डॉ दिलीप अग्निहोत्री
चर्चा है कि राहुल गांधी अध्यक्ष पद छोड़ना चाहते है। लगातार दूसरी पराजय के मंथन से बच निकलने का यह सबसे आसान तरीका है। क्योंकि नया अध्यक्ष गांधी परिवार का कृपापात्र ही होगा। जैसी स्थिति यूपीए सरकार में मनमोहन सिंह की थी, वैसी ही दशा कांग्रेस संगठन में गैर गांधी अध्यक्ष की होगी। जब राहुल गांधी ही अघोषित रूप से शीर्ष नेता होंगे, तो अध्यक्ष पद में बदलाव का कोई मतलब ही नहीं रहेगा। ऐसे में कांग्रेस की भलाई के लिए राहुल को स्वयं में बदलाव लाना होगा। इसके लिए उन्हें आत्मचिंतन करना होगा। इस पर विचार करना होगा कि पांच वर्ष में उनके नरेंद्र मोदी वीरोधी सभी मुद्दे औंधे मुंह क्यों गिरे।उन्होंने तो मोदी को चोर, दलाल, खून की दलाली करने वाला, गरीबों की जेब काटने वाला, पन्द्रह पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने वाला, माल्या, नीरव को पैसा देकर भगाने वाला आदि न जाने क्या क्या कहा। इस हिसाब से तो भाजपा का सफाया हो जाना चाहिए था, लेकिन हुआ इसका उल्टा।

राहुल को इसी विषय पर विचार करना चाहिए। क्या यह सही नहीं कि उनके मुद्दों ने कांग्रेस का ही नुकसान किया, मोदी की चोर बताने से लोगों ने राहुल की पार्टी को ईमानदार नहीं मान लिया। इन सभी मुद्दों को मर्यादा विहीन माना गया। जिस मोदी ने समाज व राष्ट्र की सेवा के लिए अपने परिवार का त्याग कर दिया, उसके लिए चोर चोर का नारा लगवाना घृणित था, वह भी तब जब इसके कोई प्रमाण राहुल के पास नहीं थे। उन्होंने फ्रांस के राष्ट्रपति का नाम लेकर गलत बयानी की, फ्रांस ने इसका खंडन कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट का नाम लेकर गलत बयानी की, इसके लिए फटकार लगी। मोदी के बारे में जो इंटरव्यू राहुल ने दिया, उसमें भी मर्यादा का अभाव था। राहुल कह रहे थे कि मोदी जी खत्म हो गए, इसके पहले राहुल कहते थे कि मोदी उनकी आंख में आंख डाल कर बात नहीं कर सके। जबकि लोकसभा में मोदी ने राहुल को जो जबाब दिया था, उसमें राहुल को नजर छुपानी पड़ रही थी। फिर भी राहुल नहीं माने। अपने भाषणों में यही दोहराते रहे। आखिर राहुल कौन से तपस्वी राजनेता है, जिनकी आंख में आंख डाल कर बात करना संभव नहीं। राहुल कहते रहे कि मोदी जी गरीबो की नहीं अमीरों की सुनते है, जबकि हम गरीबों की सुनते है। अब राहुल आत्मचिंतन करें कि क्या उनकी इस बात पर आमजन ने विश्वास किया।
पांच वर्ष पहले नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना कांग्रेस को बर्दाश्त नहीं हुआ था, फिर भी संवैधानिक व्यवस्था के तहत उन्हें जनादेश को स्वीकार करना पड़ा था। लेकिन कांग्रेस अपनी व्याकुलता को कभी छिपा नहीं सका। यही कारण था कि उसके मोदी विरोधी मुद्दों में सिद्धांत की जगह बदनीयत ज्यादा थी। पिछले पांच वर्ष में विपक्ष जमीनी मुद्दों का निर्धारण ही नहीं कर सका। उसने असहिष्णुता के मुद्दे को हवा दी,इसे अभियान का रूप दिया। इसके तहत सम्मान वापसी होने लगी, फिर ललित मोदी का मुद्दा उठाया, सुषमा स्वराज के इस्तीफे की मांग पर संसद ठप्प कर दी, राफेल पर नरेंद्र मोदी को चोर बताया, पन्द्रह लाख रुपये के लिए विपक्ष का प्रत्येक नेता परेशान दिखाई दिया, नोटबन्दी को आर्थिक बर्बादी का कारण कहा, जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स बताया, सर्जिकल स्ट्राइक को खून की दलाली कहा, एयर स्ट्राइक पर सवाल उठाया, सबूत मांगे, कुछ नेताओं ने तो पुलमावा हमले को पुर्निर्धारित साजिश बताया, फिर कहा कि एयर स्ट्राइक के लिए सेना की तारीफ करेंगे, नरेंद्र मोदी की नही, जब जब भाजपा कहीं जीती ईवीएम पर हमला बोला, आदि।
जाहिर है कि विपक्ष मोदी सरकार के खिलाफ सदैव नकारात्मक मुद्दे ही उठाता रहा, यह सब विपक्ष की विश्वसनीयता को कमजोर करने वाले साबित हुए। अंततः जनता की अदालत में ये सभी मुद्दे खारिज हो गए। इतना ही नहीं ये सभी मुद्दे विपक्ष की फजीहत कराने वाले साबित हुए। असिष्णुता अभियान भी सोची समझी रणनीति के तहत चलाया गया। इसके सूत्रधार वह लोग थे जो नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश छोड़ने की बात कर रहे थे। अनेक विपक्षी नेता भारत विरोधी नारे लगाने वालों के समर्थन में पहुंच गए थे। धीरे धीरे असहिष्णुता की कलई खुल गई, ये लोग केवल मोदी के प्रति असहिष्णु थे। पन्द्रह लाख रुपये के लिए विपक्ष के नेता ही लालची दिखाई दिए। यह आवाज जनता की तरफ से नहीं उठी थी, न कभी मोदी ने खातों में पन्द्रह लाख रुपये देने की बात कही थी। उन्होंने यही कहा था कि विदेशों में इतना कला धन जमा है, जिससे प्रत्येक नागरिक को पन्द्रह लाख रूपये मिल सकते है। यह रुपये की मात्रा बताने का प्रतीक मात्र था।
विपक्षी नेताओं ने बदनीयत में इसे मुद्दा बना दिया। इसी तरह नोटबन्दी, जीएसटी पर उनके विलाप से आमजन प्रभावित नहीं हुआ। विजय माल्या, नीरव मोदी आदि कांग्रेस के समय बैकों से कर्ज लेकर राजा बाबू बने थे। उन्हें रोकने का कोई कानून नहीं था। फिर भी वह जितना कर्ज लेकर भागे थे उससे ज्यादा की उनकी संपत्ति मोदी सरकार ने जब्त कर ली। ऐसे में माल्या , नीरव को भगा देने के आरोप से कांग्रेस की छवि ही खराब हुई। मोदी सरकार ने आर्थिक भगोड़ा हेतु बहुत सख्त कानून बना दिये है। अब ऐसे लोगों का कानून के शिकंजे में आना तय है।
विपक्ष ने किसानों के आंदोलन के नाम पर सब्जी, फल, दूध के टैंकर सड़कों पर बिखेर दिए। बाद में उजागर हुआ कि ये किसान ही नहीं थे। ऐसे में विपक्ष के सभी मुद्दे उसी पर भारी पड़ गए। राफेल पर चौकीदार को चोर बताने का कांग्रेस को बहुत नुकसान हुआ। राहुल गांधी बिना किसी प्रमाण के यह नारा लगवा रहे थे। सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद भी उन्होंने सबक नहीं लिया। वह खुद पेरोल पर रहकर दूसरे को चोर बता रहे थे। इस मुद्दे ने कांग्रेस को ही कटघरे में पहुंचा दिया था। यही कारण था कि आम चुनाव में विपक्ष को शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा। खेल विकास का मुद्दा चला।
इसमें नरेंद्र मोदी ने विपक्षियों को बहुत पीछे छोड़ दिया। राजग के आंकड़ा सीढ़े तीन सौ पर पहुंच गया। भाजपा ने अकेले तीन सौ पार किया।आधा दर्जन से अधिक राज्यों में भाजपा ने शत प्रतिशत सीटें जीत ली। डेढ़ दर्जन राज्यों में राजग ने पचास पचास प्रतिशत से अधिक वोट हासिल किये। उत्तर प्रदेश में महागठबंधन बड़ी दम भर रहा था, यहां भाजपा ने लगभग पचास प्रतिशत वोट हासिल किये।
वहीं बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में वोट प्रतिशत ऐसा ही था। आजादी के बाद से अब तक के चुनावों में किसी एक पार्टी ने सबसे ज्यादा लगभग अड़तीस प्रतिशत वोट पहली बार सहानिभूति लहर में राजीव गांधी को मिले थे। इस बार भाजपा विकास के नाम पर करीब वहां तक पहुंच गई। सत्रह राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में पचास उसे पचास प्रतिशत वोट मिले। राजग के विपरीत यूपीए सौ के भीतर ही सिमट गया। जाहिर है कि विपक्ष नरेंद्र मोदी के विकास और गरीबों के कल्याण हेतु लागू की गई योजनाओं असर देख ही नहीं सका।







