जी क़े चक्रवर्ती
हमारे देश मे अभी हाल ही में खेल की दुनिया से ही जुड़ी एक ऐसी घटना घटित हुई, जिसने पूरे देश को शर्मशार कर दिया। जिसमें हमारे समाज के लोगों ने अपनी उस मानसिकता का परिचय दिया जोकि किसी भी समाज को जन्म एवं जाती-धर्म के आधार पर आज की 21वीं सदी में भी हम मनुष्यों को बांट कर समाज मे पृथक-पृथक कर देने में आमादा है। आखिर भारत जातिवाद के जहर को कब खत्म करेगा। जिसमें लोग हिमा दास की जाति जानना चाहते हैं।
दरअसल हमारे देश के मस्तक गर्व से ऊंचा करने वाला ऐसा सुअवसर का दिन था जिस दिन विश्व ओलंपिक खेल में भारत के महिला एथेलिक्स में पहली बार विश्व स्तर पर भारत को एक मात्र स्वर्ण पदक दिलाने वाली एथलीट हिमा दास की उपलब्धि के नाम रहा। हिमा के इस उपलब्धि पर एवं उसके जीत के पश्चात भारतीय तिरंगे को लेकर उनके जुनून को भारत के प्रधान मंत्री मोदी तक को भावुक कर दिया था। लेकिन हमारे देश की यह बडी विडंवना है कि इस जातिवाद एवं धर्मांध देश मे हमारे आपके मध्य बहुत सारे ऐसे लोग हैं जिन्होंने उनके विजय एवं देश के लिए पदक जितने वाले इस महिला को जाति-धर्म के दृष्टिकोण से इंटरनेट पर हिमा दास की जाति सर्च करने में लगे हुये थे।

ऐसे किसी भी खिलाड़ी के देश को स्वर्ण पदक दिलाने के बाद उसका नाम किसी पहचान का मोहताज नही है। जिसने हिमा दास ने 51.46 सेकेंड में आईएएएफ़ विश्व अंडर-20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप की 400 मीटर दौड़ पूरी करके, स्वर्ण पदक जीतकर हम सभी भारत वासियों का मास्तक गर्व से विश्व पटल पर ऊंचा तो किया ही है साथ ही साथ हिमा दास के इस उपलब्धि प्राप्त कर जीतने के बाद भारतीय तिरंगे को लेकर उनके दिलो दिमाग में अपने देश के लिए जुनून तक कि भावना रखने के लिए देश के प्रधान मंत्री मोदी तक उनकी इस भावना से भावुक कर दिया लेकिन वहीं पर हमारे ही कुछ देश के लोगों के मन में एक यह प्रश्न घर कर गया कि आखिरकार हिमा दास किस जाति-धर्म की हैं?
यह बात अलग अवश्य है कि हमारे देश भारत में ऐसी घटना प्रथम बार घटित नही हुई चाहे वह खेल खिलाड़ी हो या मंदिर मस्जिद से लेकर विवाह तक के मामलों में जाति -धर्म एवं सम्प्रदायों का मामले आज देश के 21वीं सदी से गुजरने के बावजूद अकसर ऐसा देखने मे आता रहता है ठीक इसी तरह के मनोभावनाओं के शिकार व्यक्तियों के करतूतें वर्ष 2016 ओलंपिक के दौरान भी देखने मे आया था, जब पीवी सिंधु विदेशी मैदान पर बैडमिंटन का खेल रहीं थीं, उस वक्त भी हमारे देश के लोग पीवी सिंधु की जाति जानने के लिए बहुत उत्सुक थे।
हिमा दास का जन्म भारतीय राज्य असम में नगाँव में 9 जनवरी 2000 में हुआ था। उसके माता-पिता रंजीत और जोनाली दास हैं, ये चार भाई-बहनों से छोटी है। दास ने अपने विद्यालय के दिनों में लड़कों के साथ फुटबॉल खेलकर क्रिडाओंं मेंं अपनी रुचि की शुरुआत की थी। यह अपना कैरियर फुटबॉल में देख रही थी और भारत के लिए खेलने की उम्मीद कर रही थी।
लोग बताते है कि हिमा जब अपने पिता के साथ खेतों में काम करने जाती थी तब वह वहां समय निकाल कर खेतों में नंगे पैर ही कई किलोमीटर दौड़ लगा देती थी उस समय उनके पास तो चप्पल भी नहीं थी। लेकिन उनके पास अगर कुछ था तो सिर्फ देश के लिए दौड़ने का ज़ज्बा।
हिमा के ओलंपिक में स्वर्ण पदक विजेता बनने के बाद से गूगल पर ऐसे लोगों की संख्या में अत्याधिक वृद्धि देखने मे मिली जो लोग केवल हिमा दास की जाति जानने के लिए इंटरनेट पर जुटे हुए हैं। ऐसी स्थिति में यह घृणित कार्य आज हमारे समाज के लिए बहुत ही शर्मनाक एवं दुखदायी है। भारत जैसे देश में जहां लोग अब निरंतर विज्ञानं की ओर बढ़ रहे हैं वहीँ कुछ लोग हमारे समाज के कुछ वर्ग को एक जाति- धर्म के नाम पर बाँट कर सम्पूर्ण मानव जाति को शर्मसार भी कर रहे है, जो एक घृणित कृत्त्य है।







