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    Home»इंडिया

    मोदी लहर में ध्वस्त हुए जातिवादी समीकरण

    By May 28, 2019 इंडिया No Comments5 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    दो हजार चौदह में नरेंद्र मोदी ने सबका साथ सबका विकास का नारा दिया था। प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने इस नारे को नीति में बदल दिया। पांच वर्ष तक उनकी सरकार इसी रास्ते पर आगे बढ़ती रही। उनकी लोककल्याणकारी योजनाओं में सबका विकास समाहित था। इस तरह पांच वर्ष पहले ही नरेंद्र मोदी की कमान में भाजपा ने चुनाव में जातिवाद का प्रभाव कमजोर कर दिया था। भाजपा को सभी वर्गों का समर्थन मिला था। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी यही क्रम जारी रहा। लेकिन जातिवाद और परिवारवाद पर आधारित पार्टियां इस तथ्य को समझ नहीं सके। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ही कई प्रदेशों में योजनाबद्ध ढंग से जातिवादी आंदोलन शुरू किए गए।
    यह केवल सन्योग नहीं था कि ऐसे कई जातिवादी नेता कांग्रेस में शामिल हो गए। गुजरात में चले पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल को कांग्रेस ने प्रचार हेतु पूरी सुविधा उपलब्ध कराई थी। बिहार में एम वाई समीकरण का ऐलान करने वाली राजद से कांग्रेस का गठबन्धन था। इसमें उपेंद्र कुशवाहा, शरद यादव, जीतनराम मांझी भी शामिल हो गए। उत्तर प्रदेश में सपा बसपा का गठबन्धन भी समीकरण के हिसाब से हुआ था। ये सारे समीकरण सांख्यकी के फार्मूले से बनाये गए थे। ये समझ ही नहीं सके कि गरीबों के लिए चलाई गई योजनाओं से करोड़ो लोग सीधे लाभान्वित हो रहे है। इनमें सभी जाति वर्ग के लोग शामिल थे। इन्होंने जातिवादी नेताओं की बातों पर विश्वास ही नहीं किया।
    इसी के साथ वोट ट्रांसफर का भ्रम भी मोदी लहर ध्वस्त हो गया। अपना वोट दूसरी पार्टी में ट्रांसफर कराने का मिथक बसपा के साथ प्रारंभ से जुड़ा है। इस पार्टी को कई बार इस बात का रंज भी हुआ। उसका कहना था कि उसने अपना वोट गठबन्धन में शामिल पार्टी को ट्रांसफर करा दिया, लेकिन बदले में उसे कुछ हासिल नहीं हुआ।
    लेकिन इस आम चुनाव में बसपा के साथ जुड़ा यह मिथक दूर हो गया। उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा के बीच गठबन्धन हुआ था। यह बेमेल गठबन्धन बसपा के लिए वरदान साबित हुआ। लोकसभा में वह शून्य से दस पर पहुंच गई। मतलब कई क्षेत्रों में सपा का वोट बसपा को मिला। इसके विपरीत गठबन्धन का खामियाजा सपा को भुगतना पड़ा। पिछली लोकसभा में उसके सात सदस्य थे, इस बार पांच रह गए। इसका मतलब है कि बसपा को वोट सपा में ट्रांसफर नहीं हुआ।
    आजमगढ़ और मैनपुरी तो सपा ने पिछली बार अकेले लड़ कर जीती है। कन्नौज में बसपा समर्थकों ने सपा का सहयोग किया होता, तो शायद डिम्पल यादव पराजित नहीं होती। गठबन्धन के समय दावा तो यही किया गया था। इन पार्टियों के शीर्ष नेता बहुत उत्साहित थे। जाति मजहब के आंकड़ों के आधार पर वह भाजपा के सफाये का दावा कर रहे थे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। राष्ट्रीय लोकदल तो उस घड़ी को कोस रहा है जब उसने सपा बसपा गठबन्धन में शामिल होने का निर्णय लिया था। जाहिर है कि गठबन्धन का पूरा लाभ बसपा को हुआ। अन्य दोनों पार्टियों को नुकसान उठाना पड़ा है। यह नुकसान केवल सीट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सिद्धांतो तक विस्तृत है।
    लोकसभा और विधानसभा में सपा बड़ी पार्टी रही है। लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे समझौते के लिए बसपा बिल्कुल भी उत्साहित नहीं है। बसपा प्रमुख ने साफ कहा था कि राजनीति में  न वह किसी की बुआ है, न कोई उनका भतीजा है। यदि उनकी पार्टी को सम्मानजनक सीट मिलेगी तभी वह समझौता करेंगी। बसपा प्रमुख का यह कथन सुनियोजित रणनीति का हिस्सा था। दलीय स्थिति में पीछे होने के बाबजूद वह गठबन्धन की कमान अपने नियंत्रण में रखना चाहती थी। वह सपा प्रमुख से मिलने एक बार भी नहीं गई, वार्ता के लिए उन्होंने कई बार बुलाया था।
    बताया जाता है कि सपा प्रमुख कांग्रेस को भी गठबन्धन में शामिल करना चाहते थे, लेकिन बसपा इसके खिलाफ थी। अंततः कांग्रेस को शामिल नहीं किया गया। सपा संस्थापक के लोकसभा में दिया गया बयान भी खूब चर्चित हुआ। इससे यही सन्देश गया कि आएगा तो मोदी ही।
    उन्होंने कहा था कि वह चाहते हैं कि नरेंद्र मोदी फिर से देश के प्रधानमंत्री बनें। हम लोग तो बहुमत से नहीं आ सकते हैं, नरेंद्र मोदी  फिर  प्रधानमंत्री बनें। प्रधानमंत्री जी आपने भी सबसे मिलजुल करके और सबका काम किया है। हम जब जब मिले, किसी काम के लिए कहा तो आपने उसी वक़्त आर्डर किया।  मोदी में सबको साथ लेकर चलने की क्षमता है। ऐसे ही व्यक्ति को दुबारा प्रधानमंत्री बनना चाहिए। इस भाषण ने भी एक हद तक अपना असर दिखाया था। बसपा जब लोकसभा में शून्य पर थी, तब उसने गठबन्धन में अपनी हनक कायम रखी। अब तो उसके पास सपा के मुकाबले दोगुने ज्यादा सदस्य है।
    जाहिर है कि सपा और बसपा ने अपना वजूद बनाने के लिए गठबन्धन किया था। भविष्य की कोई योजना पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया। सपा ने पिछली बार की तरह अपने कार्यों की चर्चा नहीं की। शायद उसे यह लगा हो कि बसपा नाराज न हो जाये।  इसके अलावा शिखर पर तो दोनों पार्टियों की दोस्ती हो गई। लेकिन जमीन पर ऐसा खुशनुमा माहौल नहीं बन सका। डेढ़ दशक तक दोनों के बीच तनाव रहा। इनके लिए यह सब भूल जाना मुश्किल था। इस तरह वोट ट्रांसफर कराने का मिथक भी टूट गया। यह अध्याय पुराना पड़ चुका है।

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