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    Home»इंडिया

    व्यर्थ हुई ईवीएम पर बवाल की बेकरारी

    By June 13, 2019 इंडिया No Comments4 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    अंततः चुनाव आयोग के खिलाफ कई विपक्षी नेताओं की बेकरारी व्यर्थ साबित हुई। ईवीएम के माध्यम से वस्तुतः चुनाव आयोग पर ही निशाना लगाया जा रहा था। इसमें वह लोग शामिल थे जो ईवीएम के कारण ही सत्ता में पहुंचे थे। पराजित हुए, या पराजय की आशंका हुई तो इनके लिए ईवीएम खराब हो गई।
    तेलगु देशम प्रमुख चंद्रबाबू नायडू का आंध्रप्रदेश के बाहर कोई आधार नहीं है। ऐसे में आमचुनाव के दौरान ईवीएम पर उनकी भागदौड़ हैरान करने वाली थी। उन्होंने बिना किसी प्रमाण के कई बार चुनाव आयोग में शिकायत की, इक्कीस पार्टियों का प्रतिनिधि मंडल लेकर चुनाव आयोग पँहुचे थे, सुप्रीम कोर्ट में अपील की , लेकिन यहां भी उनकी याचिका खारिज हुई। इसके बाद भी वह नहीं माने, विपक्ष के अन्य नेताओं से मिलने के लिए वह नगरी नगरी भटकते रहे। इसे भाजपा को रोकने की  कवायद नहीं माना जा सकता था। क्योंकि उस समय तक किसको कितनी सीट मिलेगी, इसका कोई अनुमान नहीं था। यहां तक कि सर्वेक्षण में जब भाजपा को बहुमत दिखाया गया, तब भी चंद्रबाबू विपक्षी नेताओं से मिल रहे थे।
     ऐसा भी नहीं विपक्षी दिग्गजों को अपनी पराजय का अहसास नहीं था। इसीलिए उन्होंने नाकामी छिपाने के लिए ईवीएम राग शुरू कर दिया था। खासतौर पर कांग्रेस और तेलगु देशम पार्टी के नेताओं की सक्रियता देखते बनती थी। जिस समय नरेंद्र मोदी रैलियां करने में व्यस्त थे, चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व में ईवीएम पर हमला बोलने का अभियान चल रहा था। चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट में इनकी सभी दलील खारिज हुई, इसके बाद भी इन्होंन अपना अभियान जारी रखा। अंतिम चरण के मतदान से पहले चंद्रबाबू नायडू का दर दर भटकना यही जाहिर कर रहा था। वह विपक्षी नेताओं से मिलने के लिए भाग रहे थे। कहा गया कि भाजपा को रोकने के लिए सभी विपक्षियों को एक कर रहे है। लेकिन अब खुलासा हुआ कि वह ईवीएम वीरोधी अभियान के लिए समर्थन हासिल करने के लिए बेकरार थे।
    इस तरह विपक्ष ने आखिरी चरण के मतदान से पहले अपनी हार मान ली थी। जबकि विपक्ष के ईवीएम अभियान की अंतिम उम्मीद पहले ही समाप्त हो गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबन्ध में दाखिल याचिका खारिज कर दी थी। इतना ही नहीं विद्वान न्यायधीशों ने इस पर तल्ख टिप्पणी भी की थी। याचिका को खारिज करते हुए मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई ने कहा था कि अदालत इस मामले को बार बार क्यों सुने। वह इस मामले में दखलअंदाजी नहीं करना चाहते हैं। एक महीने पहले हुई सुनवाई के में सुप्रीम कोर्ट ने प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में पांच बूथ के ईवीएम को वीवीपैट की पर्ची से मिलाने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम को वीवीपैट की पर्ची से मिलाने के अपने इस आदेश में एक से बढ़ाकर पांच कर दिया था।
     अनेक विपक्षी पार्टियों ने ईवीएम और वीवीपैट की पर्चियों के मिलान पर पुनर्विचार याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की थी।  लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे विपक्षी नेता इस मामले को चुनावी प्रक्रिया तक चलाना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पहले वाले निर्णय पर असहमति जताई थी। इसके बाद इन्होंने पुनर्विचार याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इसको  खारिज कर दिया। याचिका के सूत्रधार लेलगु देशम प्रमुख चंद्रबाबू नायडू थे। इनकी मांग थी कि पचास प्रतिशत वीवीपैट पर्चियों की ईवीएम से मिलान का आदेश चुनाव आयोग को दिया जाए।
    चंद्रबाबू नायडू अपना ज्ञान प्रदर्शित कर रहे थे। उन्होंने नसीहत के अंदाज में कहा कि  था पारदर्शी चुनाव करना चुनाव आयोग का कार्य है। नायडू के कथन से लगा कि वह यह न बताते तो चुनाव आयोग अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं करता। इसका दूसरा अर्थ यह हुआ कि स्वयं चंद्रबाबू नायडू को बहुमत मिला उसमें पारदर्शिता नहीं थी, या उस समय भी ईवीएम खराब थी।
    यही दशा कांग्रेस, सपा ,बसपा, तृणमूल कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस आदि की है। जब इन्हें बहुमत मिला, तब ईवीएम बहुत अच्छी थी, तब  किसी ने नहीं कहा कि बैलेट पेपर से चुनाव होने चाहिए। लेकिन जब भाजपा को बहुमत मिलने लगा तो ईवीएम खराब हो गई। इनके हिसाब से तो दो हजार चौदह में कांग्रेस की सरकार ने ईवीएम में ऐसी गड़बड़ी कराई जिससे उनकी सीट चवालीस हो गई, और भाजपा को बहुमत मिल गया। कर्नाटक, मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़, राजस्थान जीते तो जश्न मनाया गया। तब ईवीएम को लेकर चंद्रबाबू इतने परेशान क्यों नहीं हुए।

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