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    Home»धर्म»Spirituality

    जानो तो बुद्ध की सहजता सबसे सहज वरना अति जटिल

    ShagunBy ShagunApril 30, 2026 Spirituality No Comments7 Mins Read
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    बुद्ध पूर्णिमा 1 मई विशेष : बुद्ध का स्वप्न स्व संप्रदाय नहीं था बल्कि एक ऐसे मनुष्य का निर्माण था जो स्वयं के भीतर के अंधकार को पहचान सके

    rahul guptaराहुल कुमार गुप्ता

    महात्मा बुद्ध की शांति कोई ठहरी हुई झील नहीं, बल्कि करुणा और बोध का वह अनंत महासागर है जिसकी लहरें हर उस हृदय को छूना चाहती हैं जो ईर्ष्या, द्वेष और संकीर्णता की अग्नि में जल रहा है। बुद्ध का होना दरअसल मनुष्यता का अपने चरम उत्कर्ष पर होना है। आज जब हम चारों ओर देखते हैं, तो पाते हैं कि धर्म के नाम पर समुदायों की ऊँची दीवारें खड़ी हो गई हैं, जहाँ इंसान कम और संप्रदाय के अनुयायी ज्यादा नजर आते हैं। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि जिस धर्म का जन्म ही संकीर्णताओं की बेड़ियाँ काटने के लिए हुआ था, वही आज स्वयं एक संकुचित पहचान बनकर रह गया है। बुद्ध, जैन और सनातन परंपराओं की जड़ें प्रकृति की मिट्टी में गहराई तक धंसी हुई हैं और इनमें वैज्ञानिकता का वह तत्व विद्यमान है जो तर्क को भी श्रद्धा में बदल देता है। किंतु प्रश्न यह उठता है कि इतना प्यारा, इतना सुलझा हुआ और इतना वैज्ञानिक दर्शन आखिर आम आदमी की पहुंच से दूर कैसे हो गया? क्यों एक ऐसा व्यक्ति जो प्रेम की साक्षात प्रतिमूर्ति था, आज केवल चित्रों और मूर्तियों में सिमट कर रह गया है?

    इसका सबसे बड़ा कारण धर्म का आचरण से फिसलकर प्रदर्शन की ओर मुड़ जाना है। बुद्ध ने कभी किसी संप्रदाय की स्थापना का स्वप्न नहीं देखा था। उनका स्वप्न था एक ऐसे मनुष्य का निर्माण जो स्वयं के भीतर के अंधकार को पहचान सके। लेकिन कालान्तर में हमने बुद्ध के विचारों को जीने के बजाय उन्हें पूजना शुरू कर दिया। जब हम किसी को पूजने लगते हैं, तो हम अनजाने में उसे अपने जीवन की वास्तविकताओं से बहुत दूर एक ऊंचे आसन पर बिठा देते हैं। हमने बुद्ध को भगवान बना दिया ताकि हमें बुद्ध न बनना पड़े। बुद्ध बनने के लिए जिस साहस, जिस आत्म-निरीक्षण और जिस कठिन त्याग की आवश्यकता थी, उससे बचने के लिए मनुष्य ने कर्मकांडों का सहारा ले लिया। धर्म जब केवल एक कम्युनिटी या मजहब की पहचान बन जाता है, तो वह इंसानियत के मूल धर्म को भूल जाता है। आज लोग बौद्ध, हिंदू या मुसलमान होने में गर्व महसूस करते हैं, लेकिन इंसान होने की उस प्राथमिक शर्त को भूल जाते हैं जिसमें दूसरे के दुख को अपना समझना अनिवार्य था। बुद्ध की शांति का आधार ही असीम प्रेम है, जहाँ स्व का विसर्जन होता है, जबकि आज के धर्म अक्सर स्व या अहंकार को और अधिक पुष्ट करते हैं।

    बौद्ध दर्शन के दूर होने का एक और कारण इसकी दार्शनिक जटिलता भी रहा। बुद्ध ने अपनी शिक्षाएं बहुत ही सरल और लोकभाषा में दी थीं, लेकिन उनके जाने के बाद विद्वानों ने उन्हें ऐसे क्लिष्ट शब्दों और गूढ़ सिद्धांतों में लपेट दिया कि साधारण हृदय उससे डरने लगा। जिस मध्यम मार्ग की बात बुद्ध ने की थी, वह बहुत ही व्यावहारिक था, लेकिन कालांतर में उसे केवल भिक्षुओं और विहारों की संपत्ति बना दिया गया। जब कोई दर्शन सामान्य गृहस्थ की रसोई और उसके संघर्षों से कटकर केवल मठों की चर्चाओं तक सीमित हो जाता है, तो वह धीरे-धीरे जनमानस की स्मृति से धुंधला होने लगता है।

    बुद्ध का दर्शन प्रकृति के नियमों पर आधारित था, जैसे बीज से वृक्ष बनता है, वैसे ही विचार से कर्म बनते हैं। इसमें कोई चमत्कार नहीं था, बल्कि शुद्ध कार्यकारण संबंध था। परंतु मानवीय चित्त हमेशा से चमत्कारों और रहस्यों का लोभी रहा है। उसे वह मार्ग कठिन लगता है जहाँ उसे खुद अपनी जिम्मेदारी उठानी पड़े। बुद्ध ने कहा था, ‘अप्प दीपो भव’, यानी अपना प्रकाश स्वयं बनो। यह आत्म-निर्भरता की पुकार थी, जो उन लोगों को रास नहीं आई जो धर्म को केवल सुरक्षा की एक छतरी समझते थे।

    इंसानियत को महत्व न देने वाला कोई भी धर्म या मजहब वास्तव में एक मानसिक विकार ही है, क्योंकि धर्म का अर्थ ही धारण करना है उन गुणों को जो हमें पशुता से ऊपर उठाकर देवत्व की ओर ले जाएं। बुद्ध, जैन और सनातन दर्शन में वैज्ञानिकता का समावेश इसलिए है क्योंकि ये बाहर की खोज के बजाय भीतर की प्रयोगशाला पर जोर देते हैं। आज का समाज जिस तनाव और ईर्ष्या के दौर से गुजर रहा है, वहां बुद्ध की प्रासंगिकता सबसे अधिक है, फिर भी वे सबसे दूर नजर आते हैं क्योंकि हमने अपनी आँखों पर स्वार्थ और आधुनिकता की ऐसी पट्टी बांध ली है जो केवल बाहरी चमक देखती है।

    बुद्ध का दर्शन सरल रूप से आत्मसात न होने का एक कारण यह भी है कि हम वर्तमान में जीना भूल गए हैं। बुद्ध का पूरा आध्यात्मिक ढांचा सति यानी जागरूकता पर टिका है। हम या तो बीते हुए कल की कड़वाहट में जी रहे हैं या आने वाले कल की काल्पनिक सुखद योजनाओं में। इस आपाधापी में वह शांत क्षण खो गया है जहाँ बुद्ध खड़े हैं। बुद्ध को पाने के लिए किसी हिमालय पर जाने की आवश्यकता नहीं थी, बल्कि अपने भीतर के शोर को शांत करना था, मगर हम बाहर का शोर इतना बढ़ा चुके हैं कि अपनी ही आत्मा की पुकार सुनाई नहीं देती। यह शानदार और तर्कसंगत दर्शन व्यवहार में काफी पीछे हो गया।

    जब धर्म को सत्ता और राजनीति का संरक्षण मिलता है, तो वह अपनी मौलिकता खोने लगता है। वह एक संस्था बन जाता है और संस्थाएं हमेशा अपने अस्तित्व को बचाने के लिए लड़ती हैं, सत्य को बचाने के लिए नहीं। बुद्ध का दर्शन एक बहती नदी की तरह था, जो हर घाट को भिगोती चलती थी, लेकिन जब उसे तालाबों में कैद किया गया, तो उसका पानी स्थिर हो गया। आज का मनुष्य जिस शांति की तलाश में भटक रहा है, वह शांति बुद्ध की आँखों में छिपी उस करुणा में है जो शत्रु के प्रति भी वैसी ही मैत्री रखती है जैसी अपने पुत्र के प्रति। बुद्ध ने सिखाया कि ईर्ष्या वह जहर है जिसे हम खुद पीते हैं और उम्मीद करते हैं कि सामने वाला मर जाए। यह क्या बात हुई! फिर भी हम इस जहर को अमृत मानकर पी रहे हैं क्योंकि हमारे धर्म केवल नाम के रह गए हैं, उनमें वह रूहानियत गायब है जो पत्थर को भी मोम कर दे।A Call for World Peace from Kushinagar: International Buddhist Conference 2026 Begins at Lord Buddha's Mahaparinirvana Site

    यदि हमें बुद्ध के उस अनमोल दर्शन को वापस अपने नजदीक लाना है, तो हमें धर्म की रूढ़िवादी परिभाषाओं से बाहर आना होगा। हमें समझना होगा कि बुद्ध कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि एक चेतना हैं जो हर उस इंसान के भीतर जाग सकती है जो सत्य के प्रति ईमानदार है। जब हम प्रकृति के करीब जाते हैं, जब हम किसी प्यासे को पानी पिलाते समय वही सुख महसूस करते हैं जो किसी प्रार्थना में मिलता है, तब हम बुद्ध के करीब होते हैं। बुद्ध का दूर होना हमारी संवेदनाओं का मरना है। वह सुलझा हुआ आध्यात्मिक व्यक्तित्व हमसे दूर नहीं हुआ है, बल्कि हम ही उलझनों के ऐसे मकड़जाल में फंस गए हैं कि हमें सरलता अब कठिन लगने लगी है। हम जटिलताओं के अभ्यस्त हो चुके हैं, इसलिए हमें बुद्ध की सहजता रास नहीं आती। धर्म को जब तक हम इंसानियत के विज्ञान के रूप में नहीं देखेंगे, तब तक हम समुदायों में तो बंटे रहेंगे, लेकिन उस असीम प्रेम की शांति से वंचित रहेंगे जो बुद्ध का असली प्रसाद है।

    बुद्ध की वापसी तभी संभव है जब हम धर्म को एक बौद्धिक विलास के बजाय एक जीते-जागते व्यवहार में तब्दील करें। यह दर्शन दूर इसलिए हुआ क्योंकि हमने इसे बुद्धि से समझा, हृदय से नहीं। बुद्धि हमेशा अंतर करती है, दीवारें चुनती है और तर्क देती है, जबकि हृदय केवल प्रेम करना जानता है। बुद्ध का हृदय इतना विशाल था कि उसमें पूरे ब्रह्मांड के दुखों के लिए जगह थी। आज हमें उसी विशालता की आवश्यकता है। हमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए अपने अंधविश्वासों की तिलांजलि देनी होगी और करुणा को ही अपना एकमात्र मजहब बनाना होगा। जब तक संसार में एक भी प्राणी दुखी है, बुद्ध का दर्शन अधूरा है, और उसे पूरा करने की जिम्मेदारी किसी एक समुदाय की नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता की है। जिस दिन इंसानियत धर्म के पाखंडों से ऊपर उठकर प्रेम के यथार्थ को स्वीकार कर लेगी, बुद्ध हमसे दूर नहीं, बल्कि हमारे हर सांस में बसे होंगे। वह असीम शांति, वह दिव्य आलोक और वह प्रकृति का संगीत हमारे भीतर फिर से गूंज उठेगा, और तभी यह धरती वास्तव में रहने योग्य बनेगी।

    Shagun

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