आनंद अभिषेक
जब मौसम का पारा 45-46 डिग्री सेल्सियस के इर्द-गिर्द घूम रहा हो, उस पर अगर बिजली की अघोषित कटौती हो जाए तो कंक्रीट के मकानों में रहना दूभर हो जाता है। ऐसे में हमारे घर दिन में आग की भट्टी की तरह तपते हों और रात गर्मी के भभके छोड़ रही हो तो ऐसी तमतमाती स्थिति में क्या कभी आपने ऐसे मकान की परिकल्पना की हो जिसमें गर्मियों में न पंखे की जरूरत पड़े और न ही कूलर व एसी की। ऐसे ठंडे मकानों में जब बाहर का तापमान 45-46 पर होता है, तब घर के अंदर का तापमान 30-35 डिग्री सेल्सियस के आसपास होता है। ऐसे मकान ठंडक पहुंचाने के साथ-साथ आपको स्वस्थ रखेंगे और आत्मिक शांति का भी अनुभव प्रदान करेंगे।
आइए हम आपको ऐेसे व्यक्ति से मिलवाते हैं जो ऐसे ही ठंडे घर में रहते हैं। यह हैं देश के प्रख्यात वास्तुविद् गोरखपुर के मदन मोहन मालवीय यूनिवर्सिटी आॅफ टेक्नोलाॅजी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के निवर्तमान प्रमुख प्रो. सीपी हिंगोरानी। गोरखपुर के बेतिया हाता में स्थित उनका मकान है जिसमें भवन निर्माण की ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है, जिनसे इनका मकान गर्मियांे में स्वतः ठंडा रहता है और सर्दियों में स्वतः गरम। हिंगोरानी साहब अपने सोने के कमरे में बिना पंखें के बड़े आराम से सोते हैं। वे बताते हैं कि भवन निर्माण की यह तकनीकें मुख्यतः दीवालों की जुड़ाई, छतों के एंगिल तथा छतों के अंदर कनवेंशन करेंट को पैदा करने की है। इसके अलावा पैरापिट वाॅल के निर्माण की तकनीक में थोड़े परिवर्तन करने से सूर्य और हवा को मकान में ज्यादा से ज्यादा स्थान देने की है। यही सब इन तकनीकों का बुनियादी आधार है।

हिंगोरानी बताते हैं कि ऐसे मकान बनाने के लिए आवश्यक है कि प्रकृति के पांच तत्व जिनसे मानव शरीर बना है तथा हर क्षण कार्यरत प्रकृति की दी हुई तीन अन्य शक्तियों का उचित समावेश मकानों के निर्माण में किया जाए तो ऐसे मकान गर्मियों में ठंडे, सर्दियों में गर्म होने के साथ-साथ इनमें रहने वाले लोग निरोग एवं प्रसन्नचित्त रहते हैं। अगर प्राकृतिक शक्तियों जैसे चुम्बकीय शक्ति, गुरुत्वाकर्षण शक्ति एवं तीसरी महत्वपूर्ण शक्ति काॅसमिक फील्ड जो सूर्य निकलने के पहले केवल डेढ़-दो घंटे तक ही पृथ्वी को मिलती है, का उचित इस्तेमाल अगर हम अपने मकानों में नहीं करते हैं तो उसका नकारात्मक असर हमारे शरीर पर पड़ेगा, और यदि उसका सही इस्तेमाल मकानों में करते हैं तो उसका सकारात्मक असर शरीर पर पड़ेगा जो तन और मन दोनों को लाभ पहुंचायेगा। ऐसे ही मकानों को इको फ्रेंडली होम(पर्यावरण अनुकूल आवास) कहते हैं और आजकल यह ग्रीन बिल्डिंग्स अवधारणा से जुड़ गया है।
प्राचीन काल में प्रकृति की शक्तियों का इस्तेमाल
हम अगर पीछे मुड़कर देखें तो हजारों साल पहले ही लोगों ने प्रकृति की इन शक्तियों को पहचान लिया था। तभी तो मिस्त्र (मिश्र) के लोग पृथ्वी की भूमध्यरेखीय एवं चुंबकीय शक्तियों का प्रभाव भलीभांति जानते समझते थे। वे अग्नि के उपासक भी रहे। अतः ये लोग अग्नि के मध्य उत्पन्न होने वाली ऊर्जा से परिचित थे और उन्होंने ‘अग्निमध्य में’ के सिद्धांत से प्रेरित होकर पिरामिड की संरचना की। अनुसंधानों से ज्ञात होता है कि पिरामिड की विद्युत चुंबकीय शक्तियां केंद्रीभूत होकर उसके अंदर रखे पदार्थों का संरक्षण करती हैं।
हमारे देश में प्राचीन काल में ऋषि-मुनि वनों में साधना हेतु जो कुटिया बनाते थे, वह भी पिरामिड के आकार जैसी होती थी। हवन कुंड को यदि उलटा करके रखें तो वह भी पिरामिड की भांति ही होता है। पिरामिडाकार कुटिया में विचित्र शक्तियां खेला करतीं थीं तथा मानसिक व शारीरिक रूप से अशक्त व्यक्ति भी ऋषि-मुनियों के पास जाकर कुटिया में बैठते ही शारीरिक कष्टों से निजात पाते थे। यह सब भवन निर्माण पद्धतियों के चमत्कार हैं।
मकान का निर्माण करते समय मकान में दक्षिण-पश्चिम भाग में पूर्व-उत्तर के अनुपात में कम व छोटी खिड़की एवं दरवाजे रखे जाएं तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार गर्मियों में इस क्षेत्र के कमरों में ठंडक एवं सर्दियों में गर्मी का अनुभव होता है, क्योंकि मकान के दक्षिण एवं पश्चिम क्षेत्र में खुला स्थान रखने से मकान की दीवाल के मध्य में जो तापयुक्त वायु एक विशेष दबाव खिड़की-दरवाजों से मकान में प्रवेश करती है तो दबाव के अणुओं(मोलीक्यूल्स) के दबाव के कारण कम तापयुक्त होती है जिससे गर्मी में ठंडक तथा सर्दी में गर्मी का अनुभव होता है।
कंक्रीट के जंगल
आज शहर अतिक्रमण के शिकार हो रहे हैं ओर आवास विकास एवं प्राधिकरणों की आवासीय कालोनियों के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। इनमे सबसे बड़ी बुनियादी दिक्कत यह रही है कि जब इन कालोनियों के निर्माण की योजनाएं बनायी गयीं, तब उस समय योजना बनाने वाले विशेषज्ञों ने इनके ऊपर पड़ने वाले खतरों को बेरहमी से नजरअंदाज कर दिया। इन कालोनियों के बीच कोई ग्रीन बेल्ट की परिकल्पना ही नहीं की गयी। फलस्वरूप यह कालोनियां कंक्रीट के पहाड़ के मानिंद गरमी में तपती रहती हैं और सर्दियों में ठिठुरती रहती हैं।
हमारे यहाँ एक तरफ जहाँ हरियाली और बरसात तेजी से घट रहे हैं, वहीं हवा भी लगातार जहरीली होती जा रही है। बीते दिनों कुछ शहरों में वायु और जल प्रदूषण के जो भयावह आंकड़े हमारे सामने आए हैं, उनसे साफ है कि अब सिर्फ बातों से हालात सुधरने वाले नहीं है। अब हमें नए सिरे से इस पर एक्शन की जरूरत है। हमारे यहाँ कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन बड़ी तादात में हो रहा है। हमने शहरों में सीमेंट-कांक्रीट के बड़े-बड़े जंगल तो खड़े कर लिये पर हम अपने जीवन के लिये सबसे जरूरी पर्यावरण को लगातार नुकसान पहुंचाते रहे। हम पेड़ों को लगातार काटते रहे पर कभी एक पौधे को पेड़ बनाने के बारे में नहीं सोचा। हमने अपनी नदियां गंदी तो कर दी पर कभी इसे साफ-सुथरा बनाने की नहीं सोचा।
हमने बरसात का पानी व्यर्थ ही बह जाने दिया पर कभी उसे सहेजने की दिशा में कोई पहल नहीं की। हमें नलों से पानी क्या मिलने लगा हमने अपने प्राकृतिक कुएं-कुण्डियंा ही बिसरा दी, उन्हें कूड़ेदान में तब्दील कर दिया। इतना ही नहीं हमने अपने सांस लेने के लिये सबसे जरूरी हवा को भी कभी साफ बनाए रखने पर सोचा नहीं और न कोई कदम उठाया। यही वजह है कि शहर अब लोगों के रहने लायक नहीं बचे। उनमें न पर्याप्त पानी है और न ही साफ-सुथरी ताजी हवा। गर्मियों के दिनों में तो शहरों के कई मकान भट्टी की तरह तपते हैं। ऐसी स्थिति में जरूरी है कि हम इस नई पहल का स्वागत करें और इसे मकान तक ही सीमित नहीं रहने दें बल्कि इससे एक कदम आगे बढ़कर हमारे आस-पास भी ऐसे जतन करें ताकि हमारे पर्यावरण को साफ-सुथरा और रहने लायक बनाया रखा जा सके।
विकास की अलग तरह की अवधारणा और प्राथमिकताओं ने बीते कुछ सालों में ही हमारे सामने कई बड़े पर्यावरणीय संकट खड़े कर दिए हैं। ये संकट अब हमारे जीवन और सेहत के लिये ही भारी पड़ने लगे हैं। इसी तथाकथित विकास में लगातार निर्माण प्रक्रिया से प्रकृति और पर्यावरण को हो रहे नुकसान को कम करने की दिशा में सबसे कारगर साबित हो रही है ग्रीन बिल्डिंग या हरित भवन की अवधारणा।
ग्रीन बिल्डिंग अवधारणा
ग्रीन बिल्डिंग उस बिल्डिंग को कहा जाता है जिसके निर्माण से लेकर रखरखाव में पर्यावरण का महत्वपूर्ण रोल होता है। इस तरह की बिल्डिंग में प्राकृतिक संपदा का उपयोग ज्यादा किया जाता है। ग्रीन बिल्डिंग में बिजली, पानी और अन्य संसाधनों की खपत एक आम बिल्डिंग से कम होती है। बिजली और पानी के खपत कम करने के लिए फ्लाई ऐश से बनी ईंटों का इस्तेमाल, हाई एनर्जी कंजर्वेशन लैम्प, वाटर रिसाइकलिंग और रेनवाटर हार्वेसटिंग जैसे फीचर का इस्तेमाल किया जाता है।
ग्रीन कंसेप्ट के मकानों में पर्यावरण को बिना नुकसान पहुँचाए अधिक से अधिक प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल किया जाता है। जैसे सूरज का उजाला मकान के अधिकांश हिस्से को रोशन कर सके ताकि बिजली की खपत कम हो सके। रात में जहां जरूरी हो वहां भी कितने वाट का बल्ब या ट्यूबलाइट जरूरी है तथा जहाँ जरूरी नहीं हो वहां खपत कम हो, इसके लिये भी ध्यान रखा जाता है। इसी तरह खिड़कियां आदि ऐसी बनाई जाती हैं कि लगातार हवा मिलती रहे। ऐसे मकानों में प्राकृतिक हवा के प्रवेश और निकासी के लिये जतन किए जाते हैं, इससे पंखें, कूलर और एसी चलाए बिना भी आसानी से प्राकृतिक हवा हर जगह मिलती रहे। गर्मियों के दिनों में बिना किसी संसाधन के मकान को ठंडा रखे जाने की तकनीक भी इसमें होती है। फ्लाई एश की टाइल्स अपेक्षाकृत ठंडी होती है और गर्मियों के दिनों में जब गर्म हवा और धूप की वजह से मकान की बाहरी दीवारें काफी गर्म हो जाती है तो ऐसे में भी फ्लाई एश अंदर के सामानों को ठंडा बनाए रखती है। इसके अलावा भूजल स्तर को बढ़ाने के लिये इसमें प्राकृतिक रीचार्ज की तकनीकों तथा सीवरेज की अत्याधुनिक तकनीकों का भी उपयोग किया जाता है। इनके निर्माण में भूकम्परोधी तकनीकों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। इन सब वजहों से यह खासा लोकप्रिय हो रहा है।
इनमें पानी की बचत पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया गया है। इनमें वाटर रिचार्जिंग के साथ पानी के पुर्नउपयोग पर भी जोर दिया गया है। सीवरेज ट्रीटमेंट कर दैनिक उपयोग के लिये मकान में इस्तेमाल किए जा रहे पानी को साफ बनाकर इसे रिसायकिल किया जा जाता है। इसमें पेड़ पौधों के लिये भी काफी बड़ी जगह रखी जाती है, इसके साथ ही बालकनी, खिड़की, गैलरी, छत और ओपन टेरेस में भी गमलों के जरिए छोटे-छोटे पौधों को लगाया जाने का प्रावधान किया गया है। इस तरह के प्रोजेक्ट में बिजली की बचत के लिये सौर उर्जा का उपयोग करने के लिये सोलर प्लेट भी लगाई जा रही हैं।
भारत में ऐसे हुई शुरुआत
भारत में ग्रीन बिल्डिंग्स की शुरुआत 2003 में हैदराबाद के सीआईआई -सोहराबजी गोदरेज ग्रीन बिजनेस सेंटर के निर्माण के साथ हुई थी। इसके बाद देश में ग्रीन बिल्डिंग्स बनाने की बाकायदा एक मुहिम ही शुरू हो गई। इसी का नतीजा है कि आज देश में करीब एक अरब 11 करोड़ वर्ग फुट का ग्रीन बिल्डिंग एरिया मौजूद है अथवा इस पर काम चल रहा है। भारत के मुकाबले अमेरिका के पास इसके लिए तीन अरब वर्ग फीट से ज्यादा का एरिया मौजूद है। ग्रीन बिल्डिंग्स के लिए गाइडलाइंस बनाने में द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (टेरी) और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने अहम भूमिका निभाई है।
ग्रीन बिल्डिंग कंसेप्ट भारत जैसे देशों के लिये नया हो सकता है लेकिन विदेशों में इसका चलन करीब 20 साल पहले ही शुरू हो चुका है। अच्छी बात यह है कि हमारे देश में भी अब इसकी तरफ लोगों और खासकर बिल्डर्स का ध्यान गया है। फिलहाल दुनिया में भारत पीछे है। इसमें अमेरिका पहले और चीन दूसरे स्थान पर है। देश के अलग-अलग शहरों में करीब तीन हजार से ज्यादा ग्रीन बिल्डिंग के प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है। बीते पांच सालों में ही बेंगलुरु, हैदराबाद, पंचकूला तथा चंडीगढ़ के साथ इंदौर और भोपाल जैसे शहरों में भी इसे लेकर लोगों की उत्सुकता बढ़ी है। इसके लिये बकायदा इंडियन ग्रीन बिल्डिंग कौंसिल अलग-अलग शहरों में जाकर बिल्डर्स और लोगों तक इसके फायदे गिना रहे हैं।
पंचकूला के आईटी पार्क में बीते साल ऐसी ही एक ग्रीन बिल्डिंग बनकर तैयार हो चुकी है। इसमें डबल ग्लास पैनल, फ्लाई ऐश स्लेब तथा सोलर पेनल के साथ सभी बारीकियों का ध्यान रखा गया है। इसमें कई आईटी कम्पनियों के दफ्तर हैं। यहाँ काम करने वाले अधिकांश युवा कर्मी हैं, इन्हें इसमें काम करना बेहद रास आ रहा है। वे बताते हैं कि इस बिल्डिंग में काम करने का अपना अलग सुकून है। वे यहाँ बेहतर और उर्जा से ओत प्रोत महसूस करते हैं। यह ऊर्जा संरक्षण का भी नायाब नमूना है। वहीं यहाँ करीब दर्जन भर से ज्यादा प्रोजेक्ट पर भी काम चल रहा है।
ग्रीन बिल्डिंग के लिए मानदंड
ग्रीन बिल्डिंग का दर्जा देने के लिए कई तरह के मापदंड का मू्ल्यांकन करना होता है-
1. बिल्डिंग की साइट प्लानिंग क्या है और इसका डिजाइन कैसा किया गया है।
2. बिल्डिंग के निर्माण के समय ऊपरी परत पर मिट्टी का संरक्षण किया गया है या नहीं।
3. हीटिंग, एयर कंडीशनिंग, वेंटिलेशन, प्रकाश की व्यवस्था, बिजली और पानी की समुचित व्यवस्था है या नहीं।
4. बिल्डिंग के डिजाइन का सही उपयोग कर के पारंपरिक ऊर्जा की मांग को कम किया गया है कि नहीं।
5. अक्षय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करके ऊर्जा की जरूरतों को पूरा कर रहा है कि नहीं।
6. जल और अपशिष्ट का प्रयोग का प्रबंधन सही ढंग से करके फिर से उपयोग में लाने के लिए वाटर रिसाइकलिंग और रेनवाटर हार्वेसटिंग की व्यवस्था है या नहीं।
7. इमारत के निर्माण के समय नेचुलर सामाग्री का उपयोग किया गया है कि नहीं
8. नवीकरण ऊर्जा आधारित वॉटर हीटिंग सिस्टम या सोलर हीटिंग सिस्टम लगा है या नहीं।
घर खरीदने से पहले कैसे पता करें ग्रीन बिल्डिंग है या नहीं
ग्रीन बिल्डिंग के नाम पर घर खरीदने से पहले यह जांच ले की उस बिल्डिंग को ग्रीन बिल्डिंग जांच करने वाली संस्था से क्या रेटिंग मिली है। देश में दो संस्थान ग्रीन बिल्डिंग की रेटिंग देती है। पहली है इंडियन ग्रीन बिल्डिंग काउंसिल (आईजीबीसी या एलईईडी) और दूसरा ग्रीन रेटिंग फार इंटीग्रेटेड हैबिटेट एसेसमेंट (गृहा)। ये एजेंसियां बिल्डिंग का डिजाइन, निर्माण साम्रागी, ऊर्जा दक्षता, वेंटिलेशन, प्रकाश व्यवस्था, पानी और कचरा प्रबंधन जैसे मानकों का गहन अध्ययन करती हैं। इसके बाद प्रोजेक्ट को ग्रीन बिल्डिंग की रेटिंग देती हं। अगर, बिल्डर कहता है कि प्रोजेक्ट ग्रीन बिल्डिंग कांसेप्ट पर बनाया गया है तो रेटिंग सर्टिफिकेट मांगे। देंखे की प्रोजेक्ट को क्या रेटिंग मिली है। अगर, नहीं मिली है तो ग्रीन बिल्डिंग के नाम पर अधिक कीमत दे कर घर नहीं खरीदें।
गर्मी में ठंडे और सर्दियों में गर्म मकानों की तकनीक
आधुनिक घरों का निर्माण कराने वाले लोगों के घर अक्सर फैशनेबल और मूर्खतापूर्ण होते हैं। यह घर महंगे तो होते ही हैं, साथ ही इनमें सर्दी-गर्मी एवं पर्यावरण संरक्षा का ख्याल नहीं रखा जाता है। इन घरों की बनावट डिब्बेनुमा ’घनाकार‘ होती है। इनमें बहुत अधिक सीमेंट, सरिया, प्लास्टर और पेंट का इस्तेमाल होता है। इन घरों की छतें ऐसी नहीं होती हैं कि वह दीवारों की धूप और बारिश से हिफाजत कर सकें। इस वजल से इसमें रहना आरामदेह और सुविधाजनक नहीं होता है।
ऐसे ही आधुनिक नागरिकों की ‘सोच’ और ’समझ‘ की मानसिकता को ध्यान में रखते हुए पद्मश्री विभूषित वास्तुविद् लौरी बेकर ने अपनी पुस्तक ‘हाउसेज हाउ टू रिड्यूज बिल्डिंग काॅस्ट’ में जिक्र किया है कि अक्सर लोगा ’आधुनिक‘ अथवा ‘पुराने फैशन’ के मकानों की चर्चा करते हैं। पुराने फैशन के घर की वकालत करते हुए वे पुस्तक में जिक्र करते हैं कि पुराने फैशन के घर की छत ढलुवां होती है जो धूप की गर्मी को सोखने से बचाती है। ढलुवां छतें कम गर्मी सोखती हैं। बेकर के मुताबिक, यदि घरों के दक्षिण और पश्चिम दिशा में कुछ फलदार व छायाकार पेड़ लगा दिये जाएं तो घर ठंडे और ज्यादा आरामदेह हो जाएंगे। उन्होने दीवालों की चुनाई के लिए एक नयी तकनीक ईजाद की जिसे ’रैट ट्रैप बांड (चूहेदानी बंध)‘ कहते हैं। इस तकनीक के उपयोग से मकान के कमरे गर्मियों में ठंडे तथा सर्दियों में गरम रहते हैं।
इस तकनीक में ईंटों को प्रचलित परंपरा के अनुसार पट लगाये जाने के स्थान पर खड़ी करके लगाया जाता है। इस प्रकार तीन इंच की बाहरी और तीन इंच की भीतरी ईंट के बीच तीन इंच का स्थान रिक्त रह जाता है जिससे दीवाल खोखली रहती है और उसमें हवा भर जाती है, जो कुचालक का काम करती है। यह तकनीक बाहर की गर्मी को अंदर जाने से रोकने में अहम भूमिका निभाती है क्योंकि ईंटों के बीच उपस्थित हवा कुचालक का काम करती है। यह तकनीक उष्ण क्षेत्रों के लिए जहां गर्मियों में तापमान 46 डिग्री सेल्सियस चला जाता है, बेहद कारगर साबित हुई है।
इसी तरह ढालू छतों के लिए एमसीआर टाइल व अन्य टाइलों, टीन, एस्बेस्टस व जीईपी चादरों की अपेक्षा गर्मियों में ज्यादा ठंडी रहती है। यह देखने में सुंदर, टिकाऊ एवं सस्ती भी होती है। ऐसा देखा गया है कि मकानों में 60-70 फीसदी तक सूर्य की किरणों की गर्मी छत के माध्यम से घर के भीतर प्रवेश करती है। गर्मी के इस प्रवेश को रोकने के लिए यूं तो बहुत उपाय किए जाते हैं- जैसे छतों की मोटाई बढ़ाना, छत पर उष्मारोधी पदार्थ डालना, मिट्टी की टाइलों, चूने की कंक्रीट, थर्मोकोल आदि की तहें बिछाना अथवा दोहरी छतें बनाना आदि है। लेकिन इस सबसे ज्यादा कारगर छत – तल वाष्प शीतलन विधि जिसे केंद्रीय भवन अनुसंधान रुड़की ने तैयार किया है।
यह विधि सूर्य की सीधी उष्मा का भवनों में प्रवेश को रोकती है और छत, दीवाल तथा फर्शों के साथ-साथ कमरों में उपस्थिति गर्म हवा को भी ठंडा करती है। इस प्रकार केवल छत के पंखों के द्वारा ही घर के अंदर शीतल सुखद वातावरण प्राप्त होता है। इस विधि में छत के ऊपरी तल को पानी से हल्के गीले बिछावन (सुतली के बोरे अथवा छह मिमी मोटी नारियल की रस्सी का बिछावन) से ढक दिया जाता है। सूर्य की किरणों से आने वाली गर्मी बिछावन में उपलब्ध पानी को सुखाने में लग जाती है तथा अंदर प्रवेश नहीं कर पाती। रात में वाष्पीकरण के लिए पानी आवश्यक उष्मा छत से ले लेता है और इस प्रकार भाप बनकर उड़ता पानी एक मिट्टी के घड़े की तरह कमरों को धीरे-धीरे अंदर तक ठंडा कर देता है।
छत तल का तापमान गर्मियों में 70 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। इस विधि द्वारा गीले बिछावन से संपर्क में रहने के कारण छत का तापमान घड़े के तापमान (जो प्रायः 25 डिग्री सेल्सियस के आसपास होता है) तक गिर जाता है। यह तापमान कमरे के अंदर के तापमान से कम होता है, क्योंकि उष्मा अधिक तापमान से कम तापमान की ओर बढ़ती है। अतः कमरे के अंदर के अन्य भागों की उष्मा छत के ऊपरी तल की ओर प्रवाहित होने लगती है। कमरे के अंदर से उष्मा लगातार बाहर निकलती रहती है और कमरे इतने ठंडे हो जाते हैं कि मनुष्य अपने शरीर की अतिरिक्त उष्मा ठंडी छत की ओर फेंकने लगता है। इस विधि में पानी की भाप कमरों में नहीं प्रवेश करती (जैसा कि रूम कूलर में होता है) इसलिए बरसात के मौसम में भी इस विधि का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।
गर्मियों में नीचे की खिड़कियों को बंद कर और ऊपर की खिड़कियों को खुली रखनी चाहिए। इससे गरम हवा कमरे से बाहर हो जाएगी क्योंकि वह हल्की होने के कारण ऊपर उठती है। रात की हवा ठंडी रहती है, इसलिए रात के समय खिड़कियों को खुली रखें। सुबह होते ही खिड़कियों को बंद कर दें ताकि रात की शीतल हवा घर के भीतर ही रहे और गरम हवा अंदर न आ सके।
ग्रीन बिल्डिंग के फायदे
पारंपरिक भवनों की तुलना में, पर्यावरण अनुकूल आवासों में कम पानी की खपत है, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, कम अपशिष्ट पैदा करते हैं और स्वस्थ और आराम से रहने के लिए रिक्त स्थान बना सकते है। ग्रीन इमारत डिजाइन डिजाइन के निर्माण के लिए एक व्यावहारिक और जलवायु के प्रति सजग दृष्टिकोण है। जलवायु परिस्थितियों, सन्निहित ऊर्जा सामग्री और निर्माण के उपयोग के प्रकार के लिए प्रासंगिक डिजाइन मानकों स्थानीय रूप से उपलब्ध है और कम से उपयोग प्रचलित भौगोलिक स्थिति जैसे विभिन्न कारकों, सामान्य रूप से ध्यान में रखा जाता है। निर्माण और भवन का उपयोग करते समय इस तरह के एक दृष्टिकोण, पर्यावरण के लिए कम से कम नुकसान सुनिश्चित करता है। ग्रीन बिल्डिंग एक साधारण घर के मुकाबले 30 से 40 फीसदी बिजली की बचत करता है। वहीं, 30 से 70फीसदी तक पानी की बचत करता है। ग्रीन बिल्डिंग में रहना स्वास्थ के लिए अनुकूल होता है क्योंकि इस तरह के बिल्डिंग में प्राकृतिक प्रकाश और स्वच्छ हवा मिलता है। वतावरण में प्रदूषण के लेवल कम करने में भी मदद मिलती है।
सफेद छत ही क्यों:
नेशनल सेंटर आॅफ एटमास्फिटिक रिसर्च(एनसीएआर) और नेशनल एरोनाॅटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) के वैज्ञानिकों ने अपने शोध में स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है कि अगर दुनिया की सभी छतों को सफेद कर दिया जाए तो 44 गीगा टन कार्बन डाई आक्साइड को कम किया जा सकता है।
क्या होता है हीट आईलैंड का प्रभावः जानकारों के अनुसार दिन के समय में छतों द्वारा सोलर विकिरणों को अवशोषित कर लिया जाता है। इससे गहरे रंग को अवशोषित कर लिया जाता है, जिससे गहरे रंग की छतें काफी गर्म हो जाती हैं। सामान्य परिस्थितियों में यह तापमान 70 से 80 डिग्री सेल्सियस तक हो जाता है। गर्म होती छतों से लगातार उत्सर्जित सोलर विकिरण अधिक समय तक वातावरण में बने रहते हैं, जिससे शहरी क्षेत्र हीट आईलैंड (उष्मा द्वीप) में तब्दील हो रहे हैं। सीमेंट-कंक्रीट के निर्माण से शहरों में पानी की खपत भी बढ़ जाती है, साथ ही शहरों या शहरों के आसपास स्थित जलाशय भी शीघ्र सूखने लगते हैं। सीमेंट-कंक्रीट की छतें गर्मी के दिनों में आग उगलने लगती हैं और इनसे बने घर भट्ठी की तरह तपने लगते हैं। गर्मी के दिनों में इनमें देर रात को भी रहना मुश्किल हो जाता है। अधिकाधिक उत्सर्जन से पर्यावरणीय संतुलन गड़बड़ा रहा है। यदि समय रहते नहीं संभले तो यह स्थिति भविष्य में विस्फोटक हो सकती है।
सफेद रंग का असरः छतों को गर्म होने से बचाने के लिए सोलर रेडिएशन से बचाव जरूरी है। वैज्ञानिकों के अनुसार डार्क रंग रेडिएशन के अधिक भाग को अवशोषित कर लेते हैं। सीमेंट से बनी छतों का रंग भी गहरा होता है। यदि छतों को सफेद रंग का कर दिया जाए तो सोलर विकिरण परावर्तित होकर वापस स्पेस में चले जाते हैं। इससे वायुमंडल के तापमान पर भी कोई फर्क नहीं पड़ता। सफेद रंग की छतों से भवनों का तापमान कम होने से ठंडा करने के उपायों में बिजली कम खर्च होती है जिससे वातावरण में कार्बन गैसों के उत्सर्जन में निःसंदेह कमी आएगी। उत्सर्जित ऊष्मा से शहर के बढ़ रहे तापमान में असंतुलन कम हो सकता है। हालांकि भारत में इस तकनीक को बहुत कम आजमाया जा रहा है। इस तकनीक से न केवल शहरों में बने सीमेंट-कंक्रीट के घरों का तापमान कम किया जा सकता है, बल्कि ग्लोबल वाॅर्मिंग पर भी कुछ हद तक काबू पाया जा सकता है।
आसान और सस्ता उपायः नासा के वैज्ञानिकों का कहना है कि छतों पर सफेद पेंट या चूनायुक्त सफेद सीमेंट का लेप लगाकर इसके प्रभाव में 70 से 80 फीसदी तक की कमी लायी जा सकती है। सफेद रंग रिफ्लेटर का काम करता है। जानकारों के मुताबिक दो हजार वर्ग फीट की छत को सफेद रंग से पोतने के लिए लगभग 40 किग्रा चूना या 10 किग्रा सफेद सीमेंट ही काफी है। यह अपेक्षाकृत काफी सस्ता और आसान तरीका है जिसे आम लोग उपयोग में ला सकते हैं।







