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    बशीर बद्र: शेरों का बादशाह, फिर भी विदाई में सूना सन्नाटा, सही कह गए थे – ये मतलबों के सलाम थे

    ShagunBy ShagunMay 30, 2026Updated:May 30, 2026 ब्लॉग No Comments3 Mins Read
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    Bashir Badr: King of Lions, Farewell That desolate silence—he was right when he said it: these were salutations born of self-interest.
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    इतने मशहूर शायर का यह हाल? कोरोना तो कहीं चल नहीं रहा है। कल भोपाल में मशहूर उर्दू शायर बशीर बद्र की अंतिम यात्रा निकली। सोशल मीडिया पर खबर है कि उनके जनाज़े में महज़ 20 से 50 लोग शामिल हुए। जिस शायर के शेर दशकों से लाखों-करोड़ों लोगों की ज़ुबान पर रहे, जिनकी ग़ज़लों ने प्यार, दर्द और जिंदगी की सच्चाइयों को आम आदमी की बोली में उतारा, उन्हें ऐसी गुमनाम-सी विदाई मिली। यह दृश्य सोचने पर मजबूर कर देता है।

    भोपाल को साहित्य और संस्कृति का गढ़ माना जाता है। यहां लेखक, कवि, शायर, पत्रकार और कलाकारों की भरमार है। फिर सवाल उठता है – इतने साहित्यकारों में से कितनों को लगा कि इस मौके पर वहां होना उनकी ज़िम्मेदारी है? कितने पहुंचे? भोपाल मध्य प्रदेश की राजधानी भी है। यहां राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता, नेता और प्रभावशाली लोग रहते हैं। अगर हम बीजेपी पर मुसलमानों या उनके नायकों के प्रति उपेक्षा का आरोप लगा दें, तो बाकी दल क्या जवाब देंगे? क्या साहित्य और संस्कृति किसी एक समुदाय या विचारधारा की संपत्ति है?

    दरअसल, बशीर साहब पिछले कई सालों से डिमेंशिया (अल्जाइमर जैसी बीमारी) से जूझ रहे थे। इस वजह से वे धीरे-धीरे सामाजिक अलगाव का शिकार हो गए। लोग आना-जाना लगभग बंद कर चुके थे। यादों में वे ज़िंदा थे, लेकिन ‘काम के’ नहीं रह गए थे। इसलिए शायद कई लोगों ने सोचा कि अब क्या फायदा?

    यानी बशीर बद्र सही फरमा गए थे – “ये मतलबों के सलाम थे।”

    यह घटना सिर्फ एक शायर की अंतिम विदाई नहीं है। यह हमारे समाज की स्मृति, कृतज्ञता और मूल्यों की परीक्षा है। जब कोई कलाकार चरम पर होता है, तो मुशायरों में तालियां गूंजती हैं, सोशल मीडिया पर पोस्ट वायरल होते हैं। लेकिन जब वही शख्स बीमार, बेबस और ‘उपयोगी’ नहीं रह जाता, तो चुप्पी छा जाती है।

    बशीर बद्र जैसे शायर अमर होते हैं। उनके शेर “उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो…” आज भी गूंजते हैं। लेकिन यह घटना हमें याद दिलाती है कि साहित्य की असली इज्जत सिर्फ शेरों को याद रखने में नहीं, बल्कि शायर को इंसान के रूप में सम्मान देने में है – खासकर जब वह हमारी यादों का सहारा बन चुका हो।

    भोपाल और पूरे साहित्यिक समाज को इस पर गंभीरता से सोचना चाहिए। क्या हम सिर्फ सफलता के समय के साथी हैं, या सच्चे श्रद्धांजलि देने वाले भी? बशीर बद्र जा चुके हैं, लेकिन उनका सवाल हम सब पर छोड़ गए हैं – क्या हमारी यादें भी मतलब पर टिकी हैं?

    खूबसूरत हैं बहुत रास्ते खो जाऊंगा
    मुझे नींद जहां आएगी सो जाऊंगा
    मुद्दत से इसी ज़िद में छिपा बैठा हूँ
    चाँद मुझे खुद लेने आएगा तो जाऊंगा।

    – बशीर बद्र साहब

    #bashirbadr #RIP #बशीर_बद्र #bashirbadrpoetry #Shayar
    Shagun

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