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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    गरीबों के प्रति समर्पित सरकार का संकल्प

    By May 30, 2019 Current Issues No Comments4 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    कार्ल मार्क्स ने समाज को दो वर्गों में विभक्त बताया था। इनमें एक है गरीब और दूसरा है अमीर। उसने गरीब लोंगों को सर्वहारा व शोषित बताया, इसी के साथ धनी लोगों को शोषक के रूप में चित्रित किया। मार्क्स का चिंतन यहीं तक सीमित नहीं था। वह इन दोनों वर्गों में वैमनस्य देखता है। दोनों के बीच तनाव रहता है। इसे उसने वर्ग संघर्ष का नाम दिया। इतिहास का वह वर्ग संघर्ष और भौतिक  आधार पर आकलन करता है। उसने यह भी कहा कि एक दिन यही सर्वहारा वर्ग शोषक लोगों को हटा देगा। मजदूर वर्ग का शासन स्थापित होगा। मार्क्स के इसी विचार को सर्वप्रथम रूस में क्रियान्वित किया गया। हिंसक क्रांति के बल पर कम्युनिस्ट शासन स्थापित हुआ। हिंसक क्रांति का यह सिलसिला कई अन्य देशों में चला। इन सभी में सर्वहारा वर्ग की जगह कम्युनिस्ट पार्टी की तानाशाही स्थापित हुई। गरीबों की दशा में कोई सुधार नहीं हुआ। कम्युनिस्ट पार्टी के नेता नए शोषक बन गए।
    इसके अलावा कार्ल मार्क्स ने धर्म को अफीम बताया था। उसके अनुसार शोषक वर्ग वंचितों को धर्म की दुहाई देकर भाग्यवादी बना देते है। जबकि मार्क्स दोनों वर्गों में नफरत को अनिवार्य मानता था।
    नरेंद्र मोदी ने कार्ल मार्क्स के इस विचार में सुधार किया। उन्होंने वर्ग संघर्ष की जगह वर्ग सहयोग का सिद्धांत प्रतिपादित किया। मार्क्स ने केवल विचार प्रस्तुत किये थे। उन पर अमल नहीं किया था, स्वयं उनका क्रियान्वयन नहीं किया था। जबकि नरेंद्र मोदी ने वर्ग सहयोग का विचार बाद में प्रस्तुत किया, उसका क्रियान्वयन वह पिछले कई वर्षों से कर रहे है।
    भाजपा के राष्ट्रीय मुख्यालय में उन्होंन कहा कि समाज में केवल दो जाति या वर्ग है। एक है वंचित या गरीब वर्ग,और दूसरा धनी वर्ग। यहां तक कार्ल मार्क्स और नरेंद्र मोदी का विचार एक है। इसके बाद मार्क्स दोनों में संघर्ष अपरिहार्य मानता है। मोदी कहते है कि दूसरा अर्थात सक्षम वर्ग की जिम्मेदारी यह है कि वह वंचित वर्ग को गरीबी से ऊपर लाने में सहयोगी बने। इस तरह मोदी शासन, राजनीतिक पार्टियों और धनी वर्ग सभी की जिम्मेदारी तय करते है। नरेंद्र मोदी के शासन का यही आधार भी रहा है। उन्होंने अपने की तो फकीर ही माना है। इसी लिए कहा कि देश के लोगों ने इस फकीर की झोली भर दी है।  नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार को गरीबों के प्रति समर्पित रखा है। पचासों लोक कल्याणकारी योजनाएं इसका प्रमाण है।
    भारत के कम्युनिस्ट नेताओं को मजबूरी में प्रजातांत्रिक व्यवस्था स्वीकार करनी पड़ी। इसके अलावा उनके सामने अपनी राजनीति चलाने का कोई विकल्प भी नहीं था।
    धर्म को अफीम मानने के विचार को इन्होंन भारत में केवल हिन्दू धर्म पर लागू किया। ये मजहबी वोटबैंक की राजनीति करने लगे। इस सियासत को इन्होंन धर्मनिर्पेक्षता का नाम दिया।
            लेकिन नरेंद्र मोदी ने इस विचार में भी सुधार किया। उन्होंने सबका साथ सबका विकास की नीति को कथित धर्मनिरपेक्षता का विकल्प बनाया। यह बता दिया कि देश के मुसलमान वोटबैंक नहीं है। वह भी इंसान है।  उनके जीवन की भी मूलभूत आवश्यकताएं है। सरकार का दायित्व है कि वह सभी का जीवन स्तर उठाने का प्रयास करे। यही सेक्युलरिज़्म है। मोदी की यह नीति प्रभावी और लोकप्रिय रही। इसका असर राजनीति पर भी दिखाई दिया। वोटबैंक की राजनीति करने वाले दलों को मतदाताओं ने सबक सिखाया है।
    मोदी ने चुनाव परिणाम आने के बाद दिल्ली भाजपा कार्यालय में सभा को संबोधित करते हुए यही तथ्य रखे। कम्युनिस्ट पार्टी ने धर्म को अफीम कहा, लेकिन इसकी जगह व्यक्ति पूजा की शुरुआत की। लेनिन, स्टॅलिन,माओ आदि व्यक्ति पूजा के प्रतीक बनाये गए। मोदी ने सीधे तौर पर इस संबन्ध में टिप्पणी नहीं की, लेकिन महाभारत का प्रसंग उठाकर आस्था अवश्य प्रकट की। उन्होंन महाभारत के बाद का प्रसंग सुनाया, पांडव जीत चुके थे। लेकिन कहा यह गया कि कोई पक्ष न जीता है, न कोई हारा है, बल्कि हस्तिनापुर जीता है। इसी प्रकार अभी हुए आमचुनाव में भी भारत जीता है।
    नरेंद्र मोदी ने भारत की इसी जीत को आगे बढ़ाया। कहा कि इस चुनाव ने चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं की भी सराहना होनी चाहिए, जिसने निष्पक्ष चुनाव कराने की अपनी जिम्मेदारी का बखूबी निर्वाह किया। मोदीं का यह तथ्य विरोधियों के चुनाव आयोग व ईवीएम पर हमले के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। उन्होंन अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से शालीनता के साथ जीत को स्वीकार करने का आह्वान किया। कहा कि जनसमर्थन अधिक मिलने से जिम्मेदारी भी बढ़ी है, उसी के अनुरूप सत्ता पक्ष को नम्रता दिखानी होगी। इस कथन का अपरोक्ष सन्देश विपक्षी पार्टियों के लिए भी है। उन्हें अपनी पराजय शालीनता से स्वीकार करनी चाहिए, चुनाव आयोग की गरिमा बनाये रखनी चाहिए, अपनी नाकामी के लिए चुनाव आयोग को दोष देने से बचना चाहिए। इसी में संविधान का सम्मान है।

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