‘वंदे मातरम्’ बंग-भंग आंदोलन के क्रांतिकारियों का गीत था
कोलकाता, 29 जून। अमित शाह ने कहा कि उत्तर भारत के लोग रामेश्वरम की मिट्टी माथे पर लगाते हैं और तमिलनाडु के लोग बद्रीनाथ को पूजते हैं, कारु-कामख्या के लिए गुजरात के लोगों के मन में भी वहीं श्रद्धा है जो बंगाल के लोगों के मन में सोमनाथ को लेकर है। श्री शाह अपने पश्चिम बंगाल के दौरे के दौरान कोलकाता में श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन की ओर से आयोजित पहले बंकिम चंद्र चटोपाध्याय मेमोरियल लेक्चर में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि यदि कांग्रेस ने वंदे मातरम् के टुकड़े न किए होते, तो भारत के भी टुकड़े नहीं होते।
उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ बंग-भंग आंदोलन के क्रांतिकारियों का गीत था। कांग्रेस ने गीत के हिस्से को प्रतिबंधित करके इसे धर्म विशेष से जोड़ा। अगर कांग्रेस ने इसके टुकड़े न किए होते तो देश के भी टुकड़े नहीं होते।
उन्होंने कहा कि भारत किसी भू-भाग विशेष से नहीं जुड़ा है, बल्कि यह अलग-अलग संस्कृति से जुड़ा है। भारत के राष्ट्रवाद की परिभाषा इतनी छोटी नहीं हो सकती है। वंदे मातरम को किसी भी रूप में धर्म विशेष से नहीं जोड़ा जा सकता है। लेकिन कांग्रेस ने ऐसा किया है, उसने गीत के हिस्से को प्रतिबंधित करके इसे धर्म विशेष से जोड़ा।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि मुसलमानों को बंकिमचंद्र और उनके विचारों से कभी एतराज नहीं था। बंगाल विभाजन के समय हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सबके लबों पर वंदे मातरम् के नारे थे। लेकिन आपसी गुटबाजी में फंसी कांग्रेस ने सबसे पहले आवाम के बीच ये प्रचारित करवाया कि वंदे मातरम् यानि मातृभूमि की वंदना किसी खास धर्म के लिए नहीं है।
श्री शाह ने कहा कि इतिहासकार कभी खिलाफत आंदोलन को, तो कभी अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति को और कभी-कभी मुस्लिम लीग के द्विराष्ट्र के सिद्धांत को जिम्मेदार ठहराते हैं, लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि कांग्रेस के तुष्टीकरण की नीति के आगे झुकते हुए वंदे मातरम के केवल दो स्टैंजा लेने का निर्णय भारत के विभाजन का कारण बना।






