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    अपूर्ण आस्था का समाधान

    By April 1, 2018 Current Issues No Comments7 Mins Read
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    डॉ. दिलीप अग्निहोत्री
    प्रचलित नाम भले ही संक्षेप में हो, लेकिन किसी के पूरे व सही नाम के प्रति भी सम्मानभाव होना चाहिए। जानबूझकर कमियों को आत्मसात करना अनुचित है। डॉ आंबेडकर के सही नाम लिखने का शासनादेश बहुत पहले ही जारी होना चाहिए था। लेकिन देर आये, दुरुस्त आये। बेहतर होता कि इस कार्य का पार्टी लाइन से ऊपर उठकर स्वागत किया जाता। जहाँ तक डॉ. आंबेडकर के जनसामान्य अनुयाइयों की बात है, वह सहज है। लेकिन यह साबित हुआ कि  कुछ नेताओं के लिए वोटबैंक की राजनीति से ऊपर उठकर सोचना संभव ही नहीं है। इसी के साथ कतिपय दलित चिंतक भी पूर्वाग्रह से ग्रसित है।
    ऐसे लोगों ने यह भी नहीं सोचा कि उनका यह कृत्य आपत्तिजनक है। वह डॉ भीमराव आंबेडकर के नाम से उनके पिता के नाम को अलग रखने की घृणित हिमायत कर रहे है। यह स्थानीय सामाजिक परंपरा है। इसी के अनुरूप नाम के  साथ उनके पिता का नाम शामिल था। उनका नाम राम जी मलो जी सकपाल था। इस प्रकार उनका नाम भीमराव राम जी आंबेडकर हुआ। गनीमत है कि आज जैसे वोटबैंक के दीवाने  नेता उस समय उनके साथ नहीं थे। अन्यथा वह उनके नाम से आंबेडकर सरनेम भी हटवा देते। क्योकि यह सरनेम उनके ब्राह्मण गुरु ने दिया था। वह अपने छात्र भीमराव की प्रतिभा पहचान चुके थे। वह चाहते थे कि सामाजिक स्तर पर उनको भेदभाव का सामना न करना पड़े। एक शिक्षक के रूप में वह जितना कर सकते थे, उन्होंने किया।
    दूसरी ओर एक पुत्र और शिष्य के रूप में भीमराव जो कर सकते थे, उन्होंने किया। उन्होंने महाराष्ट्र की परंपरा का निर्वाह किया। अपने नाम के साथ पिता का नाम रामजी बनाये रखा, साथ ही शिक्षक द्वारा दिये गए आंबेडकर को भी अलग नहीं किया। संविधान की दुहाई देने वालों को उसी में यह सच्चाई देखनी चाहिए। जिसमें उन्होंने स्वयं अपना पूरा हस्ताक्षर किया है, -भीमराव राम जी आंबेडकर।
    इसका यह मतलब नही की किताबों में लेखक की जगह, या  संबोधन, उल्लेख , आदि में किसी के पूरे नाम लिखना भी जरूरी है। इन सबमें नाम का छोटा रूप भी  चलता। इसके लिए वह स्वयं भी बी आर आंबेडकर लिखते थे। लेकिन  बी आर का पूर्ण रूप और आंबेडकर  की सही रूप में जानकारी तो अवश्य होनी चाहिए। महापुरुषों के उस नाम की जानकारी भावी पीढ़ी को मिलनी चाहिए, जिससे उन महापुरुष का स्वयं लगाव रहा हो और जिसमें किसी स्थानीय परंपरा का निर्वाह  भी हो। डॉ आंबेडकर ने यही किया। ऐसी व्यापक सोच ही किसी मनुष्य को महापुरुष बनाती है।
    उनके नाम पर आज राजनीति और चिंतन करने वाले आत्मचिंतन करें। ये सीमित और निहित स्वार्थों के दायरे में है। इसलिये  इनमें डॉ आंबेडकर के वास्तविक नाम संबन्धी निर्णय के स्वागत का साहस नहीं है। जो कार्य उनके नाम पर वोटबैंक की सियासत करने वालों से अपेक्षित था, उसे उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने किया। यदि आज पूर्ववर्ती सत्ता दल की सरकार होती, तो राम नाईक के डॉ आंबेडकर नाम संबन्धी सुझाव पर अमल भी नहीं होता। गनीमत है कि उत्तर प्रदेश में इस समय भाजपा सरकार है। जिसने इस को क्रियान्वित किया।
    राम नाईक ने उत्तर प्रदेश के समस्त अभिलेखों में भारतीय संविधान निर्माता के सही नाम संबन्धी शासनादेश को उचित बताया है। सामान्य प्रशासन विभाग उत्तर प्रदेश शासन द्वारा 28 मार्च, 2018 को शासनादेश जारी कर भारत के संविधान की अष्टम अनुसूची (अनुच्छेद-344(1) और-351) भाषाएं में अंकित नाम का संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश से संबंधित समस्त अभिलेखों में ‘डाॅ. भीमराव अम्बेडकर’ का नाम संशोधित कर ‘डाॅ. भीमराव रामजी आंबेडकर’ करने का निर्णय लिया था।
    इस प्रकरण ने राम नाईक की जागरूकता और महापुरुषों के प्रति उनके सम्मान भाव को भी उजागर किया।   वह पदेन आगरा  के  कुलाधिपति है। इस रूप में उन्होंने  देखा कि विश्वविद्यालय का नाम ‘डॉ भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा’ अंकित है। जबकि ‘भारत का संविधान’ के पृष्ठ दो सौ चौवन में डाॅ. आंबेडकर ने हस्ताक्षर करते हुए ‘डाॅ. भीमराव रामजी आंबेडकर’ लिखा है। सही नाम के संबन्ध में इससे बड़ा कोई प्रमाण नहीं हो सकता । क्योकि  प्रमाण का उल्लेख स्वयं डॉ आंबेडकर ने किया है। उन्होंने कहा कि डाक्टर के स्थान पर ‘डाॅ.’ एवं लिखना पर्याप्त होगा तथा भीम राव दो शब्द नहीं है बल्कि ‘भीमराव’ एक शब्द है। इसी प्रकार ‘अम्बेडकर’ के स्थान पर ‘आंबेडकर’ लिखना  चाहिए। इतना ही नहीं राम नाईक ने  डाॅ. आंबेडकर का सही नाम लिखे जाने के संबंध में  राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केन्द्रीय गृह मंत्री, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री एवं सुश्री मायावती को भी पत्र प्रेषित किया था। आगरा विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह 5 दिसम्बर, 2017 में राष्ट्रपति की उपस्थिति में डाॅ. भीमराव आंबेडकर के नाम से जुड़े विश्वविद्यालय के नाम में उचित संशोधन की उन्होंने बात कही थी। उन्होंने इस संबंध में 11 दिसम्बर, 2017 को राष्ट्रपति से भेंट की तथा नई दिल्ली में एक पत्रकार वार्ता को सम्बोधित करके लोगों से डाॅ. आंबेडकर के सही नाम का प्रयोग करने हेतु आह्वान भी किया। उनके सुझाव को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उचित पाया तथा राज्य विधान मण्डल के दोनों सदनों से राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 में इस आशय के संशोधन का विधेयक 22 दिसम्बर, 2017 को सभी राजनैतिक दलों की सर्वसम्मति से पारित हुआ जिसके पश्चात् आगरा विश्वविद्यालय का नाम ‘डाॅ0 भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा’ हुआ।
    राज्यपाल ने यह भी बताया कि आंबेडकर महासभा द्वारा 6 दिसम्बर, 2017 को आयोजित बाबा साहब डाॅ. भीमराव आंबेडकर की पुण्यतिथि के कार्यक्रम, जिसमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी उपस्थित थे, उन्होंने बाबा साहब के सही नाम की चर्चा की थी। मुख्यमंत्री ने कार्यक्रम में बाबा साहब के प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करते हुए सभी सरकारी कार्यालयों में बाबा साहब का चित्र लगाने की घोषणा की थी।
    राम नाईक का डॉ आंबेडकर के प्रति सदैव बहुत सम्मान रहा है। 1989 में जब वह पहली बार सांसद निर्वाचित हुए थे तो उन्होंने 28 दिसम्बर, 1989 को लोकसभा के प्रथम अधिवेशन में अतारांकित प्रश्न के रूप में जानकारी चाही थी कि (क) क्या सरकार ने वर्ष 1990 में डाॅ. बीआर आंबेडकर की जन्म शताब्दी के अवसर पर कोई विशेष डाक टिकट जारी करने का निर्णय लिया है और (ख) यदि हाँ तो सरकार का इस संबंध में क्या समयबद्ध कार्यवाही करने का विचार है। तत्कालीन सरकार के संचार मंत्री केपी उन्नीकृष्णन ने लोकसभा में जवाब दिया था कि (क) नहीं, डाॅ0 बी0आर0 आंबेडकर के सम्मान में पन्द्रह और बीस पैसे मूल्य वाले दो डाक टिकट क्रमशः 14/4/1966 और 14/4/1973 को जारी किए जा चुके हैं, (ख) फिलहाल कोई अन्य डाक टिकट जारी करने का प्रस्ताव नहीं है। सरकार के इस जवाब के बाद उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह से मुलाकात कर मांग की थी कि जिस प्रकार लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी एवं पं. जवाहर लाल नेहरू की जन्मशताब्दी मनायी गयी उसी प्रकार डाॅ. आंबेडकर की जन्मशताब्दी मनायी जानी चाहिए। लेकिन  दस नवम्बर, उन्नीस सौ नब्बे  को विश्वनाथ प्रताप सिंह पद से हट गए, और चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बनें। राम नाईक ने उनसे इस विषय के संबंध में बात की, परिणामतः भारत सरकार की ओर से डाॅ. आंबेडकर की जन्मशताब्दी के अवसर पर डाक टिकट उन्नीस सौ इक्यानबे में जारी हुआ। उस टिकट पर ‘डाॅ. भीमराव रामजी आंबेडकर’ और अंग्रेजी में  भी इसी का अनुवाद  अंकित है।
    लेकिन उसके बाद राजनीतिक कारणों से पूरे नाम से परहेज होने लगा। यह असम्मानजनक स्थिति थी। अच्छा है कि राम नाईक के प्रयास सफल हुए। योगी आदित्यनाथ की सरकार ने उनकी सलाह से सराहनीय कार्य किया है। सरकारी दस्तावेजों के साथ ही स्मारकों पर भी उनका पूरा नाम अंकित होना चाहिए।
    .लेखक वरिष्ठ पत्रकार है

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