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    खेल तो पेरेंट्स के साथ बहुत पहले से होता आया है -जागरूकता अब बढ़ी

    ShagunBy ShagunApril 28, 2026Updated:April 28, 2026 Current Issues No Comments4 Mins Read
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    Parents have been subjected to such manipulation for a very long time—it is simply that awareness has increased now.
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    हरदोई के सनबीम स्कूल पर कानून का शिकंजा कसा, “शटअप” से FIR तक: मीडिया की शक्ति और सिस्टम की चयनात्मक सक्रियता

    हरदोई के सनबीम स्कूल में एक अभिभाविका के साथ हुई बदतमीजी अब गंभीर कानूनी मुद्दा बन चुकी है। स्कूल प्रबंधन द्वारा “शटअप” कहकर अभिभावक को चुप कराने की कोशिश अब उल्टी पड़ गई है। FIR दर्ज हो चुकी है, सख्त धाराएं लगाई गई हैं और स्कूल की मान्यता निरस्त करने का नोटिस भी जारी कर दिया गया है।

    सबसे महत्वपूर्ण और चिंताजनक पहलू यह है कि सिस्टम की सक्रियता मीडिया एक्सपोजर पर निर्भर करती दिख रही है। जब तक यह घटना केवल सोशल मीडिया पर वायरल हो रही थी, तब तक प्रशासन, शिक्षा विभाग और स्थानीय अधिकारियों की तरफ से कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। अधिकारी लगभग “म्यूट” मोड में थे। लेकिन जैसे ही मामला प्रमुख टीवी चैनल (आजतक) पर प्रमुखता से दिखाया गया, पूरा सिस्टम अचानक “एक्टिव मोड” में आ गया। जांच शुरू हुई, आदेश जारी हुए और कार्रवाई तेज हो गई।

    यह घटना सिस्टम की चयनात्मक जवाबदेही का स्पष्ट उदाहरण है। आमतौर पर छोटे-मोटे मामलों में जहां मीडिया की पहुंच नहीं होती, वहां अक्सर कार्रवाई या तो बहुत देरी से होती है या फिर बिल्कुल नहीं होती। लेकिन जब मामला वायरल होकर टीवी स्क्रीन पर पहुंच जाता है, तब अचानक “जनता की भावनाओं” को ध्यान में रखते हुए तुरंत एक्शन लिया जाता है।Parents have been subjected to such manipulation for a very long time—it is simply that awareness has increased now.

    असली समस्या: महंगी फीस, किताबें, ड्रेस और कन्वेयंस

    वास्तव में ऐसी नौबत क्यों आती है? क्योंकि अप्रैल के महीने में ही स्कूल एक साथ महंगी कॉपी-किताबें, यूनिफॉर्म, फीस और कन्वेयंस का बोझ अभिभावकों पर डाल देते हैं। कई मध्यमवर्गीय और निम्न-मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह सब एक साथ afford करना बेहद मुश्किल हो जाता है। ऊपर से स्कूल हर साल मनमाने ढंग से फीस बढ़ाते रहते हैं, जो माता-पिता के लिए सिरदर्द बन गया है। इसी कारण देशभर में प्राइवेट स्कूलों के खिलाफ अभिभावकों के विरोध प्रदर्शन लगातार बढ़ रहे हैं। अभिभावक इन स्कूलों को खुलेआम “लूट का अड्डा” बता रहे हैं।

    प्रशासन की मिलीभगत और स्कूलों का बढ़ता हौसला

    जब अभिभावकों की शिकायतों पर प्रशासन की तरफ से कार्रवाई न के बराबर होती है, तो प्राइवेट स्कूलों का हौसला और बढ़ जाता है। कई स्कूल अपने वार्षिक सालाना फंक्शन या अन्य कार्यक्रमों में स्थानीय नेताओं और अधिकारियों को आमंत्रित कर मामले “सेट” कर लेते हैं। इसके बाद वे बिना किसी डर के मनमाना शुल्क वसूलते रहते हैं। यही कारण है कि पेरेंट्स और प्राइवेट स्कूलों के बीच विवाद की खाई लगातार बढ़ती जा रही है। फिलहाल अब यह लड़ाई सड़क तक पहुंच चुकी है।

    ठोस कार्रवाई की जरूरत

    जब तक इन मामलों में सख्त और लगातार कार्रवाई नहीं की जाएगी, स्कूलों का यह खेल चलता रहेगा। केवल एक-दो घटनाओं में मीडिया के दबाव में कार्रवाई करके समस्या का समाधान नहीं हो सकता। शिक्षा विभाग को फीस रेगुलेशन, किताबों और यूनिफॉर्म पर लगाम लगाने तथा अभिभावकों की शिकायतों का त्वरित निपटारा सुनिश्चित करना होगा।

    मीडिया की दोहरी भूमिका

    इस मामले में मीडिया ने दो महत्वपूर्ण काम किए हैं। एक तरफ उसने आम आदमी की आवाज को मजबूती दी, दूसरी तरफ उसने सिस्टम को मजबूर किया कि वह अपनी जिम्मेदारी निभाए। लेकिन यह भी एक कड़वी सच्चाई उजागर करता है कि बिना मीडिया प्रेशर के हमारे प्रशासनिक तंत्र में स्वतः सक्रिय होने की क्षमता कमजोर होती जा रही है।

    “शटअप” संस्कृति की कीमत

    स्कूल प्रबंधन की “शटअप” वाली मानसिकता न सिर्फ अभिभावक के अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि शिक्षा जैसी संवेदनशील क्षेत्र में सत्ता के दुरुपयोग को भी दर्शाती है। अब जब स्कूल खुद कानूनी और प्रशासनिक दबाव में है, तो यह एक सबक भी है कि किसी भी संस्थान को आम नागरिक के साथ रौब दिखाने की आदत महंगी पड़ सकती है।

    बता दें कि हरदोई का यह मामला एक बार फिर साबित करता है कि वर्तमान व्यवस्था में “मीडिया ट्रिगर” बिना सिस्टम पूर्ण रूप से जागृत नहीं होता। यह लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। एक स्वस्थ व्यवस्था वह होती है जहां आम नागरिक की शिकायत पर बिना वायरल होने या टीवी पर आने के भी तुरंत संज्ञान लिया जाए और निष्पक्ष कार्रवाई हो।

    https://x.com/i/status/2048324258858971288

    https://x.com/i/status/2048750256733745238

    https://x.com/i/status/2048378896379502795

    https://x.com/i/status/2048470874379141357

    नया नियम बनता दिख रहा है:
    “पहले शटअप बोलो → फिर वायरल होने दो → अगर टीवी पर आ गया तो FIR और एक्शन”
    सवाल यह है कि क्या हमें हर छोटी-बड़ी समस्या को हल कराने के लिए पहले वायरल होना पड़ेगा या टीवी पर जाना पड़ेगा? क्या सिस्टम की जवाबदेही अब मीडिया पर आश्रित हो गई है?

    मीडिया की शक्ति का स्वागत है, लेकिन सिस्टम को मीडिया के बिना भी काम करना सीखना चाहिए। अन्यथा, न्याय और कार्रवाई केवल उन लोगों तक सीमित हो जाएगी जिनकी आवाज़ वायरल या टीवी पर पहुंच सके।

    पूरा मामला पढ़ने के बाद अब आपकी राय क्या है? क्या आपको भी लगता है कि स्कूलों पर लगाम लगेगी या ऐसे ही सिस्टम चलता रहेगा ?

    Shagun

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