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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    महागठबन्धन के निष्प्रभावी मुद्दे

    By January 21, 2019 Current Issues No Comments7 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    कोलकत्ता की विपक्षी का वास्तविक महत्व केवल तृणमूल कांग्रेस के लिए था। ममता बनर्जी ने इसकी सफलता के लिए अपनी पूरी सरकार लगा दी थी। कहने को बीस पार्टियों की भागीदारी हुई। लेकिन इनमें से किसी का भी पश्चिम बंगाल की राजनीति महत्व नहीं है। ऐसे में रैली का पूरा इंतजाम ममता बनर्जी ने अपने लिए किया था। उन्होंने एक तीर से दो निशाने साधने के प्रयास किया। पहला तो वह अपनी पार्टी का चुनाव प्रचार शुरू करना चाहती थी। इसके लिए भीड़ जुटाई गई। दूसरा यह कि वह सम्भावित महागठबन्धन में अपना नेतृत्व आगे बढ़ाना चाहती थी।
     ममता बनर्जी को अपने उद्देश्य में कितनी सफलता मिली ,यह तो भविष्य में पता चलेगा। लेकिन यह साफ हुआ की विपक्षी पार्टियों ने जो मुद्दे उठाए उनका कोई प्रभाव नहीं हुआ। इनके कारण रैली में कई बार हास्यस्पद स्थिति बनी। इन नेताओं को इससे सबक लेना चाहिए। वह जिन मुद्दों के बल पर भाजपा को हटाना चाहते है, उनका जनमानस पर कोई असर नहीं पड़ रहा है।
     रैली में अनेक बार हास्यस्पद स्थिति बनी। लेकिन इसकी गम्भीरता विश्लेषण का विषय है।
    रैली में हार्दिक पटेल ने नारा लगवाया की सुभाष लड़े थे गोरों से हम लड़ेंगे चोरों से, उन्होंने लोगों से नारा दोहराने को कहा। लेकिन भीड़ में कोई उत्साह नहीं दिखा।
    यह शर्मिदगी केवल हार्दिक के लिए नहीं थी। विपक्ष में राहुल गांधी से लेकर नीचे तक सभी नेता इसी अभद्र भाषा का प्रयोग कर रहे है। लेकिन आमजन इसे पसंद नहीं कर रहा है।
    दूसरी बात यह कि आरोप लगाने वाले है कौन। हार्दिक पटेल को गुजरात के पाटीदारों ने ही अलग कर दिया है। उनपर आंदोलन के लिए जुटाए गए धन से अय्यासी का आरोप है। यह आरोप उनके साथ रहे लोग ही लगा रहे हैं।
    यही हार्दिक दूसरों को चोर बताएंगे तो कौन है जो उन्हें ईमानदार मान लेगा। राहुल गांधी स्वयं घोटाले के आरोप में पेरोल पर है। अभिषेक मनु सिंधवी इस रैली में उनका प्रतिनिधित्व कर रहे थे। उनकी ही छवि कौन बड़ी अच्छी है।
    राफेल पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय बिल्कुल स्पष्ट है। इस के बाद विपक्ष द्वारा इसे उठाना निंदनीय ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट की अवमानना भी है। कोयला घोटाले पर तत्कालीन सचिव को सजा मिल। मनमोहन सिंह के कार्यकाल में दिए गए आवंटन कोर्ट ने गलत मान कर रद किये, फिर भी मनमोहन सिंह ,सोनिया गांधी महान है, लेकिन जिस राफेल के दाम और प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट ने सही माना, उसके लिए प्रधानमंत्री को  चोर बताया जा रहा है। विपक्ष के नेता शायद आमजन को मूर्ख समझ रहे है, उन्हें लग रहा है कि वह जो कहेंगे उसे मान लिया जाएगा। यह गलतफहमी कोलकत्ता रैली से दूर हो जानी चाहिए। रैली में गरजने वाले अनेक नेता और उनके परिजन ऐसे ही आरोपो का सामना कर रहे है।
    दूसरी बिडंबना देखिये, ये अभी तक ईवीएम में अटके है। अभी तीन राज्यों में कांग्रेस जीती, कुछ दिन पहले कर्नाटक में सरकार बनी, उत्तर प्रदेश में प्रतिष्ठित मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री द्वारा रिक्त लोकसभा सीट पर विपक्ष को जीत मिली, फिर भी ईवीएम में गड़बड़ी का राग चल रहा है। यह मुद्दा भी हास्यस्पद हो गया है। निर्वाचन आयोग ने जब इन्हें चुनौती दी थी, ये सभी दहाड़ने वाले नेता भाग खड़े हुए थे।
    इसी प्रकार देश को तोड़ने, संविधान को समाप्त करने, संस्थाओं को नष्ट करने, कुछ अमीरों के लिए कार्य करने के आरोप भी बकवास बन कर रह गए है।
    क्षेत्रीय पार्टियों की वास्तविक भूमिका चुनाव परिणाम आने के बाद शुरू होती है। उसके पहले महारैली का राष्ट्रीय स्तर पर कोई फायदा नहीं मिलता। इतना अवश्य है कि मुख्य आयोजक अपना प्रचार खूब कर लेते है।
    पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने रैली से कई दिन पहले अपनी पार्टी का खूब प्रचार किया। इसमें उन्हें अपरोक्ष रूप से म्हाघटबन्धन का नेता और भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया गया। इस तरह ममता ने अपना कार्य कर लिया। कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों को उन्होंने हाशिये पर रखा।
    फिर भी बिडंबना देखिये कांग्रेस के मल्लीकार्जुन खड़गे और अभिषेक मनु सिंधवी रैली में पहुंच गए।
    महागठबन्धन की दशा भी रोचक है। कहा गया कि बीस से ज्यादा दल इसमें शामिल हुए। उन की स्थिति पर गौर करिए। उत्तर प्रदेश में सपा बसपा ने लोकदल और कांग्रेस दोनों को अपमानित किया है। लोकदल नेता जयंत चौधरी भी नरेंद्र मोदी को हटाने के लिए पहुंचे थे। सपा और बसपा दोनों कांग्रेस पर हमला बोल रहे है, इस मंच पर ये साथ थे।
    मायावती अपने नेतृत्व के लिए सजग है। उन्होंने ममता बनर्जी से इसीलिए दूरी बना कर रखी। सतीश चंद्र मिश्र को भेजना औपचारिकता का निर्वाह मात्र होता है। यहाँ भी मायावती ने अखिलेश को पीछे छोड़ दिया। जिस रैली में उन्हें ठीक नहीं लगा , उसमें अखिलेश शामिल हुए। शरद यादव ने कई बार बोफोर्स घोटाले को उठाकर रैली को ही हास्यस्पद बना दिया।
     यह सन्योग था कि कोलकाता में जब विपक्षी रैली चल रही थी उसी समय नरेंद्र मोदी दादरा एवं नगर हवेली की राजधानी सिलवासा में विपक्ष के हमलों की धज्जियां उड़ा रहे थे। मोदी ने विरोधी दलों को मानव विरोधी बताते हुए कहा कि विपक्षी गठबंधन मेरे खिलाफ नहीं, बल्कि यह देश के लोगों के खिलाफ है। अभी तो ये सही से इकट्ठी भी नहीं हुए हैं, लेकिन उससे पहले ही ये सीट बंटवारे को लेकर मोल भाव में लग गए हैं। ये खुद को बचाने के लिए समर्थन मांग रहे हैं, लेकिन मुझे देश को आगे ले जाने के लिए आपका समर्थन चाहिए।
    जाहिर है कि मुद्दों और नेतृत्व के मुद्दे पर विपक्षी पार्टियों की कमजोरी ही उजागर हुई है। इस कमजोरी में इनका दहाड़ना ही हास्यस्पद स्थिति को प्रदर्शित कर रहा था। इनके डायलॉग दिलचस्प थे। किसी ने कहा कि इस रैली के बाद मोदी जी का नींद टूट जाएगी। हमारी अनेकता में एकता है। हम सब मिलकर देश को तरक्की की राह पर ले जाने का काम करेंगे। किसी ने कहा कि यह चुनाव फिर से लोकतंत्र को स्थापित करने के लिए है, संविधान को बचाना है, सेक्यूलर उसूलों को जिंदा रखना है तो हम सबको एक होना होगा, आज बेरोजगरी बढ़ रही है, किसानों और दलितों पर हमले बढ़ रहे हैं। कोई बोला कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने देश का कबाड़ा कर दिया। देश की जनता अब इस जोड़ी से परेशान हो चुकी है। लेकिन रैली से लगा कि सर्वाधिक परेशान विपक्षी नेता हैं।
    मायावती के प्रतिनिधि अपने नम्बर बढ़ाने आये थे। वह बोले कि बाबा साहब अंबेडकर के विचारों को बचाने के लिए हमें केंद्र की सरकार को उखाड़ फेंकना होगा। किसी ने कहा कि देश की आजादी किसान, व्यापार, खतरे में हैं। अघोषित इमरजेंसी है। इतना बोलने वालों को भी इमरजेंसी नजर आ रही है। इमरजेंसी घोषित करने वाली कांग्रेस के नेता मंच पर मौजूद थे। एक नेता दहाड़े देश संकट में है, किसान तबाह है, नौजवान बर्बादी की कगार पर है। दुकानदारों का व्यापार जीएसटी के चलते बंद है। नोटबंदी की वजह से देश की अर्थव्यवस्था बारह वर्ष पीछे चली गई। एक भी ऐसी संस्था नहीं बची है, जिसे केंद्र में वर्तमान सरकार ने नष्ट नहीं किया गया हो। नेता जी यह नहीं बता सके कि कौन सी संस्था बर्बाद हो गई। जीएसटी से बन्द हुई दुकान भी कहीं दिखाई नहीं देती। नोटबन्दी से देश आगे निकल चुका है। देवगौड़ा को प्रधानमंत्री पद छोड़ने पर कांग्रेस ने ही विवश किया था। अब उनके पुत्र कांग्रेस के दबाब में रो रहे है। यहां देवगौड़ा एकता की पैरवी कर रहे थे।  विपक्ष इन्हीं घिसे पिटे मुद्दों पर मोर्चा खोल रहा है।
    सपा नेता आजम खान ने इस रैली पर बेबाक टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि रैली का जो संदेश जाना चाहिए वह नहीं गया। कई दलों के नेता जुटे और राजनीतिक बहस हुई, लेकिन देश को कहां ले जाया गया और कहां ले जाना चाहिए और देश में क्या हालात हैं इस पर चर्चा नहीं हुई। अल्पसंख्यक समाज की नुमाइंदगी रैली में जितनी होनी चाहिए वह नहीं थी। बारह वर्ष पूर्व बनी सच्चर कमेटी की रिपोर्ट यह बताती है कि हालत काफी खराब है। रैली में नजरअंदाजी से अल्पसंख्यक समुदाय में मायूसी है। आजम का बयान अंतर्विरोध की बानगी है

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