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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    प्राकृतिक आपदाओं से लें सबक

    By July 17, 2018 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    पंकज चतुर्वेदी

    अब तो बरसात वाले बादल पूरे देश में जम कर बरस रहे हैं। लगभग आधा देश बाढ़ की चपेट में हैं, लेकिन देश के विकास का पैमाना कहे जाने वाले बड़े शहर राजधानी दिल्ली हो, जयपुर या फिर भोपाल या बेंगलुरु या फिर हैदराबाद कुदरत की इस मेहरबानी के कारण बेहाल हैं। भले ही वहां पूरे साल एक-एक बूंद पानी के लिए मारामार होती हो, लेकिन जब पानी खुल कर बरसता है तो वहां की अव्यवस्थाएं उन्हें पानी-पानी कर देती हैं। शहरीकरण आधुनिकता की हकीकत है और पलायन इसका मूल, लेकिन नियोजित शहरीकरण ही विकास का पैमाना है। गौर करें कि चमकते-दमकते दिल्ली शहर की डेढ़ करोड़ हो रही आबादी में से कोई चालीस फीसद झोपड़-झुग्गियों में रहती है, यहां की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पूरी तरह जर्जर है। मुंबई या कोलकाता के हालात भी इससे कहीं बेहतर नहीं हैं।

    आर्थिक उदारीकरण के दौर में जिस तरह खेती-किसानी से लोगों को मोह भंग हुआ और जमीन को बेच कर शहरों में मजदूरी करने का प्रचलन बढ़ा है, उससे गांवों का कस्बा बनना, कस्बों का शहर और शहर का महानगर बनने की प्रक्रिया तेज हुई है। विडंबना है कि हर स्तर पर शहरीकरण की एक ही गति-मति रही, पहले आबादी बढ़ी, फिर खेत में अनाधिकृत कॉलोनी काट कर या किसी सार्वजनिक पार्क या पहाड़ पर कब्जा कर अधकच्चे, उजड़े से मकान खड़े हुए। कई दशकों तक न तो नालियां बनीं, न सड़क और धीरे-धीरे इलाका ‘अरबन-स्लम’ में बदल गया। लोग रहें कहीं भी, लेकिन उनके रोजगार, यातायात, शिक्षा व स्वास्थ्य का दबाव तो उसी ‘चार दशक पुराने’ नियोजित शहर पर पड़ा, जिस पर अनुमान से दस गुना ज्यादा बोझ हो गया है।

    परिणाम सामने हैं कि दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकता जैसे महानगर ही नहीं देश के आधे से ज्यादा शहरी क्षेत्र अब बाढ़ की चपेट में हैं। चूंकि शहरों में अब गलियों में भी सीमेंट पोत कर आरसीसी सड़कें बनाने का चलन बढ़ गया है और औसतन बीस फीसद जगह ही कच्ची बची है, सो पानी सोखने की प्रक्रिया नदी-तट के करीब की जमीन में तेजी से होती है। जाहिर है कि ऐसी बस्तियों की उम्र ज्यादा नहीं है और लगातार कमजोर हो रही जमीन पर खड़े कंक्रीट के जंगल किसी छोटे से भूकंप से भी ढह सकते हैं। याद करें दिल्ली में यमुना किनारे वाली कई कॉलोनियां के बेसमेंट में अप्रत्याशित पानी आने और ऐसी कुछ इमारतों के गिर जाने की घटनाएं भी हुई हैं।

    यह दुखद है कि हमारे नीति निर्धारक अभी भी अनुभवों से सीख नहीं रहे हैं और आंध्रप्रदेश जैसे राज्य की नई बन रही राजधानी अमरावती कृष्णा नदी के जलग्रहण क्षेत्र में बनाई जा रही है। शहरों में बाढ़ का सबसे बड़ा कारण तो यहां के प्राकृतिक नालों पर अवैध कब्जे, भूमिगत सीवरों की ठीक से सफाई ना होना है। लेकिन इससे बड़ा कारण है हर शहर में हर दिन बढ़ते कूड़े का भंडार व उसके निबटान की माकूल व्यवस्था न होना। अकेले दिल्ली में नौ लाख टन कचरा हर दिन बगैर उठाए या निबटान के सड़कों पर पड़ा रह जाता है। जाहिर है कि बरसात होने पर यही कूड़ा पानी को नाली तक जाने या फिर सीवर के मुंह को बंद करता है। महानगरों में भूमिगत सीवर जल भराव का सबसे बड़ा कारण हैं। पॉलीथीन, घर से निकलने वाले रसायन और नष्ट न होने वाले कचरे की बढ़ती मात्र, कुछ ऐसे कारण हैं, जो गहरे सीवरों के दुश्मन हैं। यदि शहरों में कूड़ा कम करने और उसके निबटारे के सही उपाय नहीं हुए तो नालों या सीवर की सफाई के दावे या फिर आरोप बेमानी ही रहेंगे।

    एक बात और बेंगलुरु या हैदराबाद या दिल्ली में जिन इलाकों में पानी भरता है यदि वहां की कुछ दशक पुरानी जमीनी संरचना का रिकॉर्ड उठा कर देखें तो पाएंगे कि वहां पर कभी कोई तालाब, जोहड़ या प्राकृतिक नाला था। अब पानी के प्राकृतिक बहाव के स्थान पर सड़क या कालोनी रोपी गई है तो पानी भी तो धरती पर अपने हक की जमीन चाहता है? न मिलने पर वह अपने पुराने स्थानों की ओर रुख करता है। मुंबई में मीठी नदी के उथले होने और 50 साल पुरानी सीवर व्यवस्था के जर्जर होने के कारण बाढ़ के हालात बनना सरकारें स्वीकार करती रही हैं। बेंगलुरु में पारंपरिक तालाबों के मूल स्वरूप में अवांछित छेड़छाड़ को बाढ़ का कारक माना जाता है। शहरों में बाढ़ रोकने के लिए सबसे पहला काम तो वहां के पारंपरिक जल स्रोतों में पानी की आवक और निकासी के पुराने रास्तों में बन गए स्थाई निर्माणों को हटाने का करना होगा। यदि किसी पहाड़ी से पानी नीचे बह कर आ रहा है तो उसका संकलन किसी तालाब में ही होगा। विडंबना है कि ऐसे जोहड़-तालाब कंक्रीट की नदियों में खो गए हैं। परिणामत: थोड़ी ही बारिश में पानी कहीं बहने को बहकने लगता है। यदि अभी भी समाज संभल जाए और प्राकृतिक नदी, नालों, पहाड़ों पर अतिक्रमण की प्रवृति से बचे तो कम से कम उनकी बसी-बसाई गृहस्थी जलपवित होने से बच सकती है।

    शहरीकरण व वहां बाढ़ की दिक्कतों पर विचार करते समय एक वैश्विक त्रसदी को ध्यान में रखना जरूरी है-जलवायु परिवर्तन। इस बात के लिए हमें तैयार रहना होगा कि वातावरण में बढ़ रहे कार्बन और ग्रीन हाउस गैस प्रभावों के कारण ऋतुओं का चक्र गड़बड़ा रहा है और इसकी दुखद परिणति है-मौसमों का चरम। गरमी में भयंकर गर्मी तो ठंड के दिनों में कभी बेतहाशा जाड़ा तो कभी गरमी का अहसास। बरसात में कभी सुखा तो कभी अचानक आठ से दस सेमी पानी बरस जाना। संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि धरती का तापमान ऐसे ही बढ़ा तो समुद्र का जल स्तर बढ़ेगा और उसके चलते कई शहरों पर डूब का खतरा होगा।

    अब यह तय है कि आने वाले दिन शहरों के लिए सहज नहीं हैं, यह भी तय है कि आने वाले दिन शहरीकरण के विस्तार के हैं तो फिर किया क्या जाए? आम लोग व सरकार कम से कम कचरा निस्तारण पर काम करें। पॉलीथिन पर तो पूरी तरह पाबंदी लगे। शहरों में अधिक से अधिक खाली जगह यानी कच्ची जमीन हो, ढेर सारे पेड़ हों। शहरों में जिन स्थानों पर पानी भरता है, वहां उसे भूमिगत करने के प्रयास हों। तीसरा प्राकृतिक जलाशयों, नदियों को उनके मूल स्वरूप में रखने तथा उनके जलग्रहण क्षेत्र को किसी भी किस्म के निर्माण से मुक्त रखने के प्रयास हों। पेड़ तो वातावरण की गर्मी को नियंत्रित करने और बरसात के पानी को जमीन पर गिर कर मिट्टी काटने से बचाते ही हैं।

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