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    मैं ईश्वर की शपथ लेता हूं

    By May 30, 2019 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    नरेंद्र मोदी के प्रत्येक कार्य में कोई न कोई सन्देश छिपा होता है। शपथ ग्रहण समारोह के माध्यम से भी उन्होंने अंतरराष्ट्रीय व आंतरिक राजनीति के सन्देश दिए है। पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा के शिकार हुए कार्यकर्ताओं के परिजनों को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया। मोदीं जानते थे कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इसका विरोध करेंगी। तीर निशाने पर लगा। ममता बनर्जी ने इन परिवारों को आमंत्रित करने के विरोध में शपथ ग्रहण समारोह का बहिष्कार कर दिया। मोदी जो सन्देश देना चाहते थे, वह पूरा हुआ। ममता बनर्जी अपने ही प्रदेश के कई पीड़ित परिवारों के विरोध में दिखाई देने लगी। सन्देश यह गया कि ममता को इन परिवारों को मिल रहा सम्मान बर्दास्त नहीं है।
    शपथ ग्रहण समारोह में ममता के न आने का यह सन्देश गया। वह अपने ही प्रदेश के विरोध में कदम उठा चुकी थी। इसी के साथ वह पश्चिम बंगाल में भाजपा को मुख्य मुकाबले में ले आई। इसका भविष्य में उनको नुकसान उठाना पड़ेगा।
      इसी के साथ नरेंद्र मोदी के आमंत्रण पर कई विदेशी शासक शपथ ग्रहण समारोह में पहुंचे। नरेंद्र मोदी ने इन पहुंचने वाले मेहमानों के माध्यम से भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सन्देश दिया। इसके अनुसार वह अपने पड़ोसी देशों के साथ अच्छे संबन्ध रखना चाहते है। लेकिन पाकिस्तान ने अपने आतंकी ठिकाने समाप्त नहीं किये है। ऐसे में जाहिर है कि वह पड़ोसी मुल्कों के साथ शांतिपूर्ण संबन्ध नहीं रखना चाहता। इसलिए उसे आमंत्रित करने का कोई मतलब नहीं था। इस तरह मोदी ने एक बार फिर पाकिस्तान को अलग थलग कर दिया। इतना ही नही बिना किसी औपचारिक घोषणा के सार्क को हाशिये पर पंहुचा दिया। उंसकी जगह बिम्सटेक को प्रतिष्ठित कर दिया। इसमें पाकिस्तान को छोड़ कर भारत के अन्य पड़ोसी मुल्क शामिल थे।
     दो हजार चौदह में नरेंद्र मोदी ने सार्क देशों के नेताओं को शपथ ग्रहण में बुलाया था। इस बार बिम्सटेक देश उनके मेहमान बने। इसमें पाकिस्तान शामिल नहीं है। मोदी पाकिस्तान को जो सन्देश देना चाहते थे, वह पहुंच गया। इमरान खान अपनी छवि सुधारने के लिए शपथ ग्रहण समारोह में आना चाहते थे, लेकिन नरेंद्र मोदी ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
    यह तक कि  किर्गिस्तान के राष्ट्रपति और मॉरीशस के प्रधानमंत्री को भी शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया गया था।
     पाकिस्तान के अलावा चीन को भी नहीं बुलाया गया था। इन दोनों को छोड़ कर वह सभी देश आमंत्रित थे, जिनकी सीमा भारत से मिलती है। आमंत्रण मात्र से ही बिम्सटेक स्वतः ही सार्क का बेहतर विकल्प बन गया। सार्क में पाकिस्तान शामिल था। लेकिन उसकी आतंकी गतिविधियों के चलते यह संगठन निरर्थक हो गयव था। बे ऑफ बंगाल इनीशिएटिव फॉर मल्टी सेक्टोरल टेक्निकल ऐंड इकॉनमिक को ऑपरेशन को संक्षेप में बिम्सटेक कहते है। इसमें बंगाल की खाड़ी के वह  देश शामिल है जिनकी सीमा भारत के निकट है। बांग्लादेश, भारत, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड इसके सदस्य है। भारत के इन देशों के साथ व्यापारिक व आर्थिक साझेदारी है। इसमें विकास की पर्याप्त संभावना है। मोदी सरकार इस दिशा में कार्य भी करती रही है।  आर्थिक और तकनीक रुप से ये देश परस्पर सहयोगी है।
     उधर ममता बनर्जी अपनी पार्टी में मची भगदड़ से भी परेशान है। इसलिए वह अभी कोलकोता छोड़ना नहीं चाहती। तृणमूल कांग्रेस के दो विधायक और तिरसठ पार्षद भाजपा में शामिल हो गए थे। इसके बाद वीरभूम जिले के एक तृणमूल विधायक व  चार प्रमुख नेता भी भाजपा में शामिल हो गए थे। इन सबका आकलन था कि तृणमूल कांग्रेस की जगह भाजपा ही लेगी। अपनी इस परेशानी को छिपाने के लिए ममता ने चौवन परिवारों को शपथ ग्रहण में शामिल करने का विरोध शुरू किया था। अपने इनकार का यही कारण बताया था। बंगाल भाजपा के प्रभारी व केंद्रीय नेता कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि शामिल होना या न होना यह उनकी मर्जी है। लोगों ने देखा है कि बंगाल में किस तरह से हमारे कार्यकर्ताओं की हत्या हुई है। यदि पीएम के शपथग्रहण समारोह में उनके परिजन आना चाहते हैं तो उन्हें रोका नहीं जा सकता है।
    ममता बनर्जी ने अपरोक्ष रूप से स्वीकार कर लिया है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा जमीनी स्तर पर मुख्य विपक्षी पार्टी बन चुकी है। उसने कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। इतना ही नहीं विधानसभा चुनाव में भाजपा के विजयी होने के कयास लगाए जा रहे है। चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री पद की संवैधानिक मर्यादा उल्लंघन किया था। उन्होंने प्रधानमंत्री के प्रति आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। इसके बाद नरेंद्र मोदी ने बड़प्पन दिखाया। उन्होंने ममता को शपथ ग्रहण में आमंत्रित किया था। ममता से अपेक्षा थी कि वह भी सद्भावना का प्रदर्शन करती। लेकिन उन्होंने संकुचित राजनीति से बाहर निकलना नामंजूर कर दिया।
    ममता के इनकार का कोई अन्य कारण होता तो उसे नजरअंदाज किया जा सकता था। लेकिन उन्होंने जिस मुद्दे को इनकार का आधार बनाया वह मानवीय है।
    ममता के अनुसार भाजपा ने पश्चिम बंगाल के उन परिवारों को आमंत्रित किया है, जिनके सदस्य को राजनीतिक चुनावी हिंसा में जान गंवानी पड़ी। जबकि भाजपा के अनुसार  इन परिवारों को मानवीय आधार पर सम्मान देना उचित था। बेहतर यह होता कि ममता बनर्जी इसको मुद्दा न बनाती। आखिर वह उनके प्रदेश के ही लोग है। इस समय वह कष्ट के दौर से गुजर रहे है। राजनीतिक विरोध अपनी जगह है। लेकिन कष्ट के इस मौके पर केंद्र के साथ प्रदेश की सरकार भी उनके साथ होती तो मानवीय आधार पर इसकी सराहना होती। लेकिन ममता बनर्जी ने संकुचित राजनीतिक सोच को उजागर किया है। उनके निर्णय से यही सन्देश गया कि उन्हें अपने प्रदेश के पीड़ित कुछ परिवारों के साथ बैठना पसंद नहीं था।
    ममता के इस निर्णय का पश्चिम बंगाल की राजनीति पर दूरगामी असर होगा। नरेंद्र मोदी ने सदैव सहयोगी संघवाद के संवैधानिक विचार पर अमल किया है। उन्होंने दलगत आधार पर किसी प्रदेश के साथ भेदभाव नहीं किया है। नीति आयोग के माध्यम से प्रदेशों की केंद्र में भागीदारी बढाई। प्रदेशो को मिलने वाली सहायता व अनुदान में भी बढोत्तरी की गई। मोदी सरकार ने यह विचार नहीं किया कि किस प्रदेश में भाजपा विरोधी सरकार है। संविधान निर्माता ऐसी ही व्यवस्था चाहते थे। चुनाव समाप्त होने के बाद ममता बनर्जी को भी इसी भावना का परिचय देना चाहिए था।
    उन्हें अपने प्रदेश से बुलाये गए सामान्य परिवार के लोगों के साथ दिखना चाहिए था। मुख्यमंत्री केवल उनका प्रतिनिधि नहीं होता, जिन्होंने उन्हें वोट दिया होता है, या जो उनकी पार्टी के होते है। बल्कि वह सभी का प्रतिनिधि होता है। लेकिन ममता बनर्जी ने अपने को सीमित राजनीतिक दायरे में समेट लिया है। कम्यूनिसटों की भांति उनके शासन में केवल अपनी पार्टी के कैडर को प्राथमिकता मिली है।
    विरोधियों के प्रति नफरत का विचार रहता है। इसके विपरीत नरेंद्र मोदी ने सभी मुख्यमंत्रियों को आमंत्रण भेज कर सहयोग का सन्देश दिया था। लेकिन ममता को यह मार्ग पसंद नहीं आया। उनका टकराव व नफरत में विश्वास है। इसी प्रकार मोदी ने पड़ोसी देशों से संबन्ध मजबूत बनाने का सन्देश आंत्रण के माध्यम से दिया। इसकी सर्वत्र तारीफ हुई है।

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