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    Home»धर्म»Spirituality

    समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करती है एकादशी

    By July 6, 2019 Spirituality No Comments6 Mins Read
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    देवशयनी एकादशी आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को कहा जाता है। इसे हरिशयनी एकादशी भी कहा जाता है। पुराणों में ऐसा उल्लेख मिलता है कि इस दिन से भगवान विष्णु चार मास के लिए बलि के द्वार पर पाताल लोक में निवास करते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को लौटते हैं। इसी दिन से चौमासे का आरंभ माना जाता है। इस दिन से भगवान विष्णु चार मास के लिए क्षीरसागर में शयन करते हैं। इसी कारण इस एकादशी को हरिशयनी एकादशी तथा कार्तिक शुक्ल एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी कहते हैं।

    इन चार महीनों में भगवान विष्णु के क्षीरसागर में शयन करने के कारण विवाह आदि कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता। धार्मिक दृष्टि से यह चार मास भगवान विष्णु का निद्रा काल माना जाता है। इन दिनों में तपस्वी भ्रमण नहीं करते, वे एक ही स्थान पर रहकर तपस्या (चातुर्मास) करते हैं। इन दिनों केवल ब्रज की यात्रा की जा सकती है, क्योंकि इन चार महीनों में भू-मंडल के समस्त तीर्थ ब्रज में आकर निवास करते हैं। ब्रह्म वैवर्त पुराण में इस एकादशी का विशेष माहात्म्य लिखा है। इस व्रत को करने से प्राणी की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, सभी पाप नष्ट होते हैं तथा भगवान हृषीकेश प्रसन्न होते हैं।

    पूजा-अर्चना:

    सभी एकादशियों को भगवान विष्णु की पूजा-आराधना की जाती है, परंतु आज की रात्रि से भगवान का शयन प्रारंभ होने के कारण उनकी विशेष विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस दिन उपवास करके भगवान विष्णु की प्रतिमा को आसन पर आसीन कर उनका षोडशोपचार सहित पूजन करके उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा, पद्म सुशोभित कर उन्हें पीतांबर, पीत वस्त्रों व पीले दुपट्टे से सजाया जाता है। पंचामृत से स्नान करवाकर तत्पश्चात भगवान की धूप, दीप, पुष्प आदि से पूजा कर आरती उतारी जाती है। भगवान को पान, सुपारी अर्पित करने के बाद निम्न मंत्र द्वारा स्तुति की जाती है :

    सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जमत्सुप्तं भवेदिदम्।
    विबुद्धे त्वयि बुद्धं च जगत्सर्व चराचरम्।।

    अर्थात् हे जगन्नाथजी! आपके निद्रित हो जाने पर संपूर्ण विश्व निद्रित हो जाता है और आपके जाग जाने पर संपूर्ण विश्व तथा चराचर भी जाग्रत हो जाते हैं।

    इस प्रकार प्रार्थना करके भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए। तत्पश्चात ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्वयं फलाहार करना चाहिए। रात्रि में भगवान के मंदिर में ही शयन करना चाहिए तथा भगवान का भजन व स्तुति करनी चाहिए। स्वयं सोने से पूर्व भगवान को भी शयन करा देना चाहिए। इस दिन अनेक परिवारों में महिलाएं पारिवारिक परंपरानुसार देवों को सुलाती हैं।

    इन चार महीनों के लिए अपनी रुचि अथवा अभीष्ट के अनुसार नित्य व्यवहार के पदार्थों का त्याग और ग्रहण करें। मधुर स्वर के लिए गुड़ का, दीर्घायु अथवा पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति के लिए तेल का, शत्रुनाशादि के लिए कड़वे तेल का, सौभाग्य के लिए मीठे तेल का और स्वर्ग प्राप्ति के लिए पुष्पादि भोगों का त्याग करें। देह शुद्धि या सुंदरता के लिए परिमित प्रमाण के पंचगव्य का, वंश वृद्धि के लिए नियमित दूध का, कुरुक्षेत्रादि के समान फल मिलने के लिए बर्तन में भोजन करने के बजाय ‘पत्र’ का तथा सर्वपापक्षयपूर्वक सकल पुण्य फल प्राप्त होने के लिए एकमुक्त, नक्तव्रत, अयाचित भोजन या सर्वथा उपवास करने का व्रत ग्रहण करें। साथ ही चातुर्मासीय व्रतों में कुछ वर्जनाएं भी हैं। जैसे पलंग पर सोना, भार्या का संग करना, झूठ बोलना, मांस, शहद तथा किसी अन्य का दिया दही-भात आदि का भोजन करना। मूली, परवल एवं बैंगन आदि शाक खाना भी त्याग देना चाहिए। जो श्रद्धालु जन इस एकादशी को पूर्ण विधि-विधानपूर्वक भगवान का पूजन करते और व्रत रखते हैं, वे मोक्ष को प्राप्त करते हैं।

    देवशयनी एकादशी की कथा:

    एक बार देवर्षि नारद जी ने ब्रह्मा जी से इस एकादशी के माहात्म्य के बारे में पूछा। तब ब्रह्माजी ने उन्हें बताया कि ‘सत युग में मांधाता नामक एक चक्रवर्ती सम्राट राज्य करते थे। उनके राज्य में प्रजा बहुत सुख और आनंद से रहती थी। एक बार उनके राज्य में लगातार तीन वर्ष तक वर्षा न होने के कारण भयंकर अकाल पड़ा। प्रजा व्याकुल हो गई। इस दुर्भिक्ष से चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। धर्म पक्ष के यज्ञ, हवन, पिंडदान, कथा, व्रत आदि सब में कमी हो गई। प्रजा ने राजा के दरबार में जाकर अपनी वेदना की दुहाई दी। राजा ने कहा, ‘आप लोगों का कष्ट भारी है। मैं प्रजा की भलाई हेतु पूरा प्रयत्न करूंगा।’

    राजा इस स्थिति को लेकर पहले से ही दुखी थे। वे सोचने लगे कि आखिर मैंने ऐसा कौन-सा पाप-कर्म किया है, जिसका दंड मुझे इस रूप में मिल रहा है। फिर प्रजा की दुहाई तथा कष्ट को सहन न करने के कारण, इस कष्ट से मुक्ति पाने का कोई साधन करने के उद्देश्य से राजा सेना को लेकर जंगल की ओर चल दिए। जंगल में विचरण करते-करते एक दिन वे ब्रह्मा जी के तेजस्वी पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुंचे और उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। मुनि ने उन्हें आशीर्वाद देकर कुशल-क्षेम पूछा। फिर जंगल में विचरने व अपने आश्रम में आने का अभिप्राय जानना चाहा।

    तब राजा ने हाथ जोड़कर कहा, ‘महात्मन! सब प्रकार से धर्म का पालन करते हुए भी मैं अपने राज्य में दुर्भिक्ष का दृश्य देख रहा हूं। मैं इसका कारण नहीं जानता। आखिर क्यों ऐसा हो रहा है, कृपया आप इसका समाधान कर मेरा संशय दूर कीजिए।’ यह सुनकर अंगिरा ऋषि ने कहा, ‘हे राजन! यह सतयुग सब युगों में श्रेष्ठ और उत्तम माना गया है। इसमें छोटे से पाप का भी बड़ा भारी फल मिलता है। इसमें लोग ब्रह्मा की उपासना करते हैं। इसमें धर्म अपने चारों चरणों में व्याप्त रहता है। इसमें ब्राह्मणों के अतिरिक्त अन्य किसी जाति को तप करने का अधिकार नहीं था, जबकि आपके राज्य में एक शूद्र तपस्या कर रहा है। यही कारण है कि आपके राज्य में वर्षा नहीं हो रही है। जब तक उसकी जीवन लीला समाप्त नहीं होगी, तब तक यह दुर्भिक्ष शांत नहीं होगी। उस शूद्र तपस्वी को मारने से ही पाप की शांति होगी।’

    परंतु राजा का हृदय एक निरपराध को मारने को तैयार नहीं हुआ। राजा ने उस निरपराध तपस्वी को मारना उचित न जानकर ऋषि से अन्य उपाय पूछा। राजा ने कहा, ‘हे देव! मैं उस निरपराध को मार दूं, यह बात मेरा मन स्वीकार नहीं कर रहा है। इसलिए कृपा करके आप कोई और उपाय बताएं।’ तब ऋषि ने कहा, ‘आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करो। इस व्रत के प्रभाव से अवश्य ही वर्षा होगी।’ यह सुनकर राजा मांधाता वापस लौट आया और उसने चारों वर्णों सहित पद्मा एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उनके राज्य में मूसलाधार वर्षा हुई और पूरा राज्य धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया।

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