सचिन देव बर्मन की पुण्य तिथि 31 अक्टूबर पर भावभीनी श्रद्धांजलि
मुंबई, 31 अक्टूबर 2018: जब कोई बहुत प्यारा व्यक्ति जाता है तो दिल यही पुकारता है, ‘‘ओ जाने वाले, हो सके तो लौट के आना…..’’ इन्हीं शब्दों से आरंभ होने वाला गीत 1963 के चलचित्र ‘बन्दिनी’ में सुनने को मिला था। सान्द्र भावनात्मकता से ओत-प्रोत इस गीत को शैलेन्द्र ने लिख था तथा इसके भावों को अपने स्वर से विस्तार दिया था मुकेश ने, गीत में ‘हो सके तो..’ के उपयोग ने ग़ज़ब का असर पैदा किया है। बुलाने वाले को लग रहा है कि जाने वाला कदाचित नहीं लौट पाएगा। किन्तु दिल तो यही चाह रहा है कि वह लौट आये।
‘राग जोग’ पर आधारित इस गीत में निर्मल भावनाओं के साथ विषाद तथा कसक का जो अद्रुत मेल है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। एक आदर्श गीत के चार पक्ष होते है। गीत लेखन, धुन, गायन तथा इन तीनों में तालमेल। धुन तथा तालमेल का दायित्व संगीत निर्देशक पर होता है इस गीत में यह दायित्व शचीन देव बर्मन ने सफलतापूर्वक निभाया था।

सचिन देव बर्मन जैसी इस शख्सियत के बारे में कुछ कहना मुहाल है। क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर के पिता सचिन दा के इतने बड़े फैन थे कि उन्होंने अपने बेटे का नाम सचिन रख दिया कुछ उसी अंदाज में जैसे सुनील गावस्कर ने रोहन कन्हाई से प्रभावित होकर अपने बेटे का नाम रोहन रख दिया था।
सचिन दा की खूबियां क्या कहने। बेहतरीन म्यूजिक डायरेक्टर और एक अजब सी कशिश उनकी आवाज में भी थी। उन्हीं के गाए और शैलेन्द्र साहब के लिखे इस गीत के साथ इस महान शख्स की पुण्य तिथि 31 अक्टूबर पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि-
कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है फ़ानी
पानी पे लिखी लिखायी
है सबकी देखी, है सबकी जानी
हाथ किसी के न आयी
हाथ किसी के न आयी
कुछ तेरा न मेरा
मुसाफिर जाएगा कहां …







