संजीव नेगी
दया, करुणा, क्षमा, धैर्य और सत्यशीलता जैसे चारित्रिक गुणों और प्रेम, सौहार्द, समानता, बंधुत्व जैसे सिद्धांतों ΄पर आधारित हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था मूलत: मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन से उपजे मानव-मू्ल्यों पर आधारित है। मध्ययुग के भक्तिकालीन संतों ने जीवन जीने का जो मार्ग दिखाया, उसी पर चलते हुए हमने अपनी आधुनिक संवैधानिक व्यवस्थाओं को कायम किया है। जीवन को सार्थक दिशा देने वाले इन महा पुरुषों में संत रविदास का नाम प्रमुख है जिन्होंने अपने संदेशों और कविताओं के जरिये जीवन-यापन की ऐसी युक्ति दिखायी जो आज भी अत्यन्त प्रसंगिक है। श्रीकृष्ण की अनन्य प्रेमिका मीराबाई के गुरु इस महान संत की वाणी ही नहीं अपितु सहज जीवन भी देवत्व की अनुपम मिसाल है।

1398 ई. में माघी पूर्णिमा के दिन काशी में जन्मे संत रविदास के माता-पिता चर्मकार थे। इन्होंने भी आजीविका के लिए पैतृक कार्य को अपनाया लेकिन मन में भगवान की भक्ति ऐसी रची-बसी थी कि आजीविका को धन कमाने का साधन बनाने की बजाय संत सेवा का माध्यम बना लिया। संत और फकीर जो भी द्वार पर आते, बिना पैसे लिए अपने हाथों से बने जूते पहना देते। इस स्वभाव के कारण जब घर खर्च कठिन होने लगा तो पिता ने मजबूर होकर घर से बाहर रहने के लिए उन्हें थोड़ी सी भूमि दे दी। जमीन के उस छोटे से टुकड़े पर रविदास जी ने एक छोटी सी कुटिया बना लिया। जूते बनाकर जो कमाई होती उससे संतों की सेवा करते और जो कुछ बच जाता, उससे अपना गुजारा। एक दिन एक ब्राह्मण उनके द्वार आए और कहा कि गंगा स्नान करने जा रहे हैं, एक जूता चाहिए। उन्होंने बिना पैसे लिए ब्राह्मण को एक जूता दे दिया। फिर एक सुपारी ब्राह्मण को देकर कहा कि इसे मेरी ओर से गंगा मैया को चढ़ा देना। ब्राह्मण सुपारी लेकर गंगास्नान करने चल पड़ा। गंगा स्नान के बाद उसने गंगा मैया की पूजा की और जब चलने लगा तो अनमने मन से रविदास जी द्वारा सी गयी सुपारी गंगा में उछाल दी। तभी एक चमत्कार हुआ। रविदास जी द्वारा दी गयी सुपारी अपने हाथों में थामे गंगा मैया प्रकट हुई और सोने का एक कंगन उस ब्राह्मण देकर कहा- इसे ले जाकर रविदास को दे देना। ब्राह्मण भाव विभोर होकर रविदास जी के पास आया और बोला कि मैने आज तक हमेशा श्रद्धाभाव से पूजा की लेकिन मुझे गंगा मै या के दर्शन कभी नहीं हुए लेकिन आपकी भक्ति इतनी गहरी है कि गंगा मैया ने स्वयं प्रकट होकर आपकी दी हुई सुपारी को स्वीकार किया और आपको सोने का कंगन दिया है। आपकी कृपा से मुझे भी गंगा मैया के दर्शन हो गये इसके लिए मैं दिल से आपका आभार जताता हूं।
देखते ही देखते इस बात की खबर पूरी काशी में फैल गयी। रविदास के विरोधियों ने इसे पांखंड बताया और कहा कि अगर रविदास सच्चे भक्त हैं तो दूसरा कंगन लाकर दिखाएं। विरोधियों के इन कटु वचनों को सुनकर रविदास जी भक्ति में लीन होकर भजन गाने लगे। रविदास जी चमड़ा साफ करने के लिए एक बर्तन में जल भर कर रखते थे। उस बर्तन में रखे जल से गंगा मैया प्रकट हुर्इं और दूसरा कंगन रविदास जी को भेंट किया। रविदास जी के विरोधियों का सिर नीचा हुआ और संत रविदास जी की जय-जयकार होने लगी। तभी से यह दोहा पर सिद्ध हुआ- मन चंगा तो कठौती में गंगा। संत रविदास का जीवन ऐसे अद्भुत एवं अविस्मरणीय प्रसंगों से भरा हुआ है, जो मनुष्य को सच्चा जीवन मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं।
मनुष्य की लोभी प्रवृत्ति पर व्यंग्य करते हुए गुरु रविदास लिखते हैं-
माटी को पूतरा कैसे नचतु है
देखै-सुनै-बोलै दउरिओ फिरत है
जब कुछ पावै तब गरबु करतु है
मइआ गई तब रोवनु लगतु है
अर्थात शरीर माटी का पुतला है। जो नाचता-दौड़ता फिरता है। उसे कुछ मिल जाता है तो वह गर्वीला हो जाता है, वही माया खत्म हुई तो रोने लगता है।
रविदास जी ने बताया कि मनुष्य मात्र घास की टाटी है, जिसे जलकर माटी में मिल जाना है-
इहु तनु ऐसा जैसे घास की टाटी
जलि गइओ घासु रलि गइओ माटी
जल की भीति पवन का थंबा, रकत बूंद का गारा
हाड़-मास नाड़ी को पिजरू, पंखों बसै बिचारा।
रविदास जी कहते हैं- शरीर तो भौतिक वस्तु है, इसे तो नष्ट हो जाना है। हमें इस पर अभिमान न करके शरीर के माध्यम से अपने अंतस को निखारना चाहिए। भौतिक वस्तुओं पर अहंकार करने की तो कोई वजह ही नहीं है। क्योंकि जीवन तो भादों में उगने वाले कुकुरमुत्ते की तरह है। उनका कहना है कि काम, क्रोध, लोभ, अहंकार और ईर्ष्या ये पांचों शत्रु मनुष्य को भ्रष्ट कर देते हैं। उन्होंने अपने जीवन में इन पांच शत्रुओं को स्वयं से दूर रखा। गुरु रविदास का मानना था कि मनुष्य ईश्वर का अंश है और जिसका हृदय शुद्ध है, वह स्वयं ईश्वर का रूप है। उनका विश्वास था कि यदि सभी प्राणी विकारों को त्याग कर शुद्ध हृदय से युक्त हो जाएं, तो श्रेष्ठ समाज की स्थापना हो सकती है। संत रविदास जयंती पर यदि हम उनकी शिक्षाओं पर चलें तो निश्चित ही एक श्रेष्ठ समाज की और श्रेष्ठ मनुष्य की रचना हो सकती है।


पांच शत्रुओं को स्वयं से दूर करो




