष शारदीय एवं वासन्तिक नवरात्र में माता को विभिन्न रूपों में सजाया जाता है। श्रावण मास में मन्दिर समिति द्वारा ‘वन उपवन’ कार्यक्रम के अन्तर्गत पौधों का निशुल्क वितरण किया जाता है। ग्रीष्मकाल में प्रत्येक वर्ष 1 मई से लेकर 31 जुलाई तक पौशाला लगाकर जल सेवा कार्यक्रम चलाया जाता है। मन्दिर में होने वाले कार्यक्रमों की श्रृंखला में पिछले पच्चीस वर्षों से अविरल प्रत्येक शुक्रवार को भजन-कीर्तन का कार्यक्रम होता है।
श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को शिवलिंग पर जलाभिषेक एवं रुद्राभिषेक का आयोजन होता है। बसन्त पंचमी के दिन भगवान राम का स्थापना दिवस मनाया जाता है। दिसम्बर मास में राम चरित्र मानस के अखण्ड पाठ का वार्षिक आयोजन होता है। ठाकुरगंज के मां पूर्वी देवी एवं महाकालेश्वर मंदिर बाघंबरी सिद्धपीठ भी शुभता के प्रतीक हैं। यहां हर दिन मां के स्वरूप के अनुसार माँ का श्रृंगार होता है। यहां लोग विवाह में तेल पूजन, नई बहू को माँ के दर्शन कराकर पूजन कराने के लिए भी लोग आते हैं। प्रमोद बताते हैं कि यह मान्यता विवाह से भी जुड़ी है। मंदिर के किनारे से बहती गोमती नदी में दीपदान करने वाले युवक-युवतियों की शादी की मनोकामना अति शीघ्र पूरी होती है। दीपदान का सिलसिला आज तक जारी है।






