हिन्दी क्षेत्रों में बाजार, स्कूल, मनोरंजन, कोर्ट-कचहरी, अस्पताल, सरकारी कार्यालय और बैंक आदि स्थानों पर हिन्दी और अंग्रेजी भाषाएं प्रतिष्ठा, प्रामाणिकता और उपलब्धता के पैमानों पर अलग पायदानों पर खड़ी दिखती हैं। अंग्रेजी की स्वीकार्यता निश्चित रूप से अधिक है और वह कुछ अतिरिक्त मोह के साथ भारतीय मानस पर चढ़ी हुई है।
अनुमान है कि इक्कीसवीं सदी में विश्व-पटल पर एशिया और खास तौर पर भारत और चीन देशों की मुख्य भूमिका हो सकती है। वे कई परिवर्तनों की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं। संचार माध्यमों के तीव्र विस्तार के साथ देश काल के पैमाने बदल रहे हैं और कई अर्थो में ‘‘विश्व-व्यवस्था’ और ‘‘विश्व-गांव’ जैसे जुमले वास्तविकता का आकार ले रहे हैं। विदेशी निवेशकों को व्यापार वाणिज्य के लिए आकर्षित करना बदल रहे माहौल में नये किस्म की जरूरतें पैदा कर रहा है। अपने हितों को देखते हुए बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत के साथ व्यापार बढ़ा रही हैं। इनके दबावों के बीच युवतर मानव संसाधन उपलब्ध कराना और उन्हें कार्य-निपुण बनाना महत्त्वपूर्ण हो गया है। चूंकि उपभोक्ता या ग्राहक हिन्दी क्षेत्र में अधिक हैं अत: अर्थ तंत्र की संघटना में हिन्दी की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत हुई है। इस बीच सूचना-प्रौद्योगिकी का भी अप्रत्याशित रूप से अकूत विस्तार हुआ है, जिसने भाषा-व्यवहार को सभी क्षेत्रों में प्रभावित किया है।
सरकारी और निजी दुनिया में कंप्यूटर की बढ़ती पैठ से कार्य के परिवेश और कार्य पद्धति में एक अनिवार्य बदलाव आ रहा है। हिन्दी भाषा की क्षमता को कई तरह से आंका जाता है। उसके बोलने वालों का बढ़ता संख्या बल, साहित्य-सृजन की मात्र और उसके प्रकाशन का विस्तार, हिन्दी की बढ़ती शब्द-संपदा, हिन्दी का लचीला भाषिक स्वरूप, जन-संचार माध्यमों में हिन्दी की बढ़ती उपस्थिति, भाषांतर या अनुवाद की व्यवस्था (यांत्रिक भी), पारिभाषिक शब्दावली का विकास आदि को ध्यान में रख कर हिन्दी की व्यापक भूमिका को अक्सर रेखांकित किया जाता है। भारत के एक बड़े भू भाग में रहने वाली आम जनता अपने सामान्य जीवन में हिन्दी को व्यवहार में लाती है परंतु घर के बाहर निकलते ही उसे एक भिन्न प्रकार के और एक हद तक अस्वाभाविक भाषिक संसार का सामना करना पड़ता है। हिन्दी क्षेत्रों में बाजार, स्कूल, मनोरंजन, कोर्ट-कचहरी, अस्पताल, सरकारी कार्यालय और बैंक आदि स्थानों पर हिन्दी और अंग्रेजी भाषाएं प्रतिष्ठा, प्रामाणिकता और उपलब्धता के पैमानों पर अलग पायदानों पर खड़ी दिखती हैं।
अंग्रेजी की स्वीकार्यता निश्चित रूप से अधिक है और वह कुछ अतिरिक्त मोह के साथ भारतीय मानस पर चढ़ी हुई है। यह तब है जब पूरे भारत में हिन्दी जानने वालों की संख्या 50 प्रतिशत और अंग्रेजीदां की संख्या महज 10 प्रतिशत है। वैसे कोई भी भाषा पूर्णतया स्थिर नहीं होती है। वह प्रयोग और संदर्भ के अनुसार विकसित होती है। जब भाषा के प्रयोग को समाज में सम्मान मिलता है तो उसकी स्वीकृति बढ़ती है। भाषा प्रयोग की औपचारिक और अनौपचारिक शैलियों में भी अंतर पाया जाता है और उनकी शब्दावली भी भिन्न हो जाती है। परंतु यह सर्वमान्य है की कोई भाषा उतनी ही सीखी जाती है जितनी उसकी उपयोगिता होती है।
भाषा के प्रयोग से ही उसका अस्तित्व होता है और प्रयोक्ताओं कि आवश्यकता से उसकी दक्षता निर्धारित होती है। जब समाज को भाषा की जरूरत होती है तो वह उसका संरक्षण करता है। यह भी गौरतलब है कि भाषाओं के विस्तार के लिए राजनीति बेहद महत्त्वपूर्ण है। यदि आज अंग्रेजी का बोलबाला है तो इसका कारण यही है कि दुनिया में अनेक देश उसके उपनिवेश रहे हैं। वही हाल फ्रेंच या स्पेनिश साम्राज्य का था। जहां भी उनके उपनिवेश बने वहां उनकी भाषा चली। विलक्षण बात यह है कि स्वतंत्रता मिलने के सात दशक बाद भी अंग्रेजी के प्रति ज्यादातर भारतीयों का एक दुर्निवार आकर्षण आज भी बना हुआ है और उसे आसानी से देखा जा सकता है।
इसके कारणों पर गौर करें तो कुछ बातें स्पष्ट रूप से सामने आती हैं। जीवन के अनेक क्षेत्रों में प्रयोग के कारण अंग्रेजी का प्रभुत्व बना हुआ है। अंग्रेजी ज्ञान के आधार पर अच्छी नौकरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। साथ ही सरकारी दस्तावेज मूलत: अंग्रेजी में होते हैं और सरकारी कामकाज में अंग्रेजी का बोलबाला है। इसी तरह प्रौद्योगिकी और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में भी अंग्रेजी की उपस्थिति प्रमुखता से देखी जा सकती है।
हिन्दी कि प्रगति के लिए यह जरूरी होगा कि औपचारिक क्षेत्रों में हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग किया जाए। अपनी भाषा में सोचने, पढ़ने और लिखने से सर्जनात्मकता को भी बल मिलेगा। वैसे भी बहुभाषा भाषी देश में एक सर्वस्वीकृत भाषा का होना जरूरी है। एक विदेशी भाषा के रूप में अंग्रेजी का स्थान भारतीय भाषाओं के बाद ही आना चाहिए।
- गिरीश्वर मिश्र, से साभार







