जी के चक्रवर्ती
अभी कुछ ही दिनों पहले देश के दो राज्यो उत्तर प्रदेश एवं जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में एक छोटा सा गांव सारसाना जिससे हमारे देश के ज्यादातर लोग अपरिचित थे लेकिन वह गांव वर्त्तमान समय में संपृर्ण देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। दुःखद इससलिए है कि इस गांव की चर्चा किसी अच्छे काम के लिए नहीं वल्कि उस भीभस्त घटना के कारण हो रही है जो हमारे मानव सभ्य समाज की आदर्श सभ्यता को तार-तार करने वाली है। अभी 10 जनवरी 2018 के दिन को जम्मू-कश्मीर के कठुआ गांव की एक 8 वर्ष की मासूम बालिका गुम हो गई और गुम होने के एक सप्ताह के बाद उसकी लाश बरामद हुई। मात्र 8 वर्ष की बालिका कई दिनों तक यातनायें सहती रही इस बात को सुनने वाले लोगों का ह्रदय द्रवित हो जायेगा।इस बालिका के शव मिलने के बाद जम्मू-कश्मीर की अपराध शाखा द्वारा जो आरोप पत्र अदालत में दाखिल की गई है उससे यह बात सामने निकल कर आई है कि उसे कई दिन तक एक मंदिर में बंदी बनाकर कई लोगों ने बारी-बारी से उसके साथ लगातार दुष्कर्म करते रहे और कई दिनों के बाद उसकी हत्या कर दी। कठुआ में घटित हुई इस घटना से उस नाबालिग मासूम के साथ जो भी हुआ उससे यही कहना पड़ता है कि इंसान एक गाली के समान लगने लगा है। आज के इंसान से तो जानवर कहीं अच्छे हैं। जो इंसान अपराधियों को धर्म की आड़ में शरण देते हैं इन लोगों को यह मालूम होना चाहिए कि उनके इस कृत्य के लिए वे भी उतने ही अपराधी है। उन लोगों को यह हमेशा यह याद रखना चाहिए कि कहीं किसी की बेटी बेटी है, और अपराध अपराध है। उसका किसी भी तरह के जाती-धर्म संप्रदाय से कोई मतलब नहीं होता है।’
कठुआ की इस मार्मिक घटना के उजागर होने के मध्य ही उत्तर प्रदेश के उन्नाव शहर के भाजपा के एक विधायक कुलदीप सिंह सेंगर पर एक किशोरी से दुष्कर्म करने का आरोप लगाया गया है। इस घटना की शिकायत दर्ज होने के आठ महीनो के बाद भी आरोपियों को सजा मिलने स्थान पर उलटे सजा पीड़िता किशोरी के पिता को मिला। आरोपित विधायक के भाई ने किशोरी के पिता को इस कदर बुरी तरह से पीटा एवं उलटे उसे ही पुलिस ने जेल में डाल दिया, जहां पर उनकी मौत हो गई। फिर परिवारवालों की चीख-पुकार मीडिया के माध्यम से मौजूदा सरकार के कानों तक बात पहुंची तब तक न्यायपालिका भी सक्रिय हो गई थी। न्यायालय की सक्रियता के कारण मामले की जांच सीबीआइ को सौंपी दी गई, सीबीआई द्वारा त्वरित कार्यवाही करके विधायक को गिरफ्तार कर लिया।

देश में इस तरह के बढ़ते बलात्कारों एवं दुष्कर्मों जैसी घटनाओं के कारण प्रतिदिन महिलाएं, किशोरियां एवं बच्चियां आये दिन बलात्कार या दुष्कर्म के शिकार होती चली जा रही हैं। अभी हाल ही में गुजरात के सूरत में एक ग्यारह वर्ष की लड़की दरिंदों के हाथों में पड़कर उसकी मौत हो गई। जिसमें भी संदेह जताया गया कि वह दुष्कर्म की शिकार हुई है। आज हमारे मानवीय समाज की इतनी अवनति हो चुकी है कि किसी भी व्यक्ति द्वारा तीन-चार वर्ष की छोटी शिशु बच्चियों से लेकर वृद्धों को भी अपने वासना पूर्ति का साधन बनाने लगे है।
अभी हल ही में हुए उन्नव एवं कठुआ जैसी घटनाओं पर वर्त्तमान समय में समाज के आम लोगों के मध्य रोष पैदा होने के बाद देश के प्रधानमंत्री ने देश के लोगों को यह भरोसा दिलाया है कि कोई भी अपराधी हो या कितना ही रसूखदार व्यक्ति, वह बचेगा नहीं। दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कठुआ कांड के मामले में लोगों को जल्द ही न्याय दिलाने की बात कही है। जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री चाहती हैं कि इस मामले की नियमित सुनवाई हो जिससे इस मामले में जल्दी से जल्दी फैसला सुनाकर दोषियों को दंडित किया जा सके।
उन्नव में हुए घटना के मामले में गनीमत यह रही कि इसकी जांच का काम तुरंत सीबीआइ के हाथों सौंप दिए जाने से उस गरीब लड़की एवं उसके परिवार में के अन्य लोगों की जान बची गई। दरअसल हम सभी लीगों के सामने आज यह यक्ष प्रश्न है कि क्या हम अपने यहाँ घटित होने वाले घटनाओं की निष्पक्ष जांच की व्यवस्था कर पाएंगे? कहीं हो न हो समाज के बेकसूर एवं निर्वल लोगों के गले में ही फांसी का फंदा न डाल दिया जाए? क्या कोई समाज सुधारक, सरकार या फिर कोई विचारक इस विषय में सोचेगा कि समाज में अंधवासना की प्रवृत्तिया क्यों बढ़ती जा रही है? एवं इस तरह बढ़ी हुई अंधवासनाओं के ज्वार को कैसे रोका जाए।
जब देश में साबुन की एक टिकिया को बेचने के लिए लगाये गए विज्ञापनों में अर्धनग्न लड़कियों का प्रदर्शन किया जाएगा एवं बाजार में अन्य भोग-विलास की वस्तुओं के विक्रय के लिए लंपटता एवं कामुकता भरे विज्ञापनों से प्रचारित-प्रसारित किए जाने पे रोक लगाने के उपाय नही किए जाएंगे तब तक क्या महिलाओं के खिलाफ होने वाले एसे अपराधों पर लगाम लगाने में हम कामियाब हो पाएंगे ? क्या देश में महिलाओं को आदर सम्मान दिला पाने में कामयाब हो पाएंगे? इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए कि हम नैतिक शिक्षा को हाशिये पर ढकेल कर क्या किसी से आदर्श और नैतिकता की आपेक्षा कर सकते हैं? वर्त्तमान समय में यहां तक कि स्कूली पाठ्यक्रमों से महापुरुषों के जीवन चरित्र, आदर्श एवं नैतिक शिक्षा के पाठ एवं साहित्य पूरी तरह से गायब हो चूके हैं।
आखिरकार हम अपने समाज के लोगों में नैतिक पतन के क्षरण को कैसे रोकेंगे? हम अपने समाज की उन्नति के लिए लोगों में आदर्श अवं चरित्र निर्माण के लिए कुछ क्यों नहीं करना चाहते? वर्त्तमान समय की मांग है कि नेताओं के पंजे से पुलिस को पूरी तरह से मुक्त करके उन्हें स्वतंत्र रूप से अपना कार्य करने का अवसर देना चाहिए एवं हमारे भावी पीढ़ीयों को आदर्श एवं नैतिक शिक्षा से उनके चरित्र निर्माण किये जाने की आवश्यक्ता है जिसके लिए यह बहुत ही उत्तम होगा कि हमारे धर्म गुरुओं शिक्षाशास्त्री जैसे लोग अपने-अपने घरों-दफ्तरों से बाहर निकलकर समाज को सही दिशा में ले चलने का काम निस्वार्थ भावना से करें साथ ही साथ लोगों को यह भी बताएं कि एक आदर्श समाज का निर्माण कैसे करेंगे? इसके अलावा हमें उन्हें यह भी समझना होगा कि समाज में होने वाले दुष्कर्म जैसे अपराधों पर लगाम लगाने या उन्हें दण्डित करने का काम केवल कानूनों को कठोर बना कर ही नहीं किया जा सकता है। अभी कुछ वर्षों पहले दिल्ली में घटित निर्भया प्रकरण के बाद महिला अपराध से जुडी कई कठोर कानून बनाये गए हैं फिर भी क्या आज वर्त्तमान समय में हमारे समाज में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध में कमी हुई है या विल्कुल से समाप्त हो चुकी हैं? जब तक हम अपने समाज के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत नहीं कर पाएंगे तब तक हम अपने समाज में फैले एसे बुराइयों को जड़ से ख़त्म नहीं कर पाएंगे।
.लेखक वरिष्ठ पत्रकार है







