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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    स्वार्थ में सिमटे हुए सियासी सिद्धांत 

    By December 26, 2018 Current Issues No Comments5 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    राजीनीति में चुनावी मौसम के हिसाब से रंग बदलने वाले नेताओं की कमी नहीं है। ऐसे नेताओं के लिए स्वार्थ अहम हो जाते है, सिद्धांत पीछे हो जाते है। बात केवल राजनीति तक सीमित हों तो गनीमत है, लेकिन संविधान की भावना के प्रतिकूल आचरण अनुचित होता है। पंजाब के उपमुख्यमंत्री नवजोत सिद्धू, उत्तर प्रदेश में ओमप्रकाश राजभर और बिहार में उपेंद्र कुशवाहा के हाव भाव ऐसे ही रहे है। पंजाब में उपमुखमंत्री नवजोत सिंह सिद्धू भी प्रदेश कांग्रेस में बेगाने हो रहे है। सिद्धू  उपमुख्यमंत्री है, लेकिन उनका साफ कहना है कि वह कैप्टन अर्थात मुख्यमंत्री को नहीं जानते। उनके कैप्टन राहुल गांधी है। सिद्धू का यह बयान संसदीय व्यवस्था के खिलाफ है। सच्चाई यह है कि उन्हें प्रदेश कांग्रेस में कभी पसंद ही नहीं किया गया। उन्हें राहुल गांधी ने थोपा था। इधर पाकिस्तान के सेना प्रमुख को गले लगाने, इमरान की शान में कसीदे पढ़ने से पंजाब कांग्रेस ही नहीं वहां के लोग नाराज है।
    उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राजग में है। राजग बिहार में सत्तारूढ़ है। लेकिन वह सरकार पर हमला कर रहे है। यह भी अनुचित है। उत्तर प्रदेश के मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने तो हद पार कर ली है। ओमप्रकाश राजभर को अपने राजनीतिक जीवन का सर्वश्रेष्ठ मुकाम भाजपा के साथ ही आने के बाद मिला। लेकिन इस उपलब्धि ने ही इन्हें गलतफहमी का शिकार बना दिया है। इसे ये अपना करिश्मा मान बैठे है। ओमप्रकाश राजभर की पार्टी का प्रदेश में लोग ठीक से नाम भी नहीं जानते थे। वह खुद भी कभी चुनाव नहीं जीते थे। बसपा में रहे, तब वहां इन्हें बोलने तक का भी अधिकार नहीं था।
    भाजपा से गठबन्धन किया, इसके बाद इनकी पार्टी चार विधानसभा क्षेत्रों में जीत मिली। ओमप्रकाश को कैबिनेट में जगह मिली। लेकिन इन्होंने गठबन्धन धर्म और संविधान की भावना का कभी पालन नहीं किया। ये अपनी ही सरकार पर लगातार हमला बोलते है, कैबिनेट के निर्णयों के बाहर विरोध करते हैं। यह संविधान की व्यवस्था के प्रतिकूल आचरण है। भारतीय संविधान में संसदीय शासन व्यवस्था है। इसमें मंत्रिमंडल सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना से कार्य करता है। ओमप्रकाश राजभर इसी व्यवस्था का उल्लंघन कर रहे है।
    इसी प्रकार वह गठबन्धन धर्म का भी निरादर कर रहे है। उन्हें सभी कमियां भाजपा में ही नजर आती है। जिसके साथ गठबन्धन है, उसी के साथ वह विरोधियों जैसा व्यवहार कर रहे है।
    उपेंद्र कुशवाहा पर चुनावी आहट का असर हुआ है। वह राजग को छोड़ कर यूपीए में चले गए है। साढ़े चार वर्ष तक वह अच्छे भले थे। राजग में उन्हें कोई कठिनाई नहीं थी। कुछ समय से उन्होंने राजग की दूसरी सहयोगी जेडीयू पर हमला बोलना शुरू कर दिया था। उनकी पार्टी में अकेले चुनाव लड़ने साहस नहीं है। इसलिए दूसरे गठबन्धन का दामन थाम लिया।
    दबाब के तहत उन्होंने शिक्षा सुधार के लिए बड़ा मांगपत्र पेश कर दिया था। कहा था कि मुख्यमंत्री और जेडीयू अध्यक्ष इसे माने तब वह राजग में रहेंगे। उनकी इस चाल को समझना कठिन नही था। जेडीयू उनकी शर्ते माने तो यह सन्देश जाएगा कि शिक्षा की चिंता केवल उपेंद्र को है, सरकार को नहीं। इसका हास्यस्पद पहलू यह है कि शर्ते न मानी गई तो क्या उपेंद्र राजद से समझौता करेंगे। जिसके एजेंडे में शिक्षा कभी महत्वपूर्ण नहीं रही।
     उपेंद्र कुशवाहा ने शिक्षा सुधार का कोई विषय छोड़ा नहीं था। उनकी मांग है कि आयोग के जरिये शिक्षको की  बहाली, पारदर्शी चयन , नियुक्ति, पुर्नमूल्यांकन, राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद के निर्धारित मानको पर शिक्षको की बहाली, प्राथमिक विद्यालयो में  विज्ञान के शिक्षक की तैनाती, उर्दू शिक्षको की  नियुक्ति, शिक्षको को गैर-शैक्षणिक कार्यो से पूर्णत मुक्त रखा जाये, सभी स्कूलो में छात्र-शिक्षक के लिए बायोमेट्रीक व्यवस्था, प्रयोगशाला और पुस्तकालय की व्यवस्था मिड डे मील से शिक्षको को दूर रखा जाय, सत्र शुरू होने से पहले छात्रों को पुस्तक मिले,प्राईवेट स्कूल की मनमानी पर रोक, छात्र संघ का चुनाव समय पर हो राज्य से बाहर पढ़ने वाले एसटी एससी,पिछड़ा,अतिपिछडा को छात्रवृत समय पर मिले, मदरसा का आधुनिकीकरण अविलंब हो। लोक समता पार्टी  ने इन मांगों को दबाब के रूप में पेश किया है।
    बिहार के शिक्षा मंत्री कृष्ण नंदन वर्मा ने कहा कि सुझाव पारी खत्म होने के बाद, मेंडेटरी ओवर्स में आए हैं। वह केन्द्र से कोई अतिरिक्त फंड नहीं पा सकते हैं और न ही अब किसी परियोजना की मंजूरी दिला पाने में सक्षम हैं। अगर वे शिक्षा में सुधार के लिए सुझाव लेकर पहले आते तो बेहतर होता।यह भी कहा गया कि  कम से कम केन्द्रीय मंत्री यह सावधानी रखते कि मसौदा वर्तनी की गलतियों और व्याकरण संबंधी त्रुटियों से भरा न हो। कुशवाहा ने इस संबंध में शनिवार की रात को एक स्थानीय समाचार चैनल से बातचीत के दौरान यह बयान दिया था।
    कुशवाहा ने पहले सीटों के बंटवारे को लेकर तीस नवम्बर तक का अल्टीमेटम दिया था। लेकिन एक महीने बाद  फिर  कहा कि यदि बिहार की सरकार मेरे  मांग पत्र पर काम किये जाने का आश्वासन देती है तो मैं सब कुछ माफ करने और भूलने के लिए तैयार हूं। शिक्षा मंत्री ने कहा कि बिहार शिक्षा के दो मॉडल का गवाह रहा है। एक लालू प्रसाद के चरवाहा विद्यालय था। एक अन्य मॉडल नीतीश कुमार का है जिन्होंने आईआईटी पटना, नालंदा विश्वविद्यालय और चाणक्य लॉ कॉलेज जैसे संस्थानों को बनाया। यह सही है कि बिहार की शिक्षा व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है। लेकिन उपेंद्र कुशवाहा के मांग पत्र में नेकनीयत का अभाव था। इसमें राजनीति ज्यादा थी। ओमप्रकाश राजभर, उपेंद्र कुशवाहा, नवजोत सिद्धू आदि कई उदाहरण है। ऐसे नेताओं के अपने निहित स्वार्थ होते है। इनके लिए इन्हें सिद्धांतो की अवहेलना में संकोच नहीं होता।

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