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    Home»ब्लॉग

    कर्त्तव्यों के चक्रव्यूह में घिरे हैं कई कलमकार!

    ShagunBy ShagunJune 12, 2026 ब्लॉग No Comments3 Mins Read
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    Many writers are caught in a labyrinth of duties!
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    राहुल कुमार गुप्ता

    एक मनुष्य का जीवन क्या है? शायद, खुद को किस्तों में अपनों और समाज के नाम कर देने की एक अनवरत यात्रा। यह महज मेरे अंतर्मन से उपजी छटपटाहट नहीं है बल्कि आज के दौर के हर उस संवेदनशील और जागरूक नागरिक की कहानी है, जो रिश्तों के दायित्वों और सामाजिक चेतना के दो पाटों के बीच पिस रहा है।

    हमारा जीवन एक रंगमंच की तरह है, जहाँ हम एक हैं, लेकिन हमारी भूमिकाएँ अनेक हैं। कभी एक बेटा जो अपने बूढ़े माता-पिता की लाठी बनना चाहता है, कभी एक पति जो अपनी संगिनी का संबल है, कभी भाई, कभी पिता, तो कभी दफ्तर की ज़िम्मेदारियाँ और समाज व देश के प्रति नागरिक धर्म। इन असंख्य रिश्तों की उम्मीदों के चलते हमारे भीतर न जाने कितने कार्यकारी रूप जन्म ले लेते हैं। हम सबके सामने उनकी कसौटियों पर खरे उतरने की या कोशिश करते हैं या फिर स्वांग रचते हैं। लेकिन इस प्रक्रिया में हमारा मूल स्व कहाँ खो जाता है, हमें अंदाज़ा ही नहीं होता। दुविधा तब और गहरी हो जाती है जब ये कर्तव्य आपस में टकराते हैं। महाभारत के मैदान में जैसे अर्जुन अपनों के ही सामने धर्म-संकट में खड़े थे, वैसी ही कशमकश रोज़ एक आम इंसान जीता है। जब उसे एक अच्छा बेटा, एक समर्पित पति और एक ज़िम्मेदार नागरिक होने के बीच किसी एक को चुनना पड़ता है।Many writers are caught in a labyrinth of duties!

    लेकिन मेरी यह बेचैनी सिर्फ पारिवारिक दायित्वों तक सीमित नहीं है; इसका विस्तार देश और समाज की मौन विकृतियों तक है। आज का दौर वह है जहाँ समालोचना (कन्स्ट्रक्टिव क्रिटिसिज्म) को राजद्रोह या विद्रोह मान लिया जाता है। सत्ताएँ जब असहमति की आवाज़ों को कुचलने लगें, तो लिखने-पढ़ने वाले हाथ काँपने लगते हैं। इतिहास गवाह है कि सुकरात से लेकर कबीर तक, जिसने भी समाज को आईना दिखाया, उसे व्यवस्था का कोपभाजन बनना पड़ा। ऐसे माहौल में जब चारों ओर कुंभकर्णी नींद में सोई हुई सामूहिक चेतना दिखती है, तो मन निराश हो जाता है। लगता है कि सब व्यर्थ है, यहाँ कोई क्रांति नहीं आने वाली। मन करता है कि हम भी अपनी आँखें मूँद लें, बाकी दुनिया की तरह इस सोई हुई चेतना का हिस्सा बन जाएँ, ताकि हमारा परिवार और हम भौतिक रूप से सुरक्षित और सुखी रह सकें।

    परंतु, एक लेखक, एक विचारक का दिल इस सुखद अज्ञानता को स्वीकार नहीं कर पाता। जब प्रकृति, समाज और देश को स्वार्थ और दानवता के साए में घिरते देखते हैं, तो ईश्वर द्वारा भेजे गए विचार मस्तिष्क में एक तूफान खड़ा कर देते हैं। वह उधेड़बुन, वह स्वतः स्फूर्त बेचैनी रातों की नींद छीन लेती है। यह वह छटपटाहट है जो कलम को रुकने नहीं देती। कबीर ने यूँ ही नहीं कहा था कि “सुखिया सब संसार है, खावै अरु सोवै। दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै।”

    विगत 25 वर्षों से अनवरत चल रहा लेखन का यह सिलसिला इसी छटपटाहट का गवाह है। यह जानते हुए भी कि रास्ता काँटों भरा है, लिखना इसलिए जारी है क्योंकि मन के किसी कोने में एक मद्धम सी उम्मीद बाकी है कि शायद इन शब्दों से, अपने व्यवहार से किसी एक की चेतना जागेगी, शायद इस वैचारिक मशाल से समाज का कोई एक कोना रोशन होगा। यदि इन विचारों से संसार में रत्ती भर भी सकारात्मक बदलाव आ सके, तो इस जीवन और लेखन दोनों की सार्थकता सिद्ध हो जाएगी।

    Shagun

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