डॉ दिलीप अग्निहोत्री
बसपा प्रमुख मायावती का बयान तालमेल के लिए बेकरार लोगों के लिए किसी नसीहत से कम नहीं है। उन्होंने साफ कर दिया कि सम्मानजनक सीटें मिलने पर ही गठबन्धन होगा। इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि वह किसी की बुआ नहीं है। इससे दो बात जाहिर हुई। मायावती प्रस्तावित गठबन्धन से उचित दूरी बनाए रखना चाहती है। सपा से उनका गठबन्धन सन दो हजार दो से पहले जैसा नहीं होगा। इसका विस्तार जमीनी स्तर पर होना मुश्किल ही होगा। दूसरी बात यह कि मायावती बुआ जैसे इमोशल संबोधनों से प्रभावित नहीं होगी।बसपा सुप्रीमो ने दो टूक कहा कि अगर उनकी पार्टी को सीट बंटवारे के दौरान सम्मानजनक हिस्सा नहीं मिलता है तो बसपा अकेले ही आगामी लोकसभा चुनाव लड़ेगी। उन्होंने साफ कहा कि उनकी पार्टी किसी भी चुनाव में कहीं भी गठबंधन करने के लिए तैयार है, लेकिन ऐसा तभी संभव है जब पार्टी को सीट बंटवारे में सम्मानजनक हिस्सा मिले। ऐसा नहीं होने पर पार्टी अकेले चुनाव लड़ेगी।

वस्तुतः मायावती का बयान उनके मनोभाव की अभिव्यक्ति करने वाले हैं। ऐसा नहीं कि उन्होंने कुछ घण्टे पहले एक नेता द्वारा उनको बुआ जी कहने के बाद ही बयान दिया। यह संबोधन वह पिछले कई वर्षों से सुनती आ रही है। बेशक वह अपने भाई के बच्चों की बुआ है। यह सहज स्वभाविक रिश्ता है। लेकिन राजनीतिक क्षेत्र में उनके लिए यह संबोधन संवेदना के स्तर का नहीं था। वर्षो तक मायावती को बुआ कहा गया, लेकिन इस संबोधन को तंज और व्यंग रूप में ही प्रयुक्त किया जाता था। मायावती पत्थर वाली बुआ जी का लगातार मिलने वाला संबोद्धन कैसे भूल सकती है। यह भी कहा जाता था कि पत्थर वाली बुआ जी से सावधान रहना। अभी जिस नेता ने जेल से बाहर आने के बाद मायावती को बुआ जैसा कहा, उसमें भी राजनीतिक स्वार्थ की ही भावना देखी गई। इसलिए मायावती ने शुरुआत में इसे खारिज कर दिया। इसके अलावा मायावती वह समय भी भूल नहीं सकती, जिसमें सपा से बसपा का अलगाव हुआ था। उनके लिए यह किसी दुःस्वप्न से कम नहीं था। मायावती नहीं चाहती कि ऐसी नौबत दुबारा आये।
वह जानती है कि गठबन्धन की बात विकल्पहीनता की स्थिति के कारण चल रही है। यदि सपा कमजोर नहीं होती तो आज भी बुआ के संबोद्धन से तंज चल रहे होते। ऐसे में मायावती गठबन्धन नहीं सौदा करना चाहती है। गोरखपुर और फूलपुर में भी उन्होंने समझौता ही किया था। उन्होंने शर्तो के साथ ही समर्थन दिया था। इसमें उच्च सदन के लिए समर्थन की शर्त लगाई गई थी। जाहिर है कि मायावती गठबन्धन के प्रति सावधान भी है, और उचित दूरी बना कर ही चलना चाहती है। राजनीति के लोगों द्वारा बुआ कहने पर मायावती की नाराजगी साफ जाहिर हुई। उन्होंने साफ कहा कि राजनीतिक स्वार्थ के लिए लोग मुझसे रिश्ता बनाने की कोशिश कर रहे है। एेसे लोगों से मेरा कोर्इ रिश्ता नहीं है।

उन्होंने कहा कि मेरा एेसे लोगों से बहन,बुआ-भतीजे का कोर्इ रिश्ता नहीं है। मेरा रिश्ता है तो सिर्फ गरीबों से है। उनके लिए हमेशा लड़ी हूं। उन्हीं के लिए काम करती रहूंगी। इतना ही नहीं उन्होंने आगे कहा कि रावण को अलग से संगठन बनाने की जरूरत क्यों पड़ी। अगर लड़ना है तो बसपा के झंडे के नीचे आकर लड़े। यह उन लोगों पर भी लागू होता है जो जबरदस्ती मायावती का भतीजा बनने में लगे हुए है। मायावती ने एक टिप्पणी से गठबन्धन को बेकरार सभी लोगों को नसीहत दी है। यह भी साफ हुआ कि मायावती बंगलुरू वाली महागठबन्धन के फोटो सेशन से बिल्कुल भी प्रभावित नहीं है।
कुमारस्वामी के शपथग्रहण में सभी विपक्षी पार्टियां दौड़ गई थी। हाँथ उठा कर खूब फोटो खिंचाई गई। मायावती को सोनिया गांधी ने गले लगाया। इसे भी राजनीति का गठबन्धन कहा गया। अखिलेश और मायावती एक साथ पहली बार किसी मंच पर मौजूद हुए। इसके पहले सपा और बसपा की दुश्मनी ही चर्चा में रहती थी। बंगलुरू में मंच साझा क्या हुआ, जमीन तक गठबन्धन के दावे होने लगे। मायावती किसी गलतफहमी में नहीं रही। उनके ताजा बयान इसकी ताकीद करते है। सम्मानजनक सीट की संख्या भी मायावती ही बताएगी। सपा, कांग्रेस, राष्ट्रीय लोकदल को इसे मंजूर करना होगा। इन्हें अपनी बी टीम हैसियत को स्वीकार करना होगा। यह तय हुआ कि मायावती अपनी शर्तों पर ही गठबन्धन करेंगी। इसके लिए अन्य पार्टियों को झुकना पड़ेगा। फिलहाल मायावती ने यह भी अपरोक्ष रूप में बता दिया कि उनकी पार्टी गठबन्धन के लिए बेकरार नहीं है।








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