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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    बेटियों के साथ दरिंदगी को लेकर कैसे जी रहा है ये सभ्य समाज!

    ShagunBy ShagunJune 17, 2026 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    Minors turning violent, and childhood losing its innocence: Who, ultimately, is to blame?
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    इसे केवल आलेख समझने की भूल मत करिए, ये उन तमाम रोती बिलखती बेटियों की पुकार है उन तमाम पीड़ित परिवारों की हम सब से फरियाद है कि अभी भी समय है बचा लीजिये खुद को और सभ्य समाज को इस अनंत पीड़ा से..

    rahul guptaराहुल कुमार गुप्ता

    देश के किसी न किसी हिस्से से हर रोज सामने आती नई चीखें, ये सिर्फ खबरें नहीं हैं। ये हमारे समाज के जिंदा होने के दावों पर नासूर है। नाम बदलते हैं, तारीखें बदलती हैं, भूगोल बदल जाता है, लेकिन जो नहीं बदलता, वह है वहशीपन की वो रोंगटे खड़े कर देने वाली दु:खद और हृदय को चीर देने वाली घटनाएं जो पहले से कहीं अधिक हिंसक, बर्बर और विकृत होकर हमारे सामने आती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े साल-दर-साल चीख-चीख कर गवाही देते हैं कि बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों और पॉक्सो के मामलों में लगातार भयावह बढ़ोत्तरी हो रही है। लेकिन हम एक समाज के रूप में इतने संवेदनशून्य और बहरे हो चुके हैं कि हमें उन अंतहीन आंकड़ों के पीछे सिसकती हुई मासूमियत की अंतिम चीखें सुनाई ही नहीं देतीं। जिस देश की संस्कृति में सदियों से ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता’ का मंत्र दोहराया जाता रहा, आज उसी धरती पर छह महीने की दुधमुंही बच्ची से लेकर साठ साल की बुजुर्ग महिला तक, कोई भी सुरक्षित नहीं है। यह कैसी मानसिक विक्षिप्तता है? ये सभ्य कहलाने वाला समाज आज जंगलों की सभ्यता और नियमों के आगे तुलना के योग्य भी नहीं है। घर के बाहर आपको कुछ लोग ही अच्छे मिलते हैं शेष तो नज़रे गड़ाए बैठे हैं मासूमों के साथ अपराध को अंजाम देने के लिए।

    इस बर्बरता ने आज हर घर के भीतर, हर माता-पिता के मन में भय का एक ऐसा गहरा कोना बना दिया है जो लगातार फैलता जा रहा है। आज जब एक माँ अपनी मासूम बच्ची को पल भर के लिए भी नजरों से दूर करती है, तो उसकी धड़कनें तब तक सामान्य नहीं होतीं जब तक कि वह सुरक्षित लौट न आए। सबसे बड़ी समस्या यह है कि इस खौफनाक माहौल के खिलाफ व्यापक रूप से खड़े होने के लिए न तो राजनीतिक दल तैयार हैं और न ही बड़ी सामाजिक संस्थाएं। जब कोई हादसा होता है, तो वह केवल दो दिन का राजनीतिक एजेंडा, सोशल मीडिया का खोखला आक्रोश, और शाम को जलने वाली कुछ मोमबत्तियां बनकर रह जाता है। जिस परिवार पर यह वज्रपात होता है, या तो वह न्याय की अंधेरी गलियों में अकेले भटकते हुए दम तोड़ देता है, या फिर लेट लतीफ़ न्याय जिसमें अपराधियों को कुछ सजा सुना दी जाती है। लेकिन इससे पीड़ित परिवार की पीड़ा और अतिशाय दुःख तो कम नहीं हो जाता। बाकी समाज ‘जिसके साथ हुआ, वही निपटे’ की आत्मघाती मानसिकता ओढ़े अगली ब्रेकिंग न्यूज का इंतजार करने लगता है।

    अगर हम इसके कारणों की गहराई में उतरें, तो विधि आयोग की रिपोर्टों से लेकर समाजशास्त्र और मनोविज्ञान के सिद्धांतों तक, सब एक-दूसरे के विपरीत खड़े नजर आते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इस समस्या की जड़ें कानून-व्यवस्था से कहीं ज्यादा हमारे सामाजिक और मानसिक पतन में धंसी हैं। आज हर हाथ में मौजूद स्मार्टफोन और इंटरनेट पर बिना किसी रोक-टोक के तैरती मुफ्त पोर्नोग्राफी ने इंसानी दिमाग को कूड़ाघर बना दिया है। यौनिकता और हिंसा के इस हिंसक घालमेल ने विकृत मानसिकता वाले लोगों के भीतर की इंसानियत को पूरी तरह खत्म कर दिया है। इसके साथ ही, आवारा पूँजी के इस वैश्विक बाजारवाद ने हर मानवीय संवेदना को वस्तु में बदल दिया है, जहाँ विज्ञापनों से लेकर वेब सीरीज तक, हर जगह विकृत आनंद को परोसा जा रहा है। कड़े कानून बनने के बावजूद, अपराधियों के हौसले इसलिए बुलंद हैं क्योंकि न्याय मिलने में दशकों लग जाते हैं, और न्यायशास्त्र का यह स्थापित सच है कि न्याय में देरी, असल में न्याय की हत्या है। जब अपराधी देखता है कि व्यवस्था की ढीली कड़ियों के सहारे वह बरसों तक सजा से बच सकता है, तो उसका खौफ पूरी तरह खत्म हो जाता है।

    इस मर चुकी सामाजिक चेतना को जगाने और अपनी बेटियों और बच्चों को इस नरक से बचाने के लिए हमें खोखले नारों और मोमबत्तियों के ढोंग से बाहर निकलकर बहुआयामी और ठोस कदम उठाने होंगे। कानून का क्रियान्वयन बिजली की गति से हो। पॉक्सो के मामलों के लिए समर्पित अदालतें चौबीसों घंटे काम करें और घटना के छः महीने के भीतर दोषी को ऐसी कठोर और ऐतिहासिक सजा दी जाए जिसे देखकर लोगों के साथ अपराधियों की रूह कांप जाए। इसके साथ ही, सरकारों को इच्छाशक्ति दिखाते हुए डिजिटल स्पेस की जवाबदेही तय करनी होगी। इंटरनेट पर उपलब्ध हिंसक, अश्लील और विकृत सामग्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना होगा ताकि तकनीक इंसानी विकास का जरिया बने, न कि दरिंदगी को खाद-पानी देने का माध्यम।

    परंतु केवल अदालतों और इंटरनेट पर पाबंदी लगाने से यह जंग नहीं जीती जा सकती। इसकी सबसे मजबूत नींव हमारे अपने घरों में रखी जाएगी। हमें अपनी परवरिश के ढर्रे को बदलना होगा। हमें अपने बेटों को बचपन से ही ‘ना’ का सम्मान करना और लैंगिक संवेदनशीलता सिखानी होगी। उन्हें यह समझाना होगा कि पुरुषत्व का पैमाना किसी कमजोर पर ताकत आजमाना नहीं, बल्कि हर व्यक्ति के सम्मान की रक्षा करना है। स्कूलों के पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा और आत्मरक्षा को अनिवार्य करना होगा ताकि बच्चे अपने अधिकारों और सुरक्षा के प्रति सजग हो सकें। सबसे बढ़कर, हमें अपराधी को जाति, धर्म या राजनीतिक चश्मे से देखना बंद करना होगा। दरिंदे की कोई जाति नहीं होती, उसका केवल एक ही नाम होता है, अपराधी। जब तक समाज ऐसे तत्वों को सामाजिक और राजनीतिक संरक्षण देता रहेगा, तब तक यह बीमारी कभी खत्म नहीं होगी। हमें खुद से उठना होगा, इन खौफनाक और वहशीपन की हवाओं को रोकना होगा। गांव-गांव, कस्बे- कस्बे, शहर-शहर शहरों के मोहल्लों- मोहल्लों ऐसी स्वतंत्र सक्रिय समितियां तैयार करना होगा और एक रोस्टर चार्ट बनाकर हर हफ्ते की जिम्मेदारी तय करनी होगी, जो अपने निर्धारित स्थान और उसके आस पास के स्थानों में ऐसी घटनाओं को घटित होने से पहले रोक सकें। पुलिस अपना कार्य अपने स्तर से कर रही है, हमें भी सक्रिय होकर समाज के इस तीव्रता से फैल रहे “ब्लड कैंसर” का इलाज करने में सहयोग देना होगा।

    इसे केवल आलेख समझने की भूल मत करिए, ये उन तमाम रोती बिलखती बेटियों की पुकार है उन तमाम पीड़ित परिवारों की हम सब से फरियाद है कि अभी भी समय है बचा लीजिये खुद को और समाज को इस अनंत पीड़ा से। यह समाज के माथे पर लगा वो कलंक है जिसे हम रोज अनदेखा कर देते हैं। अब समय आ गया है कि हम अपनी इस मूक और सोई हुई आत्मा को झकझोरें, क्योंकि अगर आज हम दूसरों की बेटियों की चीखों पर खामोश रहे, तो याद रखिए कि इस खौफनाक अंधेरे की अगली दस्तक हमारे अपने दरवाजे पर भी हो सकती है। सरकारें, कानून और विचारक अपनी सुविधानुसार जागते रहेंगे, कार्य करते रहेंगे लेकिन एक सजग समाज के रूप में हमें आज और इसी वक्त उठ खड़ा होना होगा ताकि इस देश का बचपन फिर से निडर होकर मुस्कुरा सके।

    Shagun

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