डॉ दिलीप अग्निहोत्री
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चीन में अभूतपूर्व स्वागत हुआ। चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग ने किसी विदेशी मेहमान को पहले इतना समय नहीं दिया था। वह मोदी से मिलने के लिए राजधानी से बाहर आये। दो दिन मोदी के साथ रहे। चीन के मीडिया में दो दिन तक यही खबर चलती रही। बताया जाता है कि चीन का मोदी के लिए पलकें बिछाना उसकी अधिकृत अध्ययन रिपोर्ट प्रेरित था। जिसका यह आकलन है कि नरेंद्र मोदी दुबारा पांच वर्ष के लिए प्रधानमंत्री बनेंगे। जिनपिंग ने माना है कि उन्हें भविष्य में भी नरेंद्र मोदी के साथ कार्य करना है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी ने विशेष मुकाम बना लिया है। उनके प्रयासों से अमेरिका, रूस, जापान, इस्राइल के अलावा यूरोपीय देशों से भारत के संबन्ध बेहतर हुए है। अब भारत पहले की तरह चीन के दबाब में आने वाला नहीं है।
कुछ समय पहले ही जिनपिंग को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी में वह अहमियत मिली है, जो पहले केवल माओ को हासिल थी। उनकी सत्ता को चुनौती देने वाला कोई नहीं है। जिनपिंग ने इसी हैसियत में नरेंद्र मोदी के स्वागत का इंतजाम अपनी निगरानी में कराया था। मुलाकात के लिए उस भवन को चुना गया, जहाँ माओ भी विदेशी मेहमानों से मिलते थे।

नरेंद्र मोदी की चीन यात्रा से कई सन्देश निकले है। एक यह कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के क्षेत्र में नया अध्याय जुड़ा। इसके पहले बिना एजेंडे वाली शिखर वार्ता को ऐसी कामयाबी नहीं मिली थी । एजेंडा होता तो यह तय था कि गतिरोध भी बनता। दोनों देशों के बीच संबंधों में बहुत जटिलता है। बिना एजेंडे वाली यह शिखर वार्ता सफल रही। दूसरा यह कि अहमदाबाद में मोदी द्वारा किये गए स्वागत का जिनपिंग पर कर्ज था, उसे उन्होंने अदा कर दिया। तीसरा यह कि भारत की कांग्रेस पार्टी की तकलीफ कम हो गई । उधर नरेंद्र मोदी चीन गए थे, इधर कांग्रेस बेचैन हो गई थी। उसके अध्यक्ष और प्रवक्ता ने डोकलांम पर वार्ता की नसीहत दी थी । कांग्रेस का मकसद तो तंज करने तक सीमित था। लेकिन नरेंद्र मोदी ने यह विषय जोरदार ढंग से रखा। चीन ने आश्वासन दिया कि अब डोकलांम दोहराया नहीं जाएगा। इसके अलावा सीमा पर तनाव कम किया जाएगा। मोदी की वहाँ हुई मुलाकात का यह सार्वजनिक तथ्य है। लेकिन डोकलांम संकट के समय राहुल गांधी चीनी राजदूत से क्यों मिले थे, इसे देश आज तक जान नहीं सका।
आपस के तनाव कम करने के अनेक प्रयास होंगे। इसके मद्देनजर सेनाओं को बराबरी के सुरक्षा सिद्धान्त,सूचनाएं साझा के तरीके तलाशने के निर्देश दिए गए। अफगानिस्तान में संयुक्त आर्थिक परियोजना पर सहमति बनी। मोदी ने कारोबार संतुलन पर जोर दिया। चीन इससे सहमत हुआ है। उसने यह भी कहा कि वन बेल्ट रोड को लेकर भारत पर कोई दबाब नहीं डालेगा। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का भी चीन ने मंसूबा दिखाया। यह सब तथ्य वार्ता के सार्थक परिणाम है।








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