नवेद शिकोह
लखनऊ, 25 दिसम्बर 2018: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की ताकत वाली भाजपा का किला ढाहने के लिए भाजपा विरोधी दलों के बीच मनमुटाव के दिखावे के पीछे आपसी सामंजस्य छिपा हो सकता है। हाथी के उन दांतो की तरह जो कुछ खाने के और कुछ दिखाने के लिए होते हैं।
जिस तरह कभी-कभी बड़े कलाकार भी छोटे पर्दे पर महत्वपूर्ण किरदार निभाने पर राज़ी हो जाते हैं ऐसे ही कांग्रेस भी भाजपा की शिकस्त के लिए यूपी में वोट कटवा की छोटी पर अहम भूमिका के लिए राजी हो सकती है।
जातिगत समीकरणों में मजबूत सपा और बसपा का संभावित गठबंधन उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के साथ साइलेंट रणनीति में इस सूबे से भाजपा का सूपड़ा साफ करने की योजना पर काम कर रहा है। उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक सपा-बसपा और कांग्रेस के आलाकमान खामोशी से आपसी बातचीत जारी रखे हैं।

कांग्रेस यूपी में कम सीटों के लिए राजी नहीं हुई और सपा व बसपा मुखिया कांग्रेस को बेहद कम सीटें देने पर ही अड़े रहे। किंतु ये तीनों दल यूपी से भाजपा का सूपड़ा साफ करने के मिशन को मिलजुलकर अंजाम पर लाने के लिए एक दूसरे फार्मूले का विकल्प खोज लाये हैं। अमेठी और रायबरेली सीट छोड़ने के अलावा करीब सात-आठ सीटों पर कांगेस के साथ गठबंधन की फ्रेंडली फाइट होगी और यहां सपा-बसपा अपना नाम मात्र का डमी कैंडिडेट ही खड़ा करेगी। बाकी सभी सीटों पर कांग्रेस भाजपा को हराने के लिए वोट कटवा की भूमिका निभायेगी। इसके लिए कांग्रेस अपने अधिकांश सवर्ण प्रत्याशी मैदान में उतारेगी। ताकि भाजपा का खेल बिगड़ सके। चुनाव का रुख यदि दलित-पिछड़ा बनाम सवर्ण की दिशा में घूम जाये तो सवर्ण वोट बंट जाये।
ये बात सच है कि एंटीइंकम्बेंसी के बावजूद आज भी पिछड़ी जातियों का बीस से तीस प्रतिशत समाज और दस फीसद तक दलित समाज आज भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर विश्वास का रिश्ता कायम रखे है। इसके अलावा शिवपाल यादव की पार्टी यादव वोटों में सेंध लगाकर भाजपा का फायदा कर ही सकती है। इन सब की भरपाई के लिए ही यूपी की चुनावी गणित में सपा-बसपा गठबंधन कांग्रेस के जरिए भाजपा के पारंपरिक सवर्ण वोटों को बिखरने की कोशिश करेगी। इस साइलेंट गेम में कांग्रेस को राजी करने के लिए बसपा-सपा अपने थोड़े बहुत जनाधार वाले अन्य प्रदेशों में कांग्रेस के लिए रास्ते आसान करने का प्रस्ताव भी रख रही है।
यूपी की राजनीति और यहां के वोटरों की नब्ज समझने वाले विद्वानों का भी यही मानना है कि पिछले लगभग तीन दशकों से यूपी का हर चुनाव बारी-बारी धर्म या जाति पर आधारित रहा है। पिछले लोकसभा और विधानसभा के चुनाव धार्मिक ध्रुवीकरण की भेंट चढ़ा। इसबार खासकर यूपी में जाति की बयार बह सकती है। इसलिए यहां बसपा-सपा बनाम भाजपा की लड़ाई में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर होने की संभावना कम है।






