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    साझी विरासत ने देश को दिया ‘अमृत’ तो कट्टरपंथ दे रहा ‘ज़हर!’

    ShagunBy ShagunJune 20, 2026 ब्लॉग No Comments6 Mins Read
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    Shared heritage gave the country 'Amrit' (nectar), while extremism is spreading 'poison'!
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    rahul gupta राहुल कुमार गुप्ता

    कला और संस्कृति की भूमि कहे जाने वाले इस देश की रूह हमेशा से ही उस मिट्टी की तरह रही है, जो हर बीज को पनाह देती रही है, बशर्ते वह बीज नफरत का न हो। जब हम इतिहास और समकालीन समाज के पन्नों को पलटते हैं, तो हमें एक ऐसी साझी विरासत दिखाई देती है जिसने सदियों से इस मुल्क को संवारा है। एक तरफ हमारे पास अमीर खुसरो, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, उस्ताद अमजद अली खान, शकील बदायूंनी और नौशाद जैसे नाम हैं, जिन्होंने अपनी कला और साधना से भारतीय संस्कृति को वो ऊंचाई दी जिसकी मिसाल पूरी दुनिया में दी जाती है। जब मोहम्मद रफी

    “राम जी की निकली सवारी”,
    “तूने मुझे बुलाया शेरावालिए”,
    “अंबे तू है जगदंबे काली, और

    “बड़ी देर भई नंदलाला” जैसे ईश्वरीय गीत गाते हैं या साहिर लुधियानवी ‘तोरा मन दर्पण कहलाए’ जैसी अमर पंक्तियां लिखते हैं, तो वहां धर्म की दीवारें पिघलकर पानी हो जाती हैं। जावेद अख्तर का ‘ओ पालनहारे’ लिखना या राही मासूम रज़ा का ‘महाभारत’ जैसी कालजयी कृति की पटकथा और संवाद को जीवंत कर पवित्रता के साथ पिरोना, इस देश की असली पहचान है। महाभारत सीरियल में अर्जुन का किरदार निभाने वाले फिरोज खान ने अर्जुन का किरदार ऐसे निभाया कि सच में यह उस काल के ही अर्जुन हैं। इस किरदार में वो ऐसा खोये की उन्होंने अपना नाम अर्जुन ही रखा लिया। यह वह हिंदुस्तान है जहां कला मानवता और प्रगतिशीलता की भाषा बोलती है, जहां सुर और शब्द मिलकर दिलों को जोड़ने का पुल बनाते हैं।Shared heritage gave the country 'Amrit' (nectar), while extremism is spreading 'poison'!

    Shared heritage gave the country 'Amrit' (nectar), while extremism is spreading 'poison'!
    साझी विरासत ने देश को दिया ‘अमृत’ तो कट्टरपंथ दे रहा ‘ज़हर!’

    लेकिन इस खूबसूरत तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है, जिसे अनदेखा करना ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से सच से मुंह मोड़ने जैसा होगा। गंगा-जमुनी तहजीब का जो ताना-बाना हम देखते हैं, उसे समय-समय पर सिर्फ एकतरफा ही नहीं, बल्कि अंदरूनी और बाहरी दोनों तरह की चरमपंथी ताकतों ने नुकसान पहुंचाया है। यदि हम साल 2014 से पहले के कालखंड का निष्पक्ष विश्लेषण करें, तो भारतीय समाज के भीतर एक गहरा अंतर्विरोध भी पनप रहा था, जिसने सामाजिक समरसता को गंभीर चोट पहुंचाई। इस्लाम के भीतर ही एक ऐसा धड़ा सक्रिय रहा, जिसने धार्मिक ग्रंथों की मनमानी और संकीर्ण व्याख्या करके युवाओं के एक वर्ग को गुमराह करने का प्रयास किया। इस गलत विचारधारा के प्रभाव में आकर जब कुछ युवाओं ने अपराध का रास्ता चुना, तो समाज के एक हिस्से में उन अपराधियों और माफियाओं को ‘मसीहा’ या ‘रहनुमा’ के रूप में देखने की आत्मघाती प्रवृत्ति भी दिखाई दी। किसी भी सभ्य समाज में जब कानून तोड़ने वाले और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वाले तत्वों को नायक का दर्जा मिलने लगे, तो वह समाज के नैतिक पतन की शुरुआत होती है।

    Shared heritage gave the country 'Amrit' (nectar), while extremism is spreading 'poison'!
    साझी विरासत ने देश को दिया ‘अमृत’ तो कट्टरपंथ दे रहा ‘ज़हर!’

    इसके साथ ही, तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य में तुष्टिकरण की नीतियों ने इस कड़वाहट को और हवा दी। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का यह बयान सामने आया कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों, का है, तो उसने बहुसंख्यक समाज के भीतर एक गहरी असुरक्षा और आक्रोश की भावना को जन्म दिया। तब कई बुद्धिजीवियों ने विरोध भी प्रदर्शित किया और कहा कि संसाधनों का बंटवारा धर्म के आधार पर नहीं बल्कि जरूरत और पिछड़ेपन के आधार पर होना चाहिए, लेकिन राजनीतिक लाभ के लिए की गई इन घोषणाओं ने समुदायों के बीच की दूरी को और बढ़ा दिया। सत्ता संरक्षण और प्रशासनिक ढिलाई के चलते ही देश ने कश्मीरी पंडितों का वीभत्स नरसंहार और उनका ऐतिहासिक पलायन देखा, जिसने मानवता के माथे पर एक कभी न मिटने वाला कलंक लगा दिया। संभल और बरेली जैसे दंगों के उदाहरण इस बात के गवाह हैं कि किस तरह तुष्टिकरण की राजनीति के चलते बहुसंख्यक आबादी को प्रताड़ित होना पड़ा और कानून व्यवस्था मूकदर्शक बनी रही। विदेशी फंडिंग के माध्यम से जनसांख्यिकीय असंतुलन पैदा करने और लव जिहाद जैसी सुनियोजित गतिविधियों के आरोप भी इसी दौर में सतह पर आए, जिसने सामाजिक विश्वास की बुनियाद को हिलाकर रख दिया।

    साल 2014 के बाद देश की राजनीतिक और प्रशासनिक दिशा में एक बड़ा बदलाव आया। इस बदलाव के बाद सरकारी नीतियों में वोट बैंक आधारित तुष्टिकरण को समाप्त करने का प्रयास किया गया और सबका साथ, सबका विकास के नारे के तहत प्रशासनिक निष्पक्षता को प्राथमिकता दी गई। सत्ता के इस संरक्षण के हटने से निश्चित रूप से उन तत्वों पर लगाम कसी गई जो धार्मिक आड़ में अपराध और अराजकता फैलाते थे। कानून का इकबाल बुलंद होने से अपराधियों में भय का माहौल बना, जिससे आम नागरिक ने राहत की सांस ली। परंतु, इस प्रशासनिक सुधार के साथ ही समाज के एक दूसरे छोर पर एक नई चुनौती ने जन्म ले लिया। तुष्टिकरण के खात्मे की आड़ में कुछ तत्वों ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों से सीधे एक पूरे समुदाय के खिलाफ जहर उगलना शुरू कर दिया। कला और साहित्य के क्षेत्र में भी इसका असर दिखा, जहां रचनात्मकता की जगह नफरत की चाशनी ने ले ली। आदिपुरुष जैसी फिल्मों में हनुमान जी और रावण के मुंह से छिछले और अमर्यादित संवाद बुलवाना इसी विकृत मानसिकता का परिणाम है, जो धर्म की रक्षा के नाम पर खुद संस्कृति का चीरहरण करती है।

    आज जब भारत अपने भविष्य की ओर देख रहा है, तो हमें यह समझना होगा कि एक स्वस्थ और प्रगतिशील समाज के निर्माण के लिए अतीत की गलतियों को सुधारना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी भविष्य को नफरत से बचाना भी है। यदि 2014 से पहले का दौर तुष्टिकरण और बहुसंख्यक समाज की अनदेखी के घावों से भरा था, तो वर्तमान दौर भी सोशल मीडिया के एल्गोरिदम और नफरती बयानों के जरिए पैदा की जा रही कड़वाहट से अछूता नहीं है। सच्ची प्रगति तब तक संभव नहीं है जब तक समाज का हर नागरिक खुद को सुरक्षित और सम्मानित महसूस न करे। अपराध और उग्रवाद चाहे किसी भी मजहब के नाम पर हो, उसे बिना किसी तुष्टिकरण के कड़ाई से कुचला जाना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि निर्दोषों को किसी नफरती एजेंडे का शिकार न होना पड़े।

    भारतीय वातावरण में फिर से मोहब्बत, प्रगति और चैन की फिज़ा को बहाल करने का एकमात्र रास्ता यह है कि हम अपनी साझी सांस्कृतिक विरासत की ओर लौटें। हमें कबीर की उस खरी बात को अपनाना होगा जो दोनों पक्षों के पाखंड पर प्रहार करती है। हमें रसखान के उस कृष्ण प्रेम को याद करना होगा जो मजहब की हदों को नहीं मानता था। समाधान इस बात में छिपा है कि हम कानून के शासन को बिना किसी भेदभाव के लागू करें, जहां अपराधी सिर्फ अपराधी हो, उसका कोई धर्म न हो। इसके साथ ही, समाज के प्रबुद्ध वर्ग को आगे आकर सोशल मीडिया पर परोसी जा रही नफरत का बहिष्कार करना होगा। जब हम अपनी प्रार्थनाओं में “ईश्वर अनेक होते हुए भी एक ही है” इस वास्तविक सच को दोबारा शामिल करेंगे और राजनीति से परे हटकर इंसानियत को तरजीह देंगे, तभी यह मुल्क अपनी उस साझी तहजीब को बचा पाएगा जिसने इसे दुनिया का सबसे अनोखा और खूबसूरत गुलदस्ता बनाया है।

    Shagun

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