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    पेपर लीक : कब तक ली जाएगी युवाओं के धैर्य की परीक्षा?

    ShagunBy ShagunJune 15, 2026 Current Issues No Comments8 Mins Read
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    (Aalok Bajpai is a senior journalist, columnist and multidisciplinary cultural commentator. He is a research scholar in economics and writes on democracy, political economy, development and environmental issues. His writings have appeared in national and regional publications. The views expressed are personal.)आलोक बाजपेयी

    भारत को दुनिया का सबसे युवा देश कहा जाता है। देश का ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ (Demographic Dividend) यानी जनसांख्यिकीय लाभांश हमारी सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। लेकिन आज की कड़वी हकीकत यह है कि इसी युवा आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा देश की चरमराती परीक्षा प्रणाली के कारण गहरे अवसाद, अनिश्चितता और मानसिक तनाव के दौर से गुजर रहा है। लखनऊ के इको गार्डन से लेकर देश के कोने-कोने में युवाओं का सड़कों पर उतरना इस बात का गवाह है कि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। राष्ट्रीय स्तर से लेकर राज्य स्तरीय भर्ती परीक्षाओं में धांधली और पेपर लीक का एक ऐसा संगठित ‘उद्योग’ खड़ा हो चुका है, जिसने भारत के परीक्षा तंत्र को पूरी तरह खोखला कर दिया है।

    पेपर लीक: एक राष्ट्रीय संकट और संगठित अपराध

    पिछले कुछ वर्षों में ऐसा कोई साल या महीना नहीं बीता, जब किसी बड़ी प्रतियोगी परीक्षा के लीक होने या उसमें धांधली की खबर न आई हो। नीट (NEET), नेट (NET), पुलिस भर्ती परीक्षा, रेलवे, शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) से लेकर राज्य लोक सेवा आयोगों की परीक्षाओं तक -हर जगह सेंधमारी हो रही है। यह कोई प्रशासनिक ढीलापन या छिटपुट लापरवाही नहीं है; यह एक अरबों रुपये का संगठित अपराध (Organized Crime) बन चुका है। सरकारें पेपर लीक होने के बाद कानून बनाने या परीक्षा रद्द करने की औपचारिकता तो पूरी कर लेती हैं, लेकिन इस संगठित तंत्र की जड़ों पर प्रहार करने में पूरी तरह विफल रही हैं।

    भयावह आंकड़े: पेपर लीक का फैला जाल

    मीडिया रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, पिछले सात-आठ सालों में देश के अलग-अलग राज्यों में 70 से अधिक बड़ी परीक्षाएं लीक हो चुकी हैं। इन घोटालों के कारण लगभग 1.7 करोड़ से अधिक उम्मीदवारों का भविष्य अधर में लटका है। नीट (NEET-UG), यूजीसी-नेट (UGC-NET), यूपी पुलिस भर्ती, बिहार शिक्षक भर्ती (TRE), रेलवे और विभिन्न राज्यों के लोक सेवा आयोगों की परीक्षाओं में जिस तरह संगठित गिरोहों ने सेंधमारी की है, उसने साबित कर दिया है कि परीक्षा माफिया, प्रिंटिंग प्रेस, निजी परीक्षा केंद्रों और प्रशासनिक अधिकारियों का एक ऐसा अभेद्य गठजोड़ तैयार हो चुका है, जो मोटी रकम के बदले लाखों ईमानदार छात्रों के भविष्य का सौदा दिन-दहाड़े कर रहा है।paper leak

    ‘सिस्टम’ की नाकामी और लचर जवाबदेही

    जब एक परीक्षा लीक होती है या उसमें धांधली के कारण उसे रद्द करना पड़ता है, तो केवल एक पेपर रद्द नहीं होता। उसके साथ एक छात्र की सालों की मेहनत, उसके गरीब माता-पिता की गाढ़ी कमाई के लाखों रुपये और पूरे परिवार की उम्मीदें जमींदोज हो जाती हैं। सबसे शर्मनाक बात यह है कि इतनी बड़ी राष्ट्रीय आपदाओं के बाद भी जवाबदेही तय नहीं की जाती। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) जैसी शीर्ष संस्थाओं से लेकर राज्य के भर्ती बोर्डों तक, कोई भी अधिकारी इस विफलता की नैतिक जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं होता। परीक्षा रद्द होने के बाद नई तारीखों का महीनों तक इंतजार करना, कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटना और अंतहीन कानूनी प्रक्रियाओं में उलझना भारतीय छात्रों की नियति बन चुका है।

    युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य से खिलवाड़: एक अदृश्य महामारी

    परीक्षा प्रणाली की यह सड़न सीधे तौर पर युवाओं को मानसिक रूप से बीमार बना रही है:इसमें पहला तनाव भविष्य की अनिश्चितता का होता है. 20 से 30 वर्ष की उम्र का स्वर्णिम समय, जो देश के निर्माण में लगना चाहिए था, वह सिर्फ परीक्षाओं के चक्रव्यूह में उलझकर रह गया है। पारिवारिक और सामाजिक दबाव भी भयावह होता है . सालों तक एक ही परीक्षा की तैयारी करने और फिर पेपर लीक होने के कारण परीक्षा रद्द होने से युवा अपने ही परिवार के सामने खुद को ‘नाकाम’ महसूस करने लगते हैं। गंभीर अवसाद (Depression) इन सबका सामूहिक और सबसे सामान्य दुष्परिणाम है . कोचिंग हब बन चुके शहरों (जैसे कोटा, प्रयागराज, मुखर्जी नगर) से आने वाली छात्रों की आत्महत्या की खबरें अब महज आंकड़े बनकर रह गई हैं। यह परीक्षा प्रणाली छात्रों की मेधा का परीक्षण नहीं कर रही, बल्कि उनके मानसिक स्वास्थ्य की बलि ले रही है।paper leak

    युवाओं की आत्महत्या: एक संस्थागत हत्या

    सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित नेशनल टास्क फोर्स (NTF) ने भी देश में छात्र आत्महत्याओं के बढ़ते मामलों को एक ‘संस्थागत संकट’ (Institutional Crisis) माना है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि देश में हर साल 13,000 से अधिक छात्र आत्महत्या कर रहे हैं, यानी हर दिन लगभग 35 से अधिक युवा अपनी जान दे रहे हैं। सालों तक एक ही परीक्षा की तैयारी करने, अपनी जवानी के सबसे महत्वपूर्ण 5-6 साल एक बंद कमरे में गुजारने और फिर अंत में पेपर लीक होने के कारण परीक्षा रद्द होने से युवा भीतर से टूट जाते हैं।

    जवाबदेही से भागती सरकार: धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा क्यों नहीं?

    लोकतंत्र का सबसे बुनियादी सिद्धांत ‘जवाबदेही’ है, लेकिन भारतीय परीक्षा तंत्र में यह शब्द पूरी तरह गायब हो चुका है। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) के तहत आने वाली देश की सबसे बड़ी परीक्षाओं में ऐतिहासिक धांधली और पेपर लीक के बड़े-बड़े सबूत सामने आने के बाद भी देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा नहीं दिया। विपक्ष और करोड़ों छात्रों के भारी आक्रोश के बावजूद नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ना तो दूर, सरकार लगातार इस विफलता पर लीपापोती करने में जुटी रही। जब व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे राजनेता और नीति-निर्माता अपनी विफलता को स्वीकार करने और कुर्सी छोड़ने से इनकार कर देते हैं, तो यह सीधे तौर पर देश के युवाओं के घावों पर नमक छिड़कने जैसा होता है। यह रवैया संदेश देता है कि सरकार के लिए नेताओं की कुर्सियां युवाओं के भविष्य से कहीं अधिक कीमती हैं।

    आज तक किसी बड़े जिम्मेदार को सजा नहीं

    पेपर लीक होने के बाद सरकारें आनन-फानन में कड़े कानून बनाने, सीबीआई (CBI) जांच सौंपने या कुछ छोटे-मोटे दलालों और ‘डमी कैंडिडेट्स’ को गिरफ्तार करने का ढोंग तो रचती हैं, लेकिन आज तक इतिहास में किसी भी बड़े मगरमच्छ—चाहे वह कोई बड़ा नेता हो, शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी हो या परीक्षा बोर्ड का चेयरमैन—को ऐसी मिसाल बनने वाली सख्त सजा नहीं मिली है जो दूसरों के लिए सबक बने। जांच के नाम पर मामलों को सालों तक ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। कड़े कानून केवल कागजों पर धूल फांक रहे हैं क्योंकि जब तक परीक्षा कराने की पूरी प्रक्रिया और डेटा सुरक्षा (Data Security) को पारदर्शी नहीं बनाया जाएगा, और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त माफियाओं की कमर नहीं तोड़ी जाएगी, तब तक कोई भी कागजी कानून इस बीमारी का इलाज नहीं कर सकता।

    सत्रह वर्ष का एक बच्चा बनाम तमाम जाँच एजेंसियाँ

    इस सड़ते हुए परीक्षा तंत्र की पोल तब और भी शर्मनाक तरीके से खुली, जब राँची के महज 17 वर्षीय छात्र सार्थक सिद्धांत ने वह कर दिखाया जो बड़ी-बड़ी जाँच एजेंसियाँ नहीं कर पाईं। अपनी 12वीं की उत्तर पुस्तिकाओं में गड़बड़ी मिलने पर, सार्थक ने केवल शिकायत नहीं की, बल्कि खुद एक इन्वेस्टिगेटर की भूमिका निभाई। उसने CBSE के On-Screen Marking (OSM) टेंडर के सैकड़ों पन्नों के दस्तावेजों का विश्लेषण किया और पाया कि कैसे एक दागी कंपनी (Coempt Edu Teck) को फायदा पहुँचाने के लिए टेंडर के नियमों में 15 बार बदलाव किए गए और ‘खराब प्रदर्शन’ वाले क्लॉज हटा दिए गए। उसकी यह रिपोर्ट इतनी ठोस थी कि उसे शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल संबंधी संसदीय स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee) के सामने गवाही देने के लिए दिल्ली बुलाया गया। 2 जून 2026 को संसद के एनेक्सी में, जब एक स्कूल यूनीफॉर्म पहनने वाले बच्चे ने देश के शीर्ष अधिकारियों और सांसदों के सामने 7 पन्नों का डॉसियर रखकर सिस्टम की धज्जियाँ उड़ाईं, तो यह साबित हो गया कि हमारी परीक्षा व्यवस्था न केवल अक्षम है, बल्कि नैतिक रूप से भी खोखली हो चुकी है।

    केवल कड़े कानून नहीं, पूरी परीक्षा प्रक्रिया के ढांचागत सुधार ज़रुरी

    एक स्वतंत्र और तकनीकी रूप से सक्षम राष्ट्रीय परीक्षा सुरक्षा प्राधिकरण (National Examination Security Authority) का गठन किया जाना चाहिए, जो प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर मूल्यांकन तक की पूरी प्रक्रिया की निगरानी करे। पेपर लीक और भर्ती घोटालों से जुड़े मामलों के लिए समयबद्ध विशेष अदालतें बनाई जानी चाहिए ताकि वर्षों तक मुकदमे लंबित न रहें। यदि किसी परीक्षा को प्रशासनिक विफलता या सुरक्षा चूक के कारण रद्द करना पड़ता है, तो अभ्यर्थियों को यात्रा, आवास और तैयारी पर हुए खर्च के लिए उचित आर्थिक मुआवजा देने की व्यवस्था होनी चाहिए। साथ ही, भर्ती प्रक्रियाओं को निर्धारित समय-सीमा में पूरा करना कानूनी रूप से अनिवार्य बनाया जाए तथा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए परामर्श और मानसिक स्वास्थ्य सहायता तंत्र विकसित किया जाए। जब तक व्यवस्था अभ्यर्थियों के समय, श्रम और मानसिक स्वास्थ्य को उतना ही मूल्यवान नहीं मानेगी जितना वह अपनी संस्थागत प्रतिष्ठा को मानती है, तब तक सुधार अधूरे ही रहेंगे।

    युवाओं के धैर्य की परीक्षा बंद हो

    एक राष्ट्र के रूप में हम अपने युवाओं से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वे हर बार व्यवस्था की नाकामियों को सहते रहें और फिर भी देशभक्ति और राष्ट्र-निर्माण के नारे लगाते रहें। यदि भारत को वास्तव में एक वैश्विक महाशक्ति बनना है, तो उसे सबसे पहले अपने परीक्षा सिस्टम को ‘लीक-प्रूफ’ और पारदर्शी बनाना होगा। युवाओं का व्यवस्था पर से भरोसा उठना किसी भी जीवंत लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। सरकार को अब लीपापोती बंद करके परीक्षा तंत्र की इस सड़न को जड़ से खत्म करना होगा, क्योंकि यह लड़ाई सिर्फ एक परीक्षा की नहीं, बल्कि देश के भविष्य और उसकी मानसिक सेहत को बचाने की है।

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